गुजरात
एक घंटा पहले
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अहमदाबाद पुलिस की बड़ी कार्रवाई
अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर अनुपम सिंह गहलोत ने हाल ही में एक हाई-प्रोफाइल साइबर घोटाले, जिसे 'बॉस स्कैम' नाम दिया गया है, का बड़ा खुलासा किया है। इस मामले की जांच में एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का पता चला है जो सीधे तौर पर चीन और पाकिस्तान में बैठे साइबर अपराधियों को भारत में डिजिटल अपराध करने के लिए जरूरी आधारभूत ढांचा यानी इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया करा रहा था। पुलिस के अनुसार, इस पूरे गोरखधंधे को पिछले 4 से 5 वर्षों से बड़ी चालाकी से चलाया जा रहा था। इस मामले में पुलिस ने पश्चिम बंगाल से दो मुख्य आरोपियों, इमरान अली पियाड़ा और इंजामुल को गिरफ्तार किया है। छापेमारी के दौरान पुलिस ने आरोपियों के पास से 07 मोबाइल फोन बरामद किए, जिनमें से 3 एंड्रॉयड फोन और 4 कीपैड फोन शामिल थे। इसके अलावा, भारी मात्रा में सिम कार्ड और एक राउटर भी जब्त किया गया है, जिसका इस्तेमाल इस डिजिटल अपराध में किया जा रहा था।
इस्लामाबाद से संचालित हो रहा था कॉल सेंटर
पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपियों का यह गिरोह न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साइबर हमले करने के लिए तकनीकी सेवाएं प्रदान कर रहा था। पुलिस कमिश्नर गहलोत ने बताया कि ये अपराधी बड़ी संख्या में सिम कार्ड खरीदते थे और उन्हें उन विदेशी तत्वों को उपलब्ध कराते थे जो पाकिस्तान या चीन में बैठकर भारत में ठगी को अंजाम दे रहे थे। इन अपराधों के लिए चीनी मैलवेयर का इस्तेमाल किया जाता था और इनके तार सीधे इस्लामाबाद से संचालित हो रहे कॉल सेंटर्स से जुड़े थे। यदि कोई अनजाने में अपराधी द्वारा भेजे गए संदिग्ध लिंक पर क्लिक करता था, तो ये ठग तुरंत अवैध तरीके से पैसे ट्रांसफर करवा लेते थे। अभी तक की पड़ताल में पता चला है कि यह स्कैम देश के 26 अलग-अलग राज्यों में फैला हुआ था, जहां इस गिरोह के खिलाफ कुल 251 शिकायतें पहले ही दर्ज हो चुकी हैं। इस बड़े पैमाने पर ठगी के लिए आरोपियों ने कुल 4,500 सिम कार्ड का इंतजाम किया था।
ओटीपी बेचने का धंधा
साइबर अपराधियों की कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालते हुए पुलिस ने बताया कि आरोपी मुख्य रूप से ओटीपी यानी वन-टाइम पासवर्ड बेचने का काम करते थे। जांच के मुताबिक, इन लोगों ने अब तक लगभग 21,000 ओटीपी उपलब्ध कराए हैं। अपनी गतिविधियों को छुपाने और पुलिस की पकड़ से बचने के लिए उन्होंने टेलीग्राम को छोड़कर व्हाट्सएप ग्रुप का सहारा लेना शुरू कर दिया था। पुलिस के मुताबिक, ये आरोपी हर एक ओटीपी के बदले 100 रुपये वसूलते थे। जांच में एक गहरी अंतरराष्ट्रीय साजिश का पता चला है, जिसमें करीब 10,000 डिजिटल डिवाइस यानी लैपटॉप और मोबाइल फोन को इस नेटवर्क से जोड़ा गया था।
किस तरह दिया जाता था घटना को अंजाम
