जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को फिर मिली जान से मारने की धमकी, आतंकी संगठन ने कहा- 'माफी मांगो या अंजाम भुगतने को तैयार रहो' जम्मू-कश्मीर एक घंटा पहले 3
जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (ULC) ने एक धमकी भरा पत्र जारी कर कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को निशाना बनाया है, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह अलर्ट हो गई हैं।

जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडित सरकारी कर्मचारियों को एक आतंकी संगठन द्वारा जान से मारने की सीधी धमकी दी गई है। सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे एक नए धमकी भरे पत्र में कश्मीरी पंडितों को चेतावनी दी गई है कि या तो वे माफी मांगें या फिर गंभीर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहें। इस पत्र के सामने आने के बाद से ही कश्मीरी पंडितों के परिवारों में दहशत का माहौल है और सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक कड़ा कर दिया गया है।

क्या है पूरा मामला और धमकी के पीछे कौन सा संगठन है?

सोशल मीडिया पर सामने आया यह धमकी भरा पत्र यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (ULC) नामक संगठन की ओर से जारी किया गया है। भारतीय सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों का मानना है कि यह संगठन वास्तव में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का ही एक ऑनलाइन मुखौटा यानी प्रॉक्सी संगठन है।

इस पत्र में मुख्य रूप से उन कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को निशाना बनाया गया है, जो हाल के दिनों में घाटी में अपने लिए सुरक्षित आवास और ट्रांजिट कॉलोनियों की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। गौरतलब है कि पिछले लगभग दो महीनों के भीतर इस तरह के कई डरावने संदेश और पत्र सोशल मीडिया पर सामने आ चुके हैं। इन पत्रों की सबसे चिंताजनक बात यह है कि इनमें केवल धमकियां ही नहीं दी गई हैं, बल्कि निशाना बनाए जा रहे कर्मचारियों के नाम, उनके मोबाइल नंबर, उनके घर और दफ्तर के पते, उनकी गाड़ियों के नंबर और अब तो उनकी तस्वीरें भी सार्वजनिक की जा रही हैं।

धमकी भरे पत्र में क्या लिखा है?

सुरक्षा एजेंसियों के हाथ लगे इस नए पत्र पर लगभग 10 सितंबर 2026 की तारीख दर्ज है। पत्र के नीचे "अहमद बिलाल, मीडिया कोऑर्डिनेटर, सोल्जर ऑफ रेजिस्टेंस" के हस्ताक्षर हैं। पत्र की शुरुआत पारंपरिक अभिवादन "अस्सलाम-उ-अलैकुम" से की गई है, लेकिन इसके बाद का पूरा मजमून नफरत और धमकियों से भरा हुआ है।

पत्र में अपनी सुरक्षा के लिए आवाज उठाने वाले कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के लिए बेहद आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया है। उन्हें "व्हाइट-कॉलर आतंकवादी प्रवासी पंडित" करार दिया गया है। इसके अलावा, कश्मीरी पंडितों के लिए अलग सुरक्षित कॉलोनियों या विशेष सरकारी आवास की मांग को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे "राज्य के भीतर एक और राज्य बनाने की सोची-समझी साजिश" बताया गया है।

आतंकी संगठन ने अपने इस पत्र में दावा किया है कि यह पूरी योजना भारत सरकार की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। उनका कहना है कि सरकार जानबूझकर ऐसा माहौल बनाना चाहती है जिससे लगे कि कश्मीर में रहने वाले हिंदू असुरक्षित हैं, ताकि सुरक्षा बलों को स्थानीय कश्मीरी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई करने की खुली छूट मिल सके। इस पत्र में कश्मीर में पंडितों के पुनर्वास की योजना की तुलना इजरायल के सेटलमेंट मॉडल से की गई है। पत्र के अनुसार, इसका उद्देश्य बाहर से आने वाले लोगों को डोमिसाइल देकर वहां बसाना और क्षेत्र की जनसांख्यिकी यानी आबादी के ढांचे को बदलना है।

'दिल्ली की सरकार भी नहीं बचा पाएगी' - आतंकी संगठन की खुली चेतावनी

इस धमकी भरे पत्र में कश्मीरी पंडितों पर लंबे समय से पाखंड करने और पीड़ित दिखने का नाटक करने का आरोप लगाया गया है। पत्र में लिखा गया है कि ये कर्मचारी 1990 के दशक से ही 'विक्टिम कार्ड' खेल रहे हैं, जबकि असल में वे दिल्ली की सत्ता के इशारे पर स्थानीय कश्मीरी लोगों पर हो रहे कथित अत्याचारों में मददगार की भूमिका निभा रहे हैं।

आतंकी संगठन ने डराने की कोशिश करते हुए दावा किया है कि उनके पास घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों के दैनिक जीवन, उनके आने-जाने के रास्तों, उनके पारिवारिक संबंधों, दफ्तरों और ठिकानों की पल-पल की सटीक जानकारी मौजूद है। पत्र में कहा गया है कि वे जब चाहें, जहां चाहें हमला कर सकते हैं।

