मनोरंजन
58 मिनट पहले
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विचारों
जब भी बॉलीवुड में कल्ट थ्रिलर और बेबाक कहानी कहने की बात होती है, तो दर्शक एक अरसे से ऐसी फिल्म की राह देखते रहे हैं जो किसी व्यावसायिक दबाव के बिना गढ़ी गई हो। बॉबी देओल, अनुराग कश्यप और निखिल द्विवेदी की तिकड़ी से सजी 'बंदर' इसी इंतजार पर खरी उतरती है। यह कोई आम या रटी-रटाई क्राइम थ्रिलर नहीं, बल्कि एक ऐसी कहानी है जो भीतर तक झकझोर देती है। 5 जून को परदे पर आने वाली इस फिल्म का पूरा लेखा-जोखा यहां पेश है।
एक नजर में फिल्म
'बंदर' को 5 में से 4 स्टार के साथ देखा जा सकता है। 5 जून 2026 को हिंदी भाषा में रिलीज होने वाली यह क्राइम थ्रिलर 130 मिनट लंबी है। इसमें बॉबी देओल, सान्या मल्होत्रा, सपना पब्बी, सबा आजाद समेत कई कलाकार हैं। निर्देशन अनुराग कश्यप का है और संगीत शिवहरि वर्मा ने दिया है।
आज के दौर में जहां ज्यादातर व्यावसायिक फिल्में थिएटर से बाहर निकलते ही दर्शकों के जेहन से उतर जाती हैं, वहीं 'बंदर' जैसी फिल्म यह साबित करती है कि सिनेमा की असली ताकत दर्शकों को चुनौती देने और गहराई तक प्रभावित करने में है। यह फिल्म मनोरंजन या हंसी के पारंपरिक फॉर्मूले पर नहीं टिकती। निर्माताओं ने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुख्यधारा के 'मसाला' ढर्रे को नकारते हुए एक स्याह और रहस्यमयी राह चुनी है। आइए, कहानी, अभिनय, निर्देशन और तकनीकी पहलुओं के आधार पर इसका विश्लेषण करते हैं।
कहानी
फिल्म का केंद्र 'समर' (बॉबी देओल) है, जो कभी टीवी का चमकता सितारा था लेकिन अब उसका ढलता करियर और खोया हुआ रुतबा उसकी सबसे बड़ी मानसिक और पेशेवर कमजोरी बन चुका है। समर अपनी जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की जद्दोजहद में है और अपनी साथी खुशी के साथ एक नया घर बसाने का सपना संजोए हुए है।
लेकिन कहानी तब एक कड़वा और भयावह मोड़ लेती है, जब एक पुराना रिश्ता—गायत्री (सपना पब्बी)—उसके लिए कांटा बन जाता है। गायत्री अचानक समर पर रेप का आरोप लगा देती है। यहीं से फिल्म महज बंद कमरे का अदालती ड्रामा नहीं रह जाती, बल्कि समाज के क्रूर चेहरे को उजागर करती है। यह साफ दिखाती है कि कैसे सोशल मीडिया और आम जनता किसी इंसान को अदालत के फैसले से पहले ही दोषी ठहराकर उसके पूरे वजूद को मिटा सकते हैं। एक टूटे हुए शख्स की समाज, मानसिक पीड़ा और अपने भीतर के शैतानों के खिलाफ बेगुनाही साबित करने की लड़ाई फिल्म का सबसे मजबूत भावनात्मक केंद्र बनती है। पटकथा आखिरी फ्रेम तक अप्रत्याशित बनी रहती है।
अभिनय
यह फिल्म पूरी तरह बॉबी देओल के कंधों पर खड़ी है और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 'आश्रम' और 'एनिमल' के बाद यह उनके करियर का सबसे तीव्र और प्रभावशाली अभिनय है। समर के किरदार में उनकी आंखों और बॉडी लैंग्वेज से झलकती बेबसी, गुस्सा, डर और स्टारडम का खालीपन कमाल का है। उनकी स्क्रीन उपस्थिति इतनी सशक्त है कि जब वे परदे पर बिखरते हैं, तो दर्शक उनकी बेचारगी से भावुक हो उठते हैं।
सहयोगी कलाकार भी कहीं कमजोर नहीं पड़ते। सपना पब्बी ने गायत्री के बहुपरतीय किरदार को बखूबी जिया है। उनके किरदार के धूसर रंग दर्शकों को अंत तक उलझाए रखते हैं कि उन पर भरोसा करें या नहीं। समर की साथी खुशी की भूमिका निभा रही अभिनेत्री भी टूटते रिश्ते के मानसिक तनाव और दर्द को बेहतरीन ढंग से उभारती हैं। फिल्म में हर किरदार की अपनी अहमियत है और कोई भी सिर्फ फ्रेम भरने भर के लिए नहीं रखा गया। सहायक कलाकारों को इतनी कुशलता से पिरोया गया है कि वे मुख्य नायक के रुतबे को कभी कम नहीं होने देते।