यह घोटाला बड़े ही शातिर तरीके से अंजाम दिया जाता था। साइबर अपराधी खुद को भारतीय रिजर्व बैंक अथवा किसी अन्य सरकारी संस्था का अधिकारी बताते थे। इसके बाद वे किसी कंपनी के सीईओ या डायरेक्टर को व्हाट्सएप या ईमेल के जरिए एक जिप फाइल भेजते थे। इस फाइल के भीतर हानिकारक मैलवेयर और सिस्टम लाइब्रेरी फाइलें होती थीं। जब कोई कर्मचारी गलती से इन फाइलों को व्हाट्सएप वेब के जरिए अपने कंप्यूटर या लैपटॉप पर चलाता था, तो अपराधी व्हाट्सएप वेब सेशन का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेते थे। इसके बाद अपराधी सीईओ या डायरेक्टर की प्रोफाइल फोटो का इस्तेमाल कर उनकी हूबहू नकल करते थे। फिर तत्काल वित्तीय लेन-देन की जरूरत बताकर फाइनेंस डिपार्टमेंट के कर्मचारियों को पैसे ट्रांसफर करने का आदेश दिया जाता था। चूंकि अपराधी असली नंबर हटाकर अपने नंबर को उसी नाम से सेव कर लेते थे, इसलिए कर्मचारियों को शक नहीं होता था और वे बिना किसी सत्यापन के पैसे भेज देते थे।
आरोपी इमरान अली पियाड़ा की भूमिका
मुख्य आरोपी इमरान अली पियाड़ा ने बीए तक की शिक्षा प्राप्त की है और वह एयरटेल, जियो, वीआई तथा बीएसएनएल जैसी दूरसंचार कंपनियों के लिए पॉइंट ऑफ सेल यानी पीओएस के रूप में काम कर रहा था। अपनी इस नौकरी का फायदा उठाते हुए वह ग्राहकों के बायोमेट्रिक फिंगरप्रिंट का गलत इस्तेमाल करता था। वह ग्राहकों के नाम पर चुपके से डमी सिम कार्ड निकलवा लेता था। इन सिम कार्ड का इस्तेमाल वह साइबर अपराधियों को व्हाट्सएप अकाउंट सक्रिय करने में करता था। इमरान ने पिछले पांच वर्षों में ई-कॉमर्स और गेमिंग एप्लिकेशन के लिए लगभग 21,000 ओटीपी बेचे, जिससे उसने 21 लाख रुपये से अधिक कमाए। इसके अलावा व्हाट्सएप अकाउंट एक्टिवेट करने के लिए 900 ओटीपी 250 रुपये प्रति ओटीपी की दर से बेचकर उसने 2 लाख 25 हजार रुपये से अधिक की अतिरिक्त आय अर्जित की।
आरोपी इंजामुल की भूमिका
दूसरे आरोपी इंजामुल ने भी बीए तक की पढ़ाई की है। जांच में स्पष्ट हुआ है कि इंजामुल सीधे तौर पर उन साइबर ठगों के संपर्क में था जो विदेशों से भारत में यह जाल चला रहे थे। वह डमी सिम कार्ड और व्हाट्सएप आधारित संचार प्रणालियों के प्रबंधन में मुख्य भूमिका निभाता था। उसने सिम कार्ड और मोबाइल नंबरों के तालमेल में सहयोग दिया और ठगी करने वाले गिरोह को आवश्यक तकनीकी सहायता मुहैया कराई। वह इस पूरी आपराधिक गतिविधि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था जो लगातार ठगों के साथ समन्वय कर रहा था।
नागरिकों के लिए चेतावनी
पुलिस कमिश्नर अनुपम सिंह गहलोत ने स्पष्ट किया कि पुलिस ने इन सभी संदिग्ध डिवाइस को डीएक्टिवेट करवा दिया है, जो इस नेटवर्क के लिए एक बड़ा झटका है। उन्होंने आम जनता से सतर्क रहने की अपील की है। उन्होंने विशेष रूप से चेतावनी दी कि किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक करने या बिना पुष्टि के किसी भी फाइल को खोलने से बचें। ये लिंक ही वह जरिया हैं जिनसे साइबर ठग आपके बैंक खातों तक पहुंच बना लेते हैं। इस पूरे अंतरराष्ट्रीय मॉड्यूल और इसमें शामिल स्थानीय साथियों की भूमिका को लेकर अभी भी गहन जांच की जा रही है और पुलिस को भविष्य में और भी खुलासे होने की उम्मीद है।
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