'वो तो नौकरानी थी, उसका बेटा मेरा कैसे'— DNA जांच से कतराता रहा शिक्षक, फिर हाई कोर्ट ने सुना दिया फैसला मध्य प्रदेश 2 घंटे पहले 3
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने डीएनए टेस्ट कराने से बार-बार इनकार करने वाले शिक्षक बसंतीलाल को बच्चे का पिता मानते हुए सीमाबाई और उसके बेटे को हर महीने 10 हजार रुपये भरण पोषण देने का आदेश दिया है।

राजगढ़ के एक शासकीय शिक्षक पर एक महिला ने आरोप लगाया था कि वह उसकी पत्नी है और उससे उसका एक बच्चा भी है। मगर शिक्षक लगातार दोनों को अपनाने से मुकरता रहा। उसकी दलील थी कि महिला तो उसके घर में महज नौकरानी थी, फिर भला उसका बच्चा उसका कैसे हो सकता है। यह मामला आखिरकार मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच तक पहुंचा, जहां सुनवाई के बाद अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

डीएनए टेस्ट से बचता रहा शिक्षक

सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकारी शिक्षक को कई बार डीएनए टेस्ट कराने के लिए कहा, लेकिन हर बार वह इसके लिए राजी नहीं हुआ। इसी टालमटोल को हाईकोर्ट ने शिक्षक की सबसे बड़ी चालाकी माना। अदालत ने स्पष्ट कहा कि जांच से भागने का सीधा मतलब है कि महिला का दावा पूरी तरह सच है। इसी आधार पर कोर्ट ने शिक्षक को ही बच्चे का असली पिता मानते हुए मां और बेटे को हर महीने गुजारा भत्ता देने का आदेश जारी कर दिया।

2014 में शुरू हुआ था पूरा मामला

इस पूरे विवाद की शुरुआत साल 2014 में हुई थी, जब पीड़ित महिला सीमाबाई ने अपने और अपने बेटे के भरण पोषण के लिए अदालत में आवेदन दिया था। सीमाबाई का कहना था कि उसकी शादी बसंतीलाल नाम के सरकारी शिक्षक से हुई थी और यह बच्चा भी दोनों का ही है। मगर शादी के कुछ ही समय बाद शिक्षक ने अपनी पत्नी और नन्हे बच्चे को मारपीट कर घर से बाहर निकाल दिया था।

नौकरानी बताकर बचने की कोशिश

दूसरी ओर, अपनी सरकारी नौकरी बचाने और पैसा न देने के चक्कर में शिक्षक बसंतीलाल अदालत में एक अजीब कहानी सुनाता रहा। उसका कहना था कि उसकी शादी तो पहले ही किसी और से हो चुकी है और सीमाबाई को उसने सिर्फ नौकरानी के रूप में अपने घर में रखा था, जो घर का कामकाज और खाना बनाने का काम करती थी।

शुरुआत में निचली अदालतों ने कागजी सबूतों की कमी का हवाला देते हुए महिला और बच्चे की इस मांग को खारिज कर दिया था। इसके बाद यह मामला ग्वालियर हाईकोर्ट पहुंचा। यहां जब सच्चाई जानने के लिए बच्चे और शिक्षक का डीएनए टेस्ट कराने की मांग उठी, तो शिक्षक घबरा गया और उसने जांच कराने से साफ इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने शिक्षक की इसी आनाकानी को अपने फैसले का सबसे बड़ा आधार बनाया। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में शादी साबित करने के लिए किसी बड़े आपराधिक मामले जैसे कड़े सबूतों की जरूरत नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई पुरुष और महिला समाज में पति-पत्नी की तरह एक ही घर में साथ रहे हैं, तो कानून यही मानेगा कि उनके बीच विवाह हुआ था।

हर महीने 10 हजार रुपये का आदेश

जस्टिस गजेंद्र सिंह की अदालत ने निचली अदालतों के पुराने फैसलों को रद्द करते हुए पीड़ित मां और उसके बेटे के पक्ष में फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि शिक्षक बसंतीलाल अपनी पत्नी सीमाबाई और बेटे को पांच-पांच हजार रुपये यानी कुल मिलाकर 10 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता हर हाल में देगा।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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