निर्देशन
'बंदर' के साथ निर्देशक अनुराग कश्यप अपने जाने-पहचाने अंदाज में लौटे हैं—बिना किसी लाग-लपेट के क्रूर सच को परदे पर उतारते हुए। उनका निर्देशन इतना बेलाग और कच्चा है कि कई दृश्य आपको बेहद विचलित कर देते हैं। निखिल द्विवेदी की दृष्टि के साथ मिलकर उन्होंने एक ऐसा सिनेमाई मिश्रण तैयार किया है जो हिंदी पट्टी की कड़वी हकीकत को बिना किसी व्यावसायिक तड़के के सामने रखता है।
फिल्म को सबसे ज्यादा विश्वसनीय बनाने वाली चीज है इसके खुरदुरे और पूरी तरह यथार्थवादी संवाद। इनमें कोई बनावट या भारी-भरकम फिल्मी कविता नहीं है। संवाद इतने असली और पैने हैं कि वे सीधे किरदारों की बेबसी और आक्रोश को सामने ला देते हैं और इस उम्दा क्राइम थ्रिलर के सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरते हैं।
सिनेमैटोग्राफी
तकनीकी लिहाज से 'बंदर' एक मास्टरक्लास है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसके डरावने माहौल को और गहरा कर देती है। कैमरे का इस्तेमाल इस तरह किया गया है कि समर के शानदार लेकिन बंद घर के भीतर भी एक अजीब, घुटन भरा एहसास तैरता रहता है। कम रोशनी वाले शॉट्स, गहरे रंग और चेहरों के क्लोज-अप किरदारों के मानसिक तनाव को सीधे दर्शकों तक पहुंचाते हैं। दृश्य लगातार तनाव बनाए रखते हैं, जिससे थिएटर के भीतर एक अलग ही दुनिया रच जाती है।
संगीत
संगीत के मामले में यह फिल्म मुख्यधारा के दर्शकों को थोड़ा चौंका सकती है। अगर आप किसी आम बॉलीवुड मसाला फिल्म की तरह रोमांटिक गाने या आइटम नंबर ढूंढ रहे हैं, तो ये गाने हिंदी पट्टी के दर्शकों को निराश कर सकते हैं। फिल्म में कोई ऐसा व्यावसायिक गीत नहीं है जो रील पर ट्रेंड करे, और सच कहें तो उसकी जरूरत भी नहीं थी। गानों की यह कमी फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर तुरंत भर देता है, जो बेहद दमदार है और यही इस फिल्म का असली दिल है। सस्पेंस और तनाव वाले दृश्यों में इस्तेमाल किया गया साउंड डिजाइन और खामोश कट दर्शकों की धड़कनें तेज कर देते हैं। यही बैकग्राउंड स्कोर है जो फिल्म के रहस्य को आखिरी सेकंड तक बिखरने से बचाए रखता है।
कमियां
एक कल्ट थ्रिलर होने के बावजूद 'बंदर' में कुछ खामियां हैं, जो शायद हर दर्शक को रास न आएं। फिल्म का पहला हिस्सा थोड़ा सुस्त है। अनुराग कश्यप समर की जिंदगी, उसके अतीत और मीडिया की उलझन को दिखाने में काफी वक्त लगाते हैं। कहानी बहुत धीमी रफ्तार से जोर पकड़ती है, जो सिर्फ तेज-तर्रार एक्शन या मर्डर मिस्ट्री पसंद करने वाले दर्शकों के सब्र का बांध तोड़ सकती है। फिल्म का स्वर शुरू से आखिर तक इतना भारी और तनावपूर्ण है कि यह एक पल के लिए भी सुस्ताने की मोहलत नहीं देता। हल्के-फुल्के मनोरंजन की चाह रखने वाले दर्शकों के लिए यह कुछ ज्यादा साबित हो सकता है।
अंतिम फैसला
इन कमियों के बावजूद फिल्म का क्लाइमैक्स पूरी तरह दिल को छू लेने वाला है। 'बंदर' सिनेमाई जोखिम उठाने का एक बेहतरीन उदाहरण है। अगर आपको ठोस, तीव्र और दिमाग घुमा देने वाली थ्रिलर पसंद है, तो यह इस साल की सबसे दिलचस्प फिल्मों में से एक है। इस फिल्म को मेरी ओर से 5 में से 3.5 स्टार।
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