बिहार
2 घंटे पहले
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मानसून की कमी का कृषि पर असर
खरीफ सीजन के दौरान आमतौर पर खेतों में धान की हरियाली दिखाई देती है, लेकिन इस बार हालात कुछ अलग हैं। बारिश की कमी के कारण धान की रोपाई में भारी गिरावट दर्ज की गई है। कई किसानों ने नुकसान से बचने के लिए परंपरागत खेती के बजाय वैकल्पिक फसलों का रास्ता अपनाया है। पटना जिले के मसौढ़ी प्रखंड स्थित तिनेरी पंचायत में ऐसा ही एक उदाहरण देखने को मिला है, जहाँ किसानों ने 6 बीघा जमीन पर बड़े स्तर पर बैंगन की फसल लगाई है।
बैंगन की खेती और वैज्ञानिक तकनीक
तिनेरी पंचायत के किसानों ने लगभग दो महीने पूर्व बैंगन के पौधों की रोपाई की थी। अब अगस्त महीने से इन पौधों में फल आने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। फसल को कीटों और बीमारियों से सुरक्षित रखने के लिए किसान नियमित रूप से दवाओं का छिड़काव कर रहे हैं। इस क्षेत्र में खेती आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से की जाती है। सिंचाई के प्रबंधन से लेकर कीटनाशकों के प्रयोग और फल की तुड़ाई तक हर चरण में आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है, यही कारण है कि यहाँ पैदा होने वाली सब्जियों की बाजार में भारी मांग रहती है।
मुनाफे का गणित और कम लागत
बैंगन की खेती किसानों के लिए एक फायदे का सौदा साबित हो रही है। इस किस्म की खासियत यह है कि इसमें बीज की खपत बहुत कम होती है। प्रति एकड़ खेत में केवल 60 से 80 ग्राम बीज ही पर्याप्त होता है। बाजार में बेहतर मांग होने के कारण किसानों को 30 से 35 रुपये प्रति किलो तक का भाव आसानी से मिल जाता है। यदि मौसम अनुकूल रहा और फसल की पैदावार अच्छी रही, तो इस पूरी प्रक्रिया से किसान 4 से 5 लाख रुपये तक की कमाई करने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।
परेशानी और वैकल्पिक रास्ता
स्थानीय किसान वासु पासवान का कहना है कि कम बारिश के कारण इस बार खेती करना एक बड़ी चुनौती साबित हुआ है। फूलगोभी की फसल में तो उन्हें काफी नुकसान भी झेलना पड़ा है। खराब मौसम और पानी की कमी को देखते हुए उन्होंने अपने खेत के बड़े हिस्से में धान की जगह सब्जियां लगाने का फैसला किया। इस बार उन्होंने धान की खेती को केवल 4 से 5 कट्ठा तक सीमित कर दिया है। वासु पासवान के अनुसार, विपरीत परिस्थितियों और फसल नुकसान के कारण उन्हें इस सीजन में करीब 2 लाख रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। अब सारा दारोमदार बैंगन की फसल पर है, जिससे उन्हें अपने नुकसान की भरपाई और अच्छी आय की उम्मीद है।
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