राष्ट्रीय राजनीति
7 घंटे पहले
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विचारों
प्रस्तावित कानून पर मौलाना मुश्ताक मलिक का विरोध
महाराष्ट्र में धर्मांतरण के मुद्दे को लेकर इन दिनों एक नया कानून प्रस्तावित है, जिस पर राज्य में बहस छिड़ गई है। इस विवाद के बीच तहरीक मुस्लिम शब्बान के अध्यक्ष मौलाना मुश्ताक मलिक ने कड़ा रुख अपनाते हुए इस कानून के कई प्रावधानों पर सवाल खड़े किए हैं। मौलाना मलिक का कहना है कि यह कानून पूरी तरह से विवादास्पद हो सकता है और इसका दुरुपयोग होने की पूरी संभावना है। उन्होंने धर्म परिवर्तन को किसी व्यक्ति की निजी सोच, विचार और आस्था का स्वतंत्र विषय बताया है। उनका मानना है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन के इस अत्यंत निजी फैसले में सरकार या प्रशासन का जबरन दखल देना गलत है।
कानून के दुरुपयोग की आशंका
मौलाना मुश्ताक मलिक ने अपने बयान में कहा कि जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी द्वारा शासित राज्यों में धर्म परिवर्तन से जुड़े कानूनों को लागू किया जा रहा है, वह चिंता का विषय है। उन्होंने विशेष रूप से उन कानूनी प्रावधानों पर आपत्ति जताई है जो धर्मांतरण के बाद बच्चों की धार्मिक पहचान और उनके संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित हैं। उनका तर्क है कि कानून में मौजूद अस्पष्टता का लाभ उठाकर लोगों को परेशान किया जा सकता है और उन पर अनुचित दबाव बनाया जा सकता है। उन्होंने साफ कहा कि धर्म और व्यक्तिगत पसंद से जुड़े मामलों को केवल समाज के किसी वर्ग के संदेह या दबाव के कारण अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए।
शरीयत के विरासत नियमों से टकराव
मौलाना मलिक ने कानूनी बारीकियों पर चर्चा करते हुए एक महत्वपूर्ण तर्क दिया। उन्होंने कहा कि यदि कानून में यह प्रावधान रखा जाता है कि जबरन धर्मांतरण के मामलों में पैदा हुई संतान को दोनों पक्षों की संपत्ति में उत्तराधिकारी माना जाएगा, तो यह इस्लाम के शरीयत कानून के विरासत संबंधी प्रावधानों के साथ सीधा टकराव पैदा कर सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में जबरन धर्म परिवर्तन साबित होता है और उसके बाद पैदा हुई संतान की कस्टडी मां को देने का प्रावधान है, तो उस पर उन्हें कोई बड़ी आपत्ति नहीं है। लेकिन संपत्ति के मामले में शरीयत के सिद्धांतों की अनदेखी स्वीकार्य नहीं है।
प्रेम और जिहाद पर क्या बोले मौलाना
लव जिहाद के बढ़ते चलन और उसके इर्द-गिर्द हो रही राजनीति पर मौलाना मलिक ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रेम और जिहाद दो पूरी तरह से अलग अवधारणाएं हैं। अंतरधार्मिक विवाहों को केवल धर्म के नजरिए से देखकर उसे लव जिहाद करार देना कतई उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि जब दो बालिग लोग अपनी मर्जी से साथ रहने या विवाह करने का निर्णय लेते हैं, तो इसे राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय उनके संवैधानिक अधिकारों के तहत देखा जाना चाहिए।
अदालती फैसलों का दिया हवाला
अपनी बात को पुख्ता करने के लिए मौलाना मुश्ताक मलिक ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक पुराने मामले का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि कोर्ट ने दो बालिग बहनों के धर्म परिवर्तन और उनके विवाह के मामले में यह साफ किया था कि वयस्क होने के नाते वे अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने और धर्म बदलने के लिए स्वतंत्र हैं। अदालत ने उस मामले में उनकी मर्जी और उनके अधिकारों को प्राथमिकता दी थी और संबंधित पक्षों पर जुर्माना भी लगाया था। अंत में मौलाना ने कहा कि धर्म परिवर्तन और अंतरधार्मिक विवाह जैसे संवेदनशील विषयों का राजनीतिकरण करना समाज के ताने-बाने के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है और इसे बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।
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