मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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विचारों
लैपटॉप, एयर-कंडीशन्ड दफ्तर और लाखों का पैकेज, आज के ज्यादातर युवाओं की यही ख्वाहिश होती है। लेकिन जबलपुर के शिवेंद्र सिंह सेंगर ने इस चमक-दमक से अलग एक ऐसा रास्ता चुना, जिसने लोगों की सोच को नई दिशा दी है। पुणे की एक नामी कंपनी में 10-12 वर्षों तक एसोसिएट डायरेक्टर के पद पर काम करने के बाद शिवेंद्र ने 50 लाख के पैकेज वाली नौकरी को छोड़ दिया और अब वे 'स्मार्ट किसान' की पहचान बना चुके हैं।
शिवेंद्र बताते हैं कि कोविड महामारी के दौर में उन्हें अपने गृहनगर जबलपुर लौटने का अवसर मिला। यहां आकर उन्होंने खेती को सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि एक विज्ञान की तरह समझा। उन्होंने महसूस किया कि खुले खेत के मुकाबले 'नेट हाउस', 'पॉलीहाउस', 'फैन पैड' और 'हाइड्रोपोनिक्स' जैसी तकनीकों से खेती करना न सिर्फ आसान है, बल्कि इसमें मुनाफा भी कई गुना ज्यादा है। यही वजह है कि शिवेंद्र नेट हाउस फार्मिंग से हर सीजन तीन से चार लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं।
ऐसे हुई इस सफर की शुरुआत
शिवेंद्र के मुताबिक, 3 साल पहले उन्होंने सिहोरा के पास 6 एकड़ जमीन खरीदी थी। पहले डेयरी और पारंपरिक खेती करने के बाद उन्होंने आधुनिक तकनीक यानी 'प्रोटेक्टेड फार्मिंग' की ओर रुख किया। एक एकड़ में उन्होंने 28.50 लाख रुपये की लागत से अत्याधुनिक 'नेट हाउस' तैयार किया। इसमें उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग की योजना के तहत उन्हें 14.25 लाख रुपये की सब्सिडी मिली। इसके अलावा पहले साल बीज और दूसरे खर्चों के लिए 3 लाख रुपये की अतिरिक्त मदद भी दी गई थी।
खेती में 'कॉर्पोरेट' जैसा मुनाफा
पिछले 2-3 सालों से 'प्रोटेक्टेड फार्मिंग' कर रहे शिवेंद्र बताते हैं कि वे साल में 2 से 3 बार फसल लेते हैं। उन्होंने शिमला मिर्च, गेंदा फूल और अब सिंजेंटा कंपनी की हाइब्रिड 'काफ्ता' खीरे की खेती की है। उनकी कामयाबी का राज यह है कि वे 'ऑफ-सीजन' सब्जियों को निशाने पर रखते हैं। जब आम किसान मौसम की मार झेल रहे होते हैं, तब पॉलीहाउस में जलवायु नियंत्रित रहने के चलते उन्हें बाजार में बेहतर दाम मिल जाता है।
क्या है 'काफ्ता' खीरे की खेती का गणित
शिवेंद्र बताते हैं कि यह हाइब्रिड खीरा जुकिनी और देसी ककड़ी का मिश्रण है, जो बीज रहित होता है। एक एकड़ में 7 से 10 हजार पौधे लगाए जा सकते हैं, जहां हर पौधे से 2 से 5 किलो पैदावार मिलने की संभावना रहती है। महज 3 से साढ़े 3 महीने के भीतर 80 से 100 टन तक पैदावार लेने की क्षमता है।
उन्होंने बताया कि 35 से 40 दिनों की फसल में हर बेल पर 5 से 10 ककड़ियां लगी हुई हैं। प्रत्येक ककड़ी का वजन 150 से 200 ग्राम है और हर बेल पर 15 से 20 फूल लगे हुए हैं।
युवाओं के लिए मिसाल
किसान शिवेंद्र की यह कहानी उन युवाओं के लिए एक मिसाल है, जो खेती को सिर्फ नुकसान का सौदा मानते हैं। उन्होंने अपनी मेहनत और आधुनिक तकनीक के बल पर न केवल आत्मनिर्भरता हासिल की है, बल्कि खेती में करियर की नई राहें भी खोल दी हैं।
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