राजस्थान
एक घंटा पहले
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विचारों
तबेले में सिमट गया बच्चों का भविष्य
जयपुर के रामपुरा गांव की एक ऐसी सच्चाई सामने आई है जो व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यहां सरकारी स्कूल के बच्चे किसी क्लासरूम में नहीं, बल्कि पिछले करीब ढाई साल से एक किसान के तबेले में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं। तबेले का वह हिस्सा जहां पशुओं का चारा रखा जाता है, आज वहां नन्हे-मुन्ने बच्चों की किताबें और कॉपियां रखी रहती हैं। यह स्थिति उस समय से बनी हुई है जब स्कूल की पुरानी इमारत जर्जर होकर असुरक्षित हो गई थी और उसे छात्रों के लिए बंद कर दिया गया था।
किसान ने निभाई बड़ी जिम्मेदारी
इस संकट के समय में एक किसान मसीहा बनकर सामने आया। उस किसान ने अपने तबेले को बच्चों की शिक्षा के लिए निःशुल्क उपलब्ध करा दिया है। किसान का कहना है कि जब उन्होंने स्कूल की बिल्डिंग को खतरनाक हालत में देखा, तो बच्चों की पढ़ाई रुकते हुए देखना उन्हें गवारा नहीं हुआ। किसान ने अपना तबेला स्कूल प्रशासन को सौंपा ताकि बच्चों का भविष्य अंधेरे में न जाए। पिछले ढाई साल से वह बिना किसी किराए या स्वार्थ के यह जगह उपलब्ध करा रहे हैं। उनका मानना है कि परिस्थितियां कैसी भी हों, शिक्षा की निरंतरता बनी रहनी चाहिए।
जर्जर इमारत का खामोश मंजर
तबेले में पढ़ने वाले बच्चों के ठीक सामने सरकारी स्कूल की वह पुरानी बिल्डिंग दिखाई देती है, जो कभी इस गांव के बच्चों का गौरव हुआ करती थी। अब यह इमारत पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। छत और दीवारों की खराब हालत को देखते हुए इसे पूरी तरह बंद कर दिया गया है। गांव के लोग बताते हैं कि लंबे समय से स्थिति ऐसी ही बनी हुई है। स्कूल की अपनी जगह होने के बावजूद वहां ताले लटके हैं और बच्चे चारे के बगल में बैठकर जमीन पर पढ़ने को मजबूर हैं।
निर्माण कार्य और स्वीकृत बजट
ग्रामीणों के अनुसार, स्कूल की इस बदहाली को दूर करने के लिए अब सरकारी स्तर पर पहल की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, नई स्कूल बिल्डिंग के निर्माण के लिए सरकार की ओर से 18 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई है। गांव के लोगों को अब इस बात की उम्मीद है कि जल्द ही निर्माण कार्य शुरू होगा और बच्चों को तबेले की इस कठिन परिस्थितियों से मुक्ति मिलेगी। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि काम पूरा होने में कितना और वक्त लगेगा, लेकिन 18 लाख रुपये की स्वीकृति के बाद ग्रामीणों में एक नई आशा जगी है।
व्यवस्था पर उठते सवाल
रामपुरा गांव का यह मामला केवल एक बिल्डिंग का नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की सुस्ती का भी है। एक तरफ जहां सरकार शिक्षा के अधिकार और आधुनिक स्कूलों के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ जयपुर जैसे बड़े शहर के पास ही बच्चे ढाई साल से तबेले में पढ़ने के लिए विवश हैं। ग्रामीणों का आक्रोश भी इसी व्यवस्था के खिलाफ है। जब जमीनी हकीकत का जायजा लेने के लिए टीम वहां पहुंची, तो ग्रामीणों ने विरोध दर्ज कराया और स्थिति की गंभीरता को बयां किया। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में जमीनी स्तर पर कितनी बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं। फिलहाल, पूरा गांव उस दिन का इंतजार कर रहा है जब बच्चे तबेले को छोड़कर अपनी पक्की छत के नीचे बैठकर पढ़ पाएंगे।
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