नाग पंचमी का धार्मिक महत्व और पौराणिक कथा: जानिए क्यों सावन की इस तिथि पर होती है नाग देव की पूजा धर्म 8 घंटे पहले 2
सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी मनाई जाती है, जिसका शास्त्रों में विशेष महत्व है। इस दिन नाग देव की पूजा करने से कालसर्प दोष से मुक्ति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

नाग पंचमी का महत्व

हिंदू धर्म में नाग पंचमी का त्यौहार बहुत ही पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व हर साल सावन के महीने में शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। नाग पंचमी के दिन नाग देवता की विशेष पूजा की जाती है, जिसमें भक्त नाग देव को दूध, लावा और विभिन्न प्रकार के फल-फूल अर्पित करते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति नाग पंचमी के दिन सच्चे मन से पूजा-अर्चना करता है, उसे कालसर्प जैसे दोषों से बहुत जल्दी राहत मिल जाती है। इस बार नाग पंचमी पर सावन सोमवार का दुर्लभ संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के जानकारों के अनुसार, यह योग बहुत ही फलदायी है। इस दिन नाग देव के साथ-साथ महादेव की आराधना करने से घर में सुख, शांति और तरक्की का मार्ग प्रशस्त होता है।

नाग पंचमी से जुड़ी पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यताओं में नाग पंचमी के पीछे एक अत्यंत मार्मिक और महत्वपूर्ण कथा जुड़ी है। कथा के अनुसार, कुरुवंश के राजा परीक्षित, जो अभिमन्यु के पुत्र थे, को शमीक ऋषि के एक श्राप के कारण तक्षक नाग ने डस लिया था, जिसके चलते उनकी मृत्यु हो गई। जब उनके पुत्र राजा जनमेजय को पिता की मृत्यु का पता चला, तो वे अत्यधिक क्रोधित हुए। अपने पिता का बदला लेने और संसार के समस्त सर्पों का विनाश करने के लिए उन्होंने एक भव्य 'सर्प सत्र महायज्ञ' का आयोजन किया।

यज्ञ और आस्तीक मुनि का आगमन

राजा जनमेजय द्वारा आयोजित उस यज्ञ में ऋषियों ने अत्यंत शक्तिशाली मंत्रों का उच्चारण किया, जिनके प्रभाव से दुनिया भर के सर्प खिंचे चले आए और स्वयं यज्ञ कुंड की धधकती अग्नि में भस्म होने लगे। अपनी प्राण रक्षा के लिए तक्षक नाग ने देवराज इंद्र की शरण ली और उनके सिंहासन से जा लिपटे। जब ऋषियों ने मंत्रों के बल से इंद्र सहित तक्षक को यज्ञ कुंड में खींचने का प्रयास किया, तो देवलोक में हाहाकार की स्थिति उत्पन्न हो गई।

नाग वंश की रक्षा

ऐसी स्थिति में देवताओं ने माता मनसा देवी के पुत्र और युवा विद्वान आस्तीक मुनि से प्रार्थना की। आस्तीक मुनि यज्ञ स्थल पर पहुंचे और अपने तार्किक वचनों से राजा जनमेजय को अत्यंत प्रसन्न कर लिया। राजा ने मुनि को कोई भी मनचाहा वरदान मांगने को कहा। तब आस्तीक मुनि ने जनमेजय से सर्प सत्र यज्ञ को तुरंत बंद करने और शेष नागों को जीवनदान देने की मांग की। राजा जनमेजय ने मुनि का आग्रह स्वीकार करते हुए यज्ञ को रोक दिया, जिससे तक्षक नाग और बाकी सर्पों की जान बच गई। जिस दिन आस्तीक मुनि ने नागों की रक्षा की थी और उन पर दूध व जल छिड़क कर उनकी तपन को शांत किया था, वह सावन शुक्ल पंचमी का ही दिन था। उसी समय नागों ने वरदान दिया कि इस तिथि पर जो भी भक्त उनकी पूजा करेगा, उसे सर्प का भय कभी नहीं होगा। तभी से इस दिन को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।

प्रिया नायर पाबना की लाइफस्टाइल एवं फैशन एडिटर हैं, जो फैशन, ब्यूटी और लाइफस्टाइल ट्रेंड्स कवर करती हैं। रिश्तों, संस्कृति और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े विषयों पर भी वे लिखती हैं। उनका लेखन आधुनिक और भारतीय जीवनशैली का संतुलन पेश करता है।

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