जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति ने सरकार के सामने रखीं छह मांगें, चेताया- नफरत और विभाजन देश के भविष्य के लिए घातक भारत एक घंटा पहले 3
जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति ने देश की मौजूदा परिस्थितियों पर सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित करते हुए कहा कि नफरत, विभाजन और असुरक्षा का माहौल देश के भविष्य के लिए खतरनाक है, और इसके साथ ही छह सूत्रीय मांग-पत्र भी पेश किया।

नई दिल्ली: देश के मौजूदा हालात को लेकर जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति ने अपना दो टूक रुख जाहिर किया है। समिति के अनुसार नफरत, विभाजन और असुरक्षा का बढ़ता वातावरण देश के भविष्य के लिए घातक है। इसी के साथ समिति ने छह सूत्रीय मांग-पत्र भी सामने रखा है।

पूरा मामला क्या है?

कार्यकारी समिति के सदस्यों ने देश के वर्तमान हालात पर एकमत होकर एक बयान जारी किया है। इस सिलसिले में 11 जून, 2026 को जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष हजरत मौलाना महमूद असद मदनी की अध्यक्षता में कार्यकारी समिति की एक खास बैठक हुई। बैठक में देश की मौजूदा स्थिति से जुड़े एक प्रस्ताव का मसौदा पेश किया गया और विस्तृत विचार-विमर्श के बाद उसे पारित कर दिया गया। इसके बाद यह प्रस्ताव कार्यकारी समिति के सभी सदस्यों के समक्ष मंजूरी के लिए रखा गया, जिसे उन्होंने सर्वसम्मति से स्वीकृति दे दी।

समिति के सदस्यों ने देश की संवेदनशील स्थिति और अल्पसंख्यकों के लिए बने तनावपूर्ण माहौल की ओर ध्यान दिलाते हुए साफ कहा कि आज देश एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में सरकारी प्राथमिकताओं और सामाजिक बर्ताव में आया बदलाव सिर्फ किसी एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि समूचे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चिंता का सबब है। नफरत भरे भाषणों ने माहौल को और जहरीला बना दिया है। धार्मिक उन्माद, जो कभी समाज के हाशिये की आवाज हुआ करता था, अब राष्ट्रीय राजनीति और सत्ता प्रतिष्ठान के बयानों में जगह बनाता जा रहा है। हकीकत यह है कि नफरत अब धमकी पर टिकी राजनीति का रूप ले चुकी है। एक सुनियोजित सोच के तहत इस महान लोकतांत्रिक देश के संवैधानिक स्वरूप को बदलने की कोशिश की जा रही है, जिसे बढ़ावा देने में न्यायपालिका के रवैये की भी अहम भूमिका रही है।

निशाने पर अल्पसंख्यक

समिति के सदस्यों ने गहरी निराशा जताते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों के सम्मान और गरिमा के साथ-साथ उनके धार्मिक अनुष्ठानों, मस्जिदों, मदरसों और कब्रिस्तानों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। आम बहानों की आड़ में उनके खिलाफ कार्रवाई और तोड़फोड़ बेरोकटोक जारी है। इन हालात ने देश के एक बड़े तबके में यह भावना पैदा कर दी है कि देश में "आंतरिक उपनिवेशवाद" कायम किया जा रहा है, जहां दबाव, अधिकारों से वंचित किए जाने और लगातार बनी रहने वाली असुरक्षा का अहसास हावी होता जा रहा है। सदस्यों ने कहा कि किसी भी सभ्य समाज में धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों को न्याय, पारदर्शिता और कानूनी जरूरतों के मुताबिक निपटाया जाना चाहिए।

सदस्यों के अनुसार मतदान के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी हालिया घटनाएं भी कई गंभीर सवाल खड़े करती हैं। नागरिक पहचान और नागरिकता के नाम पर चल रही तमाम कार्रवाइयों ने लाखों नागरिकों को चिंता में डाल दिया है। यह धारणा मजबूत हो रही है कि इन प्रयासों का मकसद महज मतदाता सूचियों को दुरुस्त करना नहीं, बल्कि कुछ खास वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सीमित करना है। उन्होंने आगाह किया कि अगर लोकतंत्र के बुनियादी स्तंभ यानी मतदान के अधिकार पर ही शक और अविश्वास पनपने लगे, तो इसके नतीजे दूरगामी और खतरनाक होंगे।

समिति ने इससे भी ज्यादा चिंताजनक पहलू की ओर इशारा करते हुए कहा कि देश की असल समस्याएं पीछे छूटती जा रही हैं। युवा रोजगार को लेकर परेशान हैं, किसान मुश्किलों से जूझ रहे हैं, महंगाई आम आदमी की जिंदगी कठिन बना रही है, जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य का क्षेत्र अनेक चुनौतियों से घिरा है। इसके बावजूद राष्ट्रीय बहस को बार-बार धार्मिक विवादों और सांप्रदायिक झगड़ों की ओर मोड़ दिया जाता है। समिति ने जोर देकर कहा कि राष्ट्र की ऊर्जा वास्तविक समस्याओं के समाधान पर खर्च होनी चाहिए, न कि ऐसे विवादों पर जो समाज को बांटें और जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटका दें।