कर्मचारियों को चेतावनी देते हुए कहा गया है कि वे जल्द से जल्द अपनी मांगों के लिए माफी मांगें, क्योंकि उनके पास सोचने और फैसला लेने के लिए बहुत ही कम समय बचा है। पत्र में यह भी लिखा गया है कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो MHA/दिल्ली की कोई भी ताकत उन्हें बचा नहीं पाएगी। यहां तक कि धमकी में श्मशान घाटों को भी निशाना बनाने और उन्हें तहस-नहस करने की बात कही गई है।

पिछले दो महीनों में जारी हुआ यह पांचवां पत्र

स्थानीय सूत्रों और खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, पिछले दो महीनों के दौरान घाटी में इस तरह का यह पांचवां धमकी भरा पत्र जारी किया गया है। इससे पहले जो पत्र सामने आए थे, उनमें राजस्व विभाग और परिवहन विभाग जैसे संवेदनशील सरकारी विभागों में काम करने वाले कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के नाम सीधे तौर पर लिखे गए थे।

उन पत्रों में कर्मचारियों के मोबाइल नंबर, जम्मू स्थित उनके पैतृक मकानों के नंबर और गली का पता तक बिल्कुल सटीक तरीके से दर्ज किया गया था। इतना ही नहीं, उनकी गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन नंबर भी सार्वजनिक किए गए थे। इन पत्रों के जरिए चेतावनी दी गई थी कि जो भी कर्मचारी प्रधानमंत्री रोजगार और पुनर्वास पैकेज के तहत सरकारी नौकरी करना जारी रखेंगे, उन्हें जान से हाथ धोना पड़ेगा।

कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की क्या हैं मांगें?

इस पूरे विवाद और सुरक्षा के खतरे के बीच, PM पैकेज के तहत घाटी में नौकरी कर रहे कश्मीरी पंडितों के एक बड़े समूह ने अपनी सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता जताई है। वर्तमान में ये कर्मचारी घाटी के विभिन्न हिस्सों में किराए के मकानों में रहने को मजबूर हैं, जिससे वे बेहद असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

हाल ही में इन कर्मचारियों ने श्रीनगर के प्रेस एन्क्लेव में एकत्रित होकर शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारी कर्मचारियों ने मांग की थी कि:

  • सरकार द्वारा बनाए जा रहे सुरक्षित ट्रांजिट आवासों का आवंटन बहुत तेजी से किया जाए ताकि वे सुरक्षित वातावरण में रह सकें।
  • कर्मचारियों ने अपनी मांगों को पूरा करने के लिए प्रशासन को 30 सितंबर तक की समय-सीमा दी है।
  • उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि इस तारीख तक उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं, तो वे बड़े पैमाने पर धरने और भूख हड़ताल पर बैठने के लिए मजबूर होंगे।
  • इसके साथ ही, कर्मचारियों ने इन धमकी भरे पत्रों की गहन जांच के लिए साइबर अपराध इकाई से प्राथमिकी दर्ज कराने और काम करने के स्थानों, रिहाइशों तथा रास्तों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराने की मांग की है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और सुरक्षा एजेंसियों की तैयारी

केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर का स्थानीय प्रशासन इस पूरे मामले को आतंकवाद और मनोवैज्ञानिक युद्ध के एक हिस्से के रूप में देख रहा है। सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि आतंकियों का असली मकसद कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की प्रक्रिया को रोकना, जनसांख्यिकीय सामान्यीकरण को बाधित करना और उन्हें मुख्यधारा के जीवन से अलग करना है।

दूसरी तरफ, इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति भी शुरू हो गई है। जम्मू-कश्मीर की सत्ताधारी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के कुछ नेताओं ने इन पत्रों के सामने आने के समय और इनकी प्रामाणिकता पर संदेह व्यक्त किया है। उनका इशारा है कि इन धमकियों के पीछे राज्य का दर्जा बहाल करने की चल रही बहस को मोड़ने का कोई राजनीतिक मकसद भी हो सकता है।

हालांकि, सुरक्षा एजेंसियां और केंद्र सरकार इस खतरे को बेहद गंभीरता से ले रही हैं। घाटी में तैनात सभी कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा की समीक्षा की जा रही है और सुरक्षा घेरा मजबूत कर दिया गया है। खुफिया विभाग इन धमकी भरे पत्रों के डिजिटल फुटप्रिंट्स की जांच कर रहा है ताकि पता लगाया जा सके कि सोशल मीडिया पर इसे कहां से अपलोड किया गया। इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर सक्रिय उन संदिग्ध मददगारों की भी पहचान की जा रही है जो सीमा पार बैठे हैंडलर्स को कश्मीरी पंडितों की व्यक्तिगत और संवेदनशील जानकारियां लीक कर रहे हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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