पश्चिम बंगाल
3 घंटे पहले
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विचारों
परिसर की स्वच्छता और सुंदरता बनाए रखने की अपील
जादवपुर विश्वविद्यालय के कुलपति चिरंजीव भट्टाचार्य ने संस्थान के छात्रों के नाम एक विशेष संदेश जारी किया है। अपने संदेश में उन्होंने छात्रों से आग्रह किया है कि वे विश्वविद्यालय परिसर की दीवारों पर नारे लिखने और उन्हें पेंट करने की अपनी पुरानी आदत से दूरी बनाएं। कुलपति का कहना है कि संस्थान की दीवारों को सुरक्षित और साफ रखना सभी का सामूहिक दायित्व है। इसके विकल्प के रूप में, उन्होंने छात्रों को सुझाव दिया है कि वे अपनी राय और विरोध प्रदर्शन के लिए सोशल मीडिया जैसे आधुनिक माध्यमों का उपयोग कर सकते हैं। चिरंजीव भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया है कि जादवपुर विश्वविद्यालय अपनी स्वतंत्र सोच और अभिव्यक्ति के लिए हमेशा से जाना जाता रहा है। उन्होंने छात्रों और शिक्षकों से इस गौरवशाली परंपरा को बनाए रखने की गुजारिश की है, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि कैंपस का वातावरण शांत और सुंदर बना रहे।
अभिव्यक्ति की आजादी और विरासत का संतुलन
कुलपति ने एक खुले पत्र के जरिए यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि इन सुझावों का अर्थ किसी भी छात्र की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाना बिल्कुल भी नहीं है। उनका मुख्य उद्देश्य विश्वविद्यालय की विरासत और उसके शांत परिवेश की रक्षा करना है। भट्टाचार्य का मानना है कि छात्रों और शिक्षकों को मिलकर कैंपस की सौंदर्यता के प्रति अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है। उन्होंने जोर दिया कि अनुशासन और स्वतंत्र विचार के बीच संतुलन बनाना बहुत जरूरी है ताकि संस्थान की प्रतिष्ठा पर कोई आंच न आए।
विवादों का केंद्र बनी परिसर की दीवारें
यह पूरा मामला हाल ही में उस समय गरमाया जब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने विश्वविद्यालय के कला संकाय की दीवारों पर लिखे नारों पर अपनी गहरी नाराजगी जताई थी। उन्होंने इन नारों को हटाने के सख्त निर्देश दिए थे, जिसके बाद प्रशासन ने विवादित नारों को सफेद पेंट से ढक दिया था। हालांकि, कुछ समय बाद ही फिर से दीवारों पर नए नारे लिखे जाने की घटनाएं सामने आईं। इसी पृष्ठभूमि में प्रशासन ने डिजिटल माध्यमों का रुख करने की अपील की है ताकि परिसर का अनुशासन और अनुशासन बना रहे।
किन नारों को लेकर मचा था बवाल?
विश्वविद्यालय की दीवारों पर लिखे कुछ आपत्तिजनक नारों ने भारी विवाद को जन्म दिया था। इनमें 'किशनजी को लाल सलाम' और 'कश्मीर आजादी चाहता है' जैसे नारे मुख्य रूप से शामिल थे। उल्लेखनीय है कि किशनजी एक प्रमुख माओवादी नेता थे, जिन्हें साल 2011 में पुलिस के साथ हुई एक मुठभेड़ में ढेर कर दिया गया था। यह घटना उस समय हुई थी जब ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई थी। राज्य सरकार ने इन नारों को कड़ी चुनौती मानते हुए इनकी तुलना कचरे से की थी और कहा था कि शिक्षण संस्थान में इस तरह की विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं है।
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