सदस्यों ने आगाह किया कि अगर आज किसी एक समुदाय के अधिकारों, पहचान और गरिमा को चोट पहुंचाई जा सकती है, तो कल यही रवैया किसी दूसरे समुदाय के साथ भी अपनाया जा सकता है। इसलिए यह मसला सिर्फ एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के संवैधानिक भविष्य, लोकतांत्रिक मूल्यों और कानून के शासन से जुड़ा एक अहम राष्ट्रीय सवाल है।

"नफरत राष्ट्रों को तोड़ती है, राष्ट्र न्याय से मजबूत होते हैं"

समिति के सदस्यों ने कहा कि इतिहास इस बात का गवाह है कि राष्ट्र नफरत से नहीं बनते, बल्कि नफरत राष्ट्रों को तोड़ती है। राष्ट्र न्याय से मजबूत होते हैं, विश्वास से आगे बढ़ते हैं और समानता से तरक्की करते हैं। उन्होंने कहा कि अगर आज न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। इतिहास का अनुभव बताता है कि जब समाज में नफरत को राजनीतिक ताकत का जरिया बना लिया जाता है, तो उसकी आग आखिरकार पूरे समाज को अपनी चपेट में ले लेती है।

जमीअत उलमा-ए-हिंद ने भारत सरकार और सभी राज्य सरकारों से मांग की कि अवैध घुसपैठ से जुड़ी सभी कार्रवाइयां पूरी पारदर्शिता के साथ, कानूनी प्रावधानों और न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप की जाएं। संगठन ने कहा कि पुश-बैक को महज दिखावे या प्रचार के बजाय गंभीर कानूनी प्रक्रिया के रूप में अंजाम दिया जाए। किसी भी नागरिक के खिलाफ धर्म, भाषा, नस्ल, वेशभूषा या क्षेत्रीय पहचान के आधार पर प्रोफाइलिंग और भेदभावपूर्ण कार्रवाई पर तुरंत रोक लगाई जाए। साथ ही जनसांख्यिकीय बदलावों और घुसपैठ के मुद्दे को किसी भी रूप में राजनीतिक या चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल न किया जाए और सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति जिम्मेदार तथा तथ्यों पर आधारित संवाद की शैली अपनाएं। संगठन ने यह भी मांग की कि नफरत, सामाजिक बहिष्कार और सांप्रदायिक तनाव को हवा देने वाले तत्वों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कानूनी कार्रवाई की जाए।

कार्यकारी समिति का छह सूत्रीय मांग-पत्र

  1. धर्म, जाति, नस्ल, भाषा या पहचान के आधार पर हिंसा, लिंचिंग, नफरती हमलों, संगठित उत्पीड़न और घृणास्पद भाषण रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।
  2. सांप्रदायिक दंगों, नरसंहार या मॉब लिंचिंग की स्थिति में संबंधित प्रशासन को जवाबदेह ठहराया जाए। लापरवाही, गैर-जिम्मेदारी या पक्षपात साबित होने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो और पीड़ितों को उचित मुआवजा, कानूनी सुरक्षा तथा पुनर्वास मुहैया कराया जाए। साथ ही फास्ट ट्रैक अदालतों के जरिये ऐसे मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए एक प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए।
  3. शिक्षा, रोजगार, कौशल और सरकारी संस्थानों में वंचित समूहों तथा अल्पसंख्यकों के प्रभावी प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं, ताकि सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के विकास, भागीदारी और गरिमापूर्ण जीवन के समान अवसर मिलें।
  4. भारत के संविधान के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता, पूजा स्थलों, अल्पसंख्यकों के शैक्षिक अधिकारों और उनके धार्मिक संस्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। साथ ही संविधान से मिले अधिकारों को प्रशासनिक या कानूनी बहाने से प्रतिबंधित या सीमित न किया जाए।
  5. मतदाता सूची, नागरिकता और पहचान से जुड़ी सभी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक प्रावधानों का पूरा पालन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही राष्ट्रीय मतदाता सूची (एनआरसी) और विदेशी नागरिक संबंधी मामलों में किसी भी नागरिक को संपूर्ण कानूनी प्रक्रिया, प्रभावी सुनवाई और उपलब्ध कानूनी अधिकारों के इस्तेमाल का अवसर दिए बिना विदेशी घोषित कर जबरन देश से निकालने की प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए, क्योंकि इससे न केवल बुनियादी मानवाधिकार प्रभावित होते हैं, बल्कि देश की अंतरराष्ट्रीय साख को भी नुकसान पहुंचता है।
  6. भारत सरकार अपनी ऐतिहासिक विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकार सिद्धांतों के अनुरूप फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार और मानवीय सहायता की निर्बाध आपूर्ति का हर स्तर पर समर्थन करे और इस दिशा में प्रभावी राजनयिक भूमिका निभाए। साथ ही सरकार इजरायल के साथ सैन्य, युद्ध या रक्षा सहयोग एवं समझौतों पर भी पुनर्विचार करे, ताकि भारत का पक्ष और नजरिया न्याय, शांति तथा मानवाधिकारों के सार्वभौमिक सिद्धांतों के अनुरूप बना रहे।
चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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