भीषण गर्मी के कारण एआई डेटा सेंटरों पर संकट, कूलिंग की समस्या से जूझ रहीं बड़ी टेक कंपनियां भारत 2 महीने पहले 48
बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन ने दुनिया भर में एआई डेटा सेंटरों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कूलिंग के लिए अधिक बिजली और पानी की खपत ने इन सेंटरों की कार्यक्षमता और लागत पर बड़ा असर डाला है।

गर्मी का कहर और डेटा सेंटरों की बदहाली

दुनिया भर में तेजी से फैल रही भीषण गर्मी और बदलता मौसम अब केवल आम जनजीवन ही नहीं, बल्कि तकनीक की दुनिया को भी प्रभावित कर रहा है। आज के दौर में जब हर जगह एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बोलबाला है, इसके लिए जरूरी डेटा सेंटर एक बड़ी मुसीबत का सामना कर रहे हैं। इन सेंटरों के अंदर लगी शक्तिशाली चिप्स को ठंडा रखना टेक कंपनियों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। भीषण गर्मी की वजह से ये डेटा सेंटर अब हांफते हुए नजर आ रहे हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर दिग्गज टेक कंपनियां भारी तनाव में हैं।

क्यों बढ़ रही है टेक कंपनियों की चिंता

माइक्रोसॉफ्ट और एनवीडिया जैसी बड़ी कंपनियां अपने डेटा सेंटर के बुनियादी ढांचे और डिजाइन को बदलने के लिए मजबूर हो गई हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि इन सेंटरों को हर मौसम में सुरक्षित रखने के लिए विशेष इंतजाम करने पड़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण इन सुविधाओं को संचालित करने की लागत में कई गुना बढ़ोतरी देखी गई है, जो कंपनियों के मुनाफे और भविष्य की योजनाओं पर सीधा असर डाल रही है।

बिजली की भारी खपत और ब्लैकआउट का खतरा

डेटा सेंटरों में लगे सर्वर बेहद एडवांस और शक्तिशाली होते हैं। इन चिप्स को निरंतर काम करने के लिए भारी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है। डेटा सेंटरों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनमें कुल बिजली का करीब 40% हिस्सा केवल चिप्स को ठंडा रखने के लिए उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, ये सेंटर लाखों लीटर पानी का उपयोग कूलिंग प्रक्रिया में करते हैं।

गर्मियों के दौरान शहरों में बिजली की मांग पहले से ही चरम पर होती है। ऐसे में जब डेटा सेंटर भी इतनी अधिक बिजली खींचते हैं, तो पावर ग्रिड पर दबाव बढ़ जाता है, जिससे ब्लैकआउट यानी बिजली कटौती का खतरा पैदा हो जाता है। उदाहरण के तौर पर, इटली के ट्यूरिन शहर में तापमान 38 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के बाद जमीन के अंदर बिछी बिजली की केबल गर्म हो गईं, जिसके परिणामस्वरूप बार-बार बिजली गुल होने की समस्या सामने आई। ऐसी घटनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि बढ़ती गर्मी डेटा सेंटर की निर्बाध बिजली आपूर्ति में बड़ी बाधा है।

मौसम की मार और भौगोलिक चुनौतियां

ज्यूरिख इंश्योरेंस की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, आज पूरी दुनिया के लगभग 79% डेटा सेंटर किसी न किसी प्रकार के मौसमी खतरे की चपेट में हैं। केवल गर्मी ही नहीं, बल्कि तेज हवाएं और ओलावृष्टि जैसे प्राकृतिक घटनाक्रम भी डेटा सेंटरों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

इन खतरों से बचने के लिए कंपनियों ने अपने डेटा सेंटरों को ग्रामीण या दूरदराज के इलाकों में शिफ्ट करना शुरू कर दिया है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि इस साल 64% टेक कंपनियों ने अपने सेंटर शहरों से दूर स्थानांतरित किए हैं। हालांकि, इन इलाकों में भी शांति नहीं है। वहां के खुले वातावरण में तेज हवाएं और ओलावृष्टि डेटा सेंटरों के बाहरी कूलिंग टावरों को तोड़-मरोड़ रही हैं, जिससे उन्हें ठंडा रखना और भी कठिन हो गया है।

समाधान की तलाश में जुटी दिग्गज कंपनियां

बढ़ते संकट को देखते हुए माइक्रोसॉफ्ट और एनवीडिया जैसी कंपनियों ने कमर कस ली है। वे अपने डेटा सेंटर के पुराने डिजाइन को पूरी तरह बदल रही हैं। इन सुधारों के तहत अपनाए जा रहे प्रमुख तरीके निम्नलिखित हैं:

  • माइक्रोसॉफ्ट अब रियल टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम और बेहतर बैकअप तकनीक का उपयोग कर रही है ताकि किसी भी तरह की विफलता से पहले ही चेतावनी मिल सके।
  • एनवीडिया ने विशेष प्रकार के डेटा सेंटर डिजाइन किए हैं जो 45 डिग्री सेल्सियस तक के उच्च तापमान में भी बिना किसी रुकावट के काम कर सकते हैं।
  • इन नए मॉडलों में विशेष कूलिंग लिक्विड का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो परंपरागत हवा आधारित कूलिंग के मुकाबले काफी प्रभावी है।
  • इन वैकल्पिक व्यवस्थाओं के जरिए कंपनियों को अपनी बिजली लागत में लगभग 4% तक की कमी होने की उम्मीद है।

हालांकि, ये सभी प्रयोग अभी शुरुआती चरण में हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ये तकनीकें भविष्य में आने वाली और भी भीषण गर्मी का सामना करने में सक्षम होंगी या कंपनियों को कुछ और ठोस कदम उठाने पड़ेंगे। अभी के लिए, डेटा सेंटरों को बचाना और उन्हें ठंडा रखना ही टेक जगत की सबसे बड़ी प्राथमिकता बनी हुई है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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