'बेटा.. मैं चाहती हूं तुम प्रोफेसर बनो', मां के सपने को बेटे ने दी उड़ान, संघर्ष और मेहनत से लिखी सफलता की अनूठी कहानी करियर एक दिन पहले 14
बलिया के प्रोफेसर दयालानंद राय के जीवन का सफर हर उस युवा के लिए एक बड़ी सीख है जो संघर्षों से घबराकर पीछे हट जाते हैं। मां की एक बात को लक्ष्य मानकर उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी।

संघर्ष और सफलता की जीवंत मिसाल

जीवन में जब परिस्थितियां प्रतिकूल होती हैं, तब अधिकतर लोग अपने घुटने टेक देते हैं। लेकिन कुछ ऐसे विरले भी होते हैं जो मुश्किलों को ही अपनी ताकत बना लेते हैं। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में कार्यरत प्रोफेसर दयालानंद राय की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उन्होंने साबित कर दिया है कि यदि मन में दृढ़ संकल्प हो और हौसला बुलंद हो, तो हर राह आसान हो जाती है। बलिया के इस प्रोफेसर के जीवन का सफर तमाम संघर्षों से भरा रहा है। उनके जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब लगभग डेढ़-दो साल तक आर्थिक तंगी, मानसिक तनाव और अनिश्चितता का माहौल रहा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। आज उनकी यह कहानी उन युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो सफलता के मार्ग पर संघर्ष कर रहे हैं।

गाजीपुर से बलिया का सफर और प्रारंभिक शिक्षा

प्रोफेसर दयालानंद राय मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के ढोडाडीह गांव के रहने वाले हैं। हालांकि, उनका बचपन और उनका पूरा जीवन मुख्य रूप से बलिया में ही बीता। वर्तमान समय में वे बलिया के श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग में प्रोफेसर के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं, और इसके साथ ही वे वहां के कार्यवाहक प्राचार्य की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं।

उनके पिता बलिया के ही टाउन इंटरमीडिएट कॉलेज में एक शिक्षक के रूप में कार्यरत थे, जिसके कारण दयालानंद राय की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा भी इसी ऐतिहासिक धरती पर हुई। उनके शैक्षणिक सफर की शुरुआत बलिया की स्थानीय पाठशालाओं से हुई। उन्होंने अपनी कक्षा दो और तीन की पढ़ाई जिला जेल के ठीक सामने स्थित मोंटेसरी स्कूल से पूरी की। इसके बाद उन्होंने आगे बढ़ते हुए अपनी चौथी और पांचवीं की पढ़ाई एनसीसी तिराहे के पास स्थित हरपुर प्राइमरी स्कूल से उत्तीर्ण की। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने कक्षा छह से लेकर इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई उसी टाउन इंटर कॉलेज से पूरी की, जहां उनके पिता शिक्षक थे।

उच्च शिक्षा और शिक्षक बनने की दृढ़ इच्छाशक्ति

माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद दयालानंद राय ने उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने सतीशचंद्र कॉलेज से अपनी बीएससी की डिग्री हासिल की। इसके बाद वे अपनी आगे की पढ़ाई के लिए जौनपुर चले गए, जहां उन्होंने टीडी कॉलेज जौनपुर से एमएससी की डिग्री पूरी की। पढ़ाई के प्रति उनके लगाव ने उन्हें रुकने नहीं दिया और उन्होंने इसके बाद टीडी कॉलेज बलिया से अपनी पीएचडी की उपाधि भी प्राप्त की।

can_use_html_only शिक्षा का यह लंबा सफर केवल खुद को शिक्षित करने तक सीमित नहीं था, बल्कि यहीं से उनके एक महान शिक्षक बनने की कहानी की नींव भी रखी जा रही थी। पीएचडी पूरी करने के बाद उन्होंने लगभग दो साल तक एडहॉक प्रवक्ता के रूप में अपनी सेवाएं दीं। इसके बाद उनका चयन उच्च शिक्षा आयोग के माध्यम से नियमित प्रवक्ता के रूप में प्राणि विज्ञान विभाग में हो गया।

चयन के बाद का कड़ा संघर्ष: जब थम गया था वेतन

कहते हैं कि सफलता का मार्ग कभी भी सीधा और आसान नहीं होता। जब दयालानंद राय का चयन नियमित शिक्षक के रूप में हुआ, तो उन्हें लगा कि अब संघर्षों का अंत हो गया है, लेकिन ऐसा नहीं था। उनकी एडहॉक नियुक्ति एक कानूनी मुकदमे में फंस गई, जिसके कारण उनका वेतन पूरी तरह से रुक गया। इसके बाद जब आयोग से उनका नियमित चयन हुआ, तो उस चयन प्रक्रिया पर भी अदालती मामला दर्ज हो गया।

इस अदालती कार्यवाही के कारण चयन होने के बावजूद उन्हें अपनी नियुक्ति के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। वह दौर उनके जीवन का सबसे कठिन दौर था। लगभग डेढ़ से दो साल का समय ऐसा गुजरा, जब उनके सामने भारी आर्थिक संकट था, भविष्य को लेकर गहरी चिंताएं थीं और हर तरफ केवल इंतजार ही था। इस कठिन समय में भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