धान की पौध का पीलापन फसल को कर सकता है बर्बाद, जानिए 72 घंटे में इसे फिर से हरा-भरा करने का वैज्ञानिक तरीका भारत एक महीने पहले 57
खरीफ सीजन में धान की नर्सरी का अचानक पीला पड़ना किसानों के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गया है, लेकिन विशेषज्ञ इसके लिए बेहद आसान और त्वरित समाधान लेकर आए हैं।

धान की नर्सरी में पीलापन: खरीफ सीजन में किसानों के लिए खड़ा हुआ नया संकट

देशभर में खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही धान की खेती की सरगर्मियां तेज हो गई हैं। किसानों ने अपने खेतों में धान की रोपाई के लिए नर्सरी तैयार कर ली है और कई जगहों पर रोपाई का काम शुरू भी हो चुका है। हालांकि, इसी बीच कई राज्यों के किसानों के सामने एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है। खेतों में तैयार की गई धान की नर्सरी यानी पौध अचानक पीली पड़ने लगी है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि धान की पौध का यह पीलापन बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। अगर सही समय पर इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो किसानों की महीनों की मेहनत और पूरी फसल तबाह हो सकती है।

मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों जैसे लोहा और नाइट्रोजन की भारी कमी के साथ-साथ खेतों में अत्यधिक पानी का जमा होना इस समस्या की सबसे मुख्य वजह है। राहत की बात यह है कि कृषि वैज्ञानिकों ने इस समस्या का एक बेहद आसान, किफायती और अचूक समाधान निकाल लिया है। इस वैज्ञानिक तरीके को अपनाकर किसान भाई मात्र तीन दिनों के भीतर अपनी पीली पड़ी पौध को दोबारा पूरी तरह हरा-भरा और स्वस्थ बना सकते हैं।

धान की पौध पीली होने के पीछे क्या हैं मुख्य कारण?

धान की नर्सरी का पीला पड़ना कोई साधारण बात नहीं है, बल्कि यह पौधों के बीमार होने का एक स्पष्ट संकेत है। प्रगतिशील युवा किसान रनजोद सिंह का कहना है कि अक्सर किसान इस शुरुआती लक्षण को नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे आगे चलकर फसल की पूरी बर्बादी का रास्ता साफ हो जाता है। उनके अनुसार, इस समस्या के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण काम कर रहे हैं:

  • क्लोरोफिल के निर्माण में बाधा: जब मिट्टी में नाइट्रोजन या लोहे (आयरन) जैसे महत्वपूर्ण तत्वों की कमी हो जाती है, तो पौधों की पत्तियों में क्लोरोफिल का बनना बंद हो जाता है। क्लोरोफिल ही वह तत्व है जो पौधों को उनका प्राकृतिक हरा रंग देता है और भोजन बनाने में मदद करता है। इसकी कमी के कारण पत्तियां धीरे-धीरे पीली होकर सूखने लगती हैं।
  • अत्यधिक पानी का जमा होना: बहुत से किसानों की यह आदत होती है कि वे धान की नर्सरी में लगातार पानी भरकर रखते हैं। खेतों में जरूरत से ज्यादा जलभराव होने से पौधों की जड़ों को ऑक्सीजन मिलना पूरी तरह बंद हो जाता है। जब जड़ें सांस नहीं ले पातीं, तो वे मिट्टी से पोषक तत्वों का अवशोषण बंद कर देती हैं, जिससे पौधे ऊपर से नीचे की तरफ पीले होने लगते हैं।

देश के विभिन्न हिस्सों में गहराया संकट और उत्पादन पर असर

धान की रोपाई का काम जैसे ही गति पकड़ रहा है, देश के विभिन्न हिस्सों से, विशेष रूप से शाहजहांपुर और आसपास के इलाकों से धान की नर्सरी के पीली पड़ने की लगातार शिकायतें आ रही हैं। किसानों का कहना है कि शुरुआत में जो पौध बेहद स्वस्थ और अच्छी दिख रही थी, वह अचानक पीली पड़ने लगी है। इस वजह से पौधों का विकास पूरी तरह से रुक गया है और उनकी लंबाई नहीं बढ़ पा रही है।

यदि समय रहते इस समस्या का वैज्ञानिक उपचार नहीं किया गया, तो मुख्य खेतों में रोपाई के लिए आवश्यक मात्रा में स्वस्थ पौधे उपलब्ध नहीं हो पाएंगे। रोपाई में देरी होने या कमजोर पौधों का उपयोग करने से इस साल धान के कुल उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है, जिससे किसानों की आमदनी को करारा झटका लगेगा।

वैज्ञानिकों का अचूक और त्वरित समाधान: 72 घंटे में दिखेगा असर

इस समस्या से चिंतित किसानों के लिए वैज्ञानिकों ने एक बहुत ही कारगर और तुरंत काम करने वाला फार्मूला तैयार किया है। इस फार्मूले के तहत किसानों को अपनी खड़ी नर्सरी पर एक खास संतुलित घोल का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। किसान इस विधि को इस तरह अपना सकते हैं:

  • प्रति एकड़ नर्सरी के हिसाब से 0.5 प्रतिशत फेरस सल्फेट (यानी लोहा) और 1 प्रतिशत यूरिया का एक संयुक्त घोल तैयार करें।
  • इस तैयार घोल को खड़ी नर्सरी पर समान रूप से छिड़कें।
  • इस घोल में मौजूद यूरिया पौधों को तत्काल नाइट्रोजन प्रदान करेगा, जिससे उनकी विकास प्रक्रिया दोबारा शुरू हो जाएगी।
  • वहीं, फेरस सल्फेट पौधों में लोहे की कमी को दूर करके क्लोरोफिल के निर्माण को बढ़ावा देगा, जिससे पत्तियों का हरा रंग तेजी से वापस आ जाएगा।

विशेषज्ञों का दावा है कि इस घोल का छिड़काव करने के मात्र 48 से 72 घंटों यानी दो से तीन दिनों के भीतर ही आपकी पीली पड़ चुकी पौध फिर से पूरी तरह से चमकदार, हरी-भरी और रोपाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाएगी।

जलभराव का सही प्रबंधन और आवश्यक सावधानियां

दवा के छिड़काव के साथ-साथ किसानों को अपने खेतों के प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान देना होगा। जब तक खेतों की स्थिति में सुधार नहीं होगा, तब तक किसी भी उर्वरक या रसायन का असर पूरी तरह नहीं दिखाई देगा। इसलिए किसानों को नीचे दी गई सावधानियों का पालन जरूर करना चाहिए:

  • निकासी की व्यवस्था: सबसे पहले नर्सरी बेड में जमा हुए अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने का तुरंत उपाय करें।
  • उचित नमी: खेत में हमेशा पानी भरकर रखने के बजाय केवल उतनी ही नमी बनाए रखें जितनी पौधों की जड़ों के जीवित रहने और बढ़ने के लिए आवश्यक हो।
  • हवादार मिट्टी: वैज्ञानिकों का कहना है कि जब मिट्टी थोड़ी सूखी और हवादार होती है, तब छिड़काव का असर दोगुना तेजी से होता है क्योंकि सूखी जड़ें पोषक तत्वों को अधिक तेजी से खींच पाती हैं।

इन वैज्ञानिक उपायों और थोड़ी सी सावधानी को अपनाकर किसान भाई अपनी फसल को इस बड़े संकट से सुरक्षित निकाल सकते हैं और एक बंपर पैदावार की मजबूत नींव रख सकते हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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