हरिद्वार क्यों कहलाता है 'हर का द्वार'? भगवान शिव और पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा इसका अनोखा रहस्य धर्म 2 महीने पहले 81
उत्तराखंड की पावन नगरी हरिद्वार अपनी धार्मिक मान्यताओं और गंगा के किनारे बसे होने के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। क्या आप जानते हैं कि इसे 'हर का द्वार' क्यों कहा जाता है और इसका भगवान शिव के साथ क्या गहरा संबंध है?

हरिद्वार का धार्मिक और पौराणिक महत्व

देवभूमि उत्तराखंड में स्थित हरिद्वार न केवल एक पर्यटन स्थल है, बल्कि यह हिंदू धर्म की आस्था का एक प्रमुख केंद्र भी है। इस पवित्र नगरी का प्राचीन नाम मायापुरी है और इसे मोक्ष प्रदान करने वाली सात प्रमुख नगरियों में से एक माना जाता है। हरिद्वार की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ हर 12 साल के अंतराल पर कुंभ मेले का आयोजन होता है, जिसमें दुनिया भर के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु गंगा में आस्था की डुबकी लगाने आते हैं। स्कंद पुराण, शिव पुराण और पद्म पुराण जैसे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में इस नगरी के अद्भुत वैभव और इसके पौराणिक महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है।

हरिद्वार के नाम के पीछे की मान्यताएं

हरिद्वार का अर्थ 'हरि का द्वार' या भगवान विष्णु के धाम तक पहुँचने का रास्ता माना जाता है। पुराने समय में जब श्रद्धालु बद्रीनाथ की कठिन यात्रा पर निकलते थे, तो वे हरिद्वार पहुँचकर सबसे पहले गंगा में स्नान करते थे और यहीं से अपनी आगे की यात्रा का श्रीगणेश करते थे। इसी कारण इस धार्मिक नगरी को हरिद्वार नाम दिया गया। हालाँकि, इस नगरी का एक और बेहद महत्वपूर्ण नाम है जो सीधे तौर पर भगवान शिव से जुड़ा है। इसे 'हर का द्वार' यानी भोलेनाथ का द्वार भी कहा जाता है। जानकारों के अनुसार, जब भक्त केदारनाथ धाम की तीर्थयात्रा करते थे, तो वे हरिद्वार से ही गंगा स्नान कर नंगे पैर अपनी यात्रा पूरी करते थे। गंगा के किनारे भगवान शिव के कई सिद्ध पीठ स्थित हैं और केदारनाथ की ओर मार्ग होने के कारण इसे महादेव का द्वार माना गया है।

भगवान शिव की ससुराल और कनखल का महत्व

हरिद्वार का भगवान शिव से जुड़ाव केवल किंवदंतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रमाण स्वरूप यहाँ कई पौराणिक स्थल मौजूद हैं। पंडित श्रीधर शास्त्री के अनुसार, हरिद्वार के कनखल क्षेत्र में भगवान शिव की ससुराल स्थित है। यहाँ का विश्व प्रसिद्ध दक्षेश्वर महादेव मंदिर आस्था का बड़ा केंद्र है। हिंदू धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व है, जो आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर आश्विन मास तक चलता है। ये चार महीने विशेष रूप से भगवान शिव की भक्ति और आराधना के लिए समर्पित माने जाते हैं।

चातुर्मास में विशेष पूजा का फल

चातुर्मास के दौरान भगवान शिव की पूजा करने का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि यदि कोई भक्त इस काल में कनखल स्थित शिव की ससुराल में जाकर श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करता है, तो उसके सौभाग्य के द्वार खुल जाते हैं। पंडित श्रीधर शास्त्री का कहना है कि इन चार महीनों में भगवान शिव का गंगाजल और गाय के दूध से अभिषेक करना या रुद्राभिषेक करना अत्यंत फलदायी होता है। ऐसा करने से व्यक्ति को मनवांछित फल की प्राप्ति होती है और महादेव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। हरिद्वार की हर गलियों और मंदिरों में आज भी भगवान शिव और माता सती से जुड़ी पौराणिक कथाओं की गूंज सुनाई देती है, जो इस स्थान को आध्यात्मिक दृष्टि से और भी शक्तिशाली बनाती है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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