रूस, अमेरिका और फ्रांस की जरूरत खत्म: भारत बनाएगा 5 स्वदेशी 'वज्रास्त्र', ऊर्जा क्षेत्र में आएगा बड़ा बदलाव राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 3
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अब विदेशी देशों पर निर्भर नहीं रहेगा और साल 2033 तक 5 स्वदेशी स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) तैनात करेगा, जिससे देश में बिजली की समस्या का स्थायी समाधान हो सकेगा।

आत्मनिर्भरता की ओर भारत का ऐतिहासिक कदम

भारत ने ऊर्जा के क्षेत्र में अपनी विदेशी निर्भरता को पूरी तरह खत्म करने की दिशा में एक बहुत बड़ा और साहसिक फैसला लिया है। अब तक भारत अपनी परमाणु ऊर्जा से जुड़ी जरूरतों के लिए रूस, अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों के साथ तालमेल बिठाने को मजबूर था, लेकिन आने वाले समय में स्थितियां पूरी तरह बदलने वाली हैं। भारत सरकार ने एक महा-लक्ष्य तय किया है, जिसके तहत साल 2033 तक देश में 5 अत्यंत आधुनिक और पूरी तरह स्वदेशी 'वज्रास्त्र' यानी स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) तैयार कर उन्हें चालू कर दिया जाएगा। यह कदम 2047 तक भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर नई ऊंचाइयों तक ले जाने के विजन का एक अभिन्न हिस्सा है। जैसे ही भारत अपने विशाल प्राकृतिक खजाने और घरेलू तकनीक का इस्तेमाल बड़े स्तर पर शुरू करेगा, वैसे ही विदेशी तकनीक और कच्चे माल के लिए किसी भी दूसरे मुल्क के आगे हाथ फैलाने की नौबत नहीं आएगी।

क्या हैं भारत के 5 'वज्रास्त्र'

न्यूक्लियर एनर्जी का बाजार लंबे समय से दुनिया के गिने-चुने विकसित देशों के हाथों में रहा है। भारत, जो एक उभरती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था है, उसे भी अपने पावर प्लांट्स और ईंधन की आपूर्ति के लिए अक्सर रूस, अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। हालांकि, भारत ने अब जो मास्टरस्ट्रोक चला है, वह न केवल विदेशियों के वर्चस्व को खत्म करेगा, बल्कि देश में बिजली संकट का हमेशा के लिए पक्का इलाज कर देगा। सरकार ने संसद के पटल पर आधिकारिक घोषणा की है कि साल 2033 तक देश में कम से कम 5 स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स का निर्माण कार्य पूरा करके उन्हें काम में ला दिया जाएगा।

क्यों जरूरी है यह बड़ा मिशन

यह मिशन भारत के उस व्यापक ड्रीम प्रोजेक्ट का एक प्रमुख हिस्सा है, जिसमें साल 2047 तक भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावाट (GWe) तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। भारत पारंपरिक रूप से बड़े परमाणु संयंत्रों पर निर्भर रहा है, जिन्हें स्थापित करने में न केवल लंबा समय लगता था, बल्कि बजट और जमीन अधिग्रहण की जटिलताएं भी एक बड़ी बाधा बनकर सामने आती थीं। इसके उलट, स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स यानी SMRs आकार में बेहद छोटे, अत्यधिक सुरक्षित और आधुनिक तकनीक से लैस होते हैं। इनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इन्हें कारखानों के अंदर ही निर्मित किया जा सकता है और फिर जरूरत के स्थान पर ले जाकर आसानी से असेंबल किया जा सकता है। जिन पुराने कोयला आधारित बिजली घरों को अब बंद किया जा रहा है, उनकी जगह पर इन छोटे रिएक्टर्स को फिट करना काफी आसान और किफायती साबित होगा। साथ ही, स्टील और सीमेंट जैसे भारी उद्योगों को चौबीस घंटे निर्बाध बिजली देने के लिए ये रिएक्टर्स एक अचूक 'वज्रास्त्र' का काम करेंगे।

मेक इन इंडिया का दम

भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने स्वदेशी तकनीक के आधार पर तीन विशिष्ट डिजाइन तैयार किए हैं। इनमें पहला 220-मेगावाट का 'भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर' (BSMR-200), दूसरा 55-मेगावाट क्षमता वाला 'SMR-55' और तीसरा 5-मेगावाट क्षमता का 'हाई-टेम्परेचर गैस-कूल्ड रिएक्टर' शामिल है। विशेष रूप से HTGCR तकनीक इतनी प्रभावशाली है कि यह बिजली उत्पन्न करने के साथ-साथ भविष्य के सबसे स्वच्छ ईंधन माने जाने वाले हाइड्रोजन का उत्पादन भी करेगी। इससे भारत को विदेशों से महंगा तेल और गैस आयात करने की मजबूरी से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी।

अब तक किन देशों पर थी निर्भरता

भारत ने अब तक दो मुख्य क्षेत्रों में विदेशी सहयोग की राह चुनी थी: पहली परमाणु ईंधन (यूरेनियम) और दूसरी अत्याधुनिक रिएक्टर टेक्नोलॉजी।

  • कजाकिस्तान और कनाडा: अपने रिएक्टर्स को संचालित करने के लिए भारत यूरेनियम का एक बड़ा हिस्सा कजाकिस्तान से लेता है, साथ ही कनाडा के साथ भी यूरेनियम आपूर्ति के लिए दीर्घकालिक समझौते मौजूद हैं।
  • रूस: तमिलनाडु के कुडानकुलम में स्थापित विशाल पावर प्लांट के लिए रूस ने रिएक्टर टेक्नोलॉजी (VVER-1000) मुहैया कराई है, और ईंधन की आपूर्ति भी वहीं से होती है।
  • फ्रांस और अमेरिका: महाराष्ट्र के जैतापुर प्रोजेक्ट में फ्रांस की तकनीक का उपयोग किया जा रहा है, वहीं अमेरिका के साथ भी एडवांस रिएक्टर्स को लेकर लगातार चर्चाएं चलती रही हैं।
  • मेडिकल आइसोटोप्स: कैंसर के उपचार और जांच में आवश्यक आइसोटोप्स के लिए भारत को कनाडा, नीदरलैंड्स और रूस जैसे देशों से आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।

भारतीय कंपनियों की बढ़ी भागीदारी

विदेशी कंपनियों के हस्तक्षेप को न्यूनतम करने के लिए भारत सरकार ने 'सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया' यानी SHANTI Act, 2025 पेश किया है। इस कानून के बाद देश की निजी कंपनियां, बड़े निवेशक और उभरते हुए स्टार्टअप्स अब परमाणु रिएक्टरों के निर्माण, इंजीनियरिंग और अनुसंधान जैसे जटिल कार्यों में सीधे तौर पर योगदान दे सकेंगे। भारतीय निर्माता पहले से ही रिएक्टर प्रेशर वेसल्स और कंट्रोल ड्राइव मैकेनिज्म जैसे महत्वपूर्ण पुर्जे घरेलू स्तर पर तैयार कर रहे हैं। इस पूरे काम पर एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (AERB) पैनी नजर रखेगा ताकि सुरक्षा मानकों में कोई ढील न आए।

थोरियम का ब्रह्मास्त्र

भारत के पास थोरियम का दुनिया में सबसे विशाल भंडार उपलब्ध है। अब तक यूरेनियम की कमी के कारण भारत को विदेशों की ओर देखना पड़ता था, लेकिन देश का तीन चरणों वाला न्यूक्लियर प्रोग्राम अब तेजी से थोरियम आधारित तकनीक की तरफ बढ़ रहा है। कल्पक्कम स्थित कामिनी (KAMINI) रिएक्टर में थोरियम ईंधन का सफल परीक्षण पहले ही संपन्न हो चुका है। जैसे-जैसे भारत थोरियम का व्यावसायिक उपयोग बढ़ाएगा, वैसे-वैसे यूरेनियम के लिए रूस, अमेरिका या फ्रांस के आगे गिड़गिड़ाने की जरूरत पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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