धान की रोपाई में देरी से हैं परेशान, तो अपनाएं ये 5 खास किस्में, कम समय में बंपर पैदावार झारखंड एक घंटा पहले 4
झारखंड में मानसून की बेरुखी के कारण धान की रोपाई पिछड़ गई थी, लेकिन अगस्त में हुई अच्छी बारिश के बाद कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को कम अवधि वाली किस्मों के उपयोग की सलाह दी है।

खरीफ सीजन की चुनौतियों के बीच किसानों के लिए नया रास्ता

झारखंड में इस बार खरीफ के सीजन की शुरुआत किसानों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण रही है। जून और जुलाई के महीनों में उम्मीद से कम बारिश होने की वजह से जिले के कृषि क्षेत्र पर बुरा असर पड़ा और कई किसानों की रोपाई समय पर नहीं हो सकी। पानी की कमी के चलते एक बड़ा वर्ग अरहर जैसी वैकल्पिक फसलों की ओर मुड़ने को मजबूर हुआ। हालांकि अगस्त के महीने में मौसम ने अपना मिजाज बदला और करीब 575 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जिससे खेतों में नमी लौट आई है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगस्त की यह बारिश उन किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जिनके खेत अब भी खाली पड़े हैं।

कृषि वैज्ञानिकों की विशेष सलाह

पलामू के कृषि वैज्ञानिकों ने उन किसानों को राहत भरी खबर दी है जो देरी के कारण बुआई को लेकर चिंतित थे। कृषि वैज्ञानिक डॉ. विनोद पांडे ने बताया कि जिन खेतों में अभी तक धान नहीं लगाया गया है, वहां किसान घबराएं नहीं। वर्तमान में खेतों में मौजूद नमी का लाभ उठाते हुए वे कम अवधि वाली धान की किस्मों का चयन कर सकते हैं। वैज्ञानिक ने स्पष्ट किया कि 90 से 110 दिनों में पककर तैयार होने वाली किस्में इस समय सबसे उपयुक्त हैं।

ये 5 किस्में दिलाएंगी बेहतर परिणाम

कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों ने मुख्य रूप से उन किस्मों की सिफारिश की है जो पलामू की जलवायु और वर्तमान भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल हैं। किसान निम्नलिखित किस्मों का चयन कर सकते हैं:

  • स्वर्ण श्रेया: यह किस्म लगभग 110 दिनों में तैयार हो जाती है और कृषि विज्ञान केंद्र में आसानी से उपलब्ध है।
  • अभिषेक: कम समय में अच्छी पैदावार देने के लिए यह एक भरोसेमंद विकल्प है।
  • वंदना: यह किस्म उन इलाकों के लिए बहुत अच्छी है जहां पानी की उपलब्धता सीमित रहती है।
  • नवीन: मध्यम अवधि में तैयार होकर किसानों को राहत देती है।
  • अंजली: कम अवधि में बेहतर परिणाम देने वाली एक प्रमुख किस्म है।

इसके साथ ही वैज्ञानिक ने कृष्ण विकास धान-101 का भी जिक्र किया है, जो किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

मीडियम और अपलैंड जमीन के लिए उपयुक्त

इन किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें केवल निचले खेतों में ही नहीं, बल्कि मीडियम लैंड और अपलैंड जमीन पर भी आसानी से उगाया जा सकता है। कृषि वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए अधिक पानी सोखने वाली हाइब्रिड किस्मों के बजाय सामान्य और उपयुक्त किस्मों पर ध्यान देना आर्थिक रूप से ज्यादा फायदेमंद रहेगा। पलामू जैसे क्षेत्रों के लिए यह रणनीति किसानों के नुकसान की भरपाई करने में सक्षम है।

खरीफ सीजन का उठाएं पूरा लाभ

डॉ. विनोद पांडे के अनुसार, समय पर सही बीज का चुनाव करना ही सफल खेती की कुंजी है। अगस्त में हुई बारिश से खेतों में जो नमी बनी है, उसका सदुपयोग करना ही अब किसानों की प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि किसान अभी भी सही किस्म का चयन करते हैं, तो वे खरीफ सीजन में होने वाले अपने नुकसान को कम कर सकते हैं और अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। कृषि विभाग का जोर इस बात पर है कि खाली पड़े खेतों को बेकार न छोड़ें और वैज्ञानिक सलाह को मानते हुए इन उन्नत और कम अवधि वाली किस्मों के साथ खेती को आगे बढ़ाएं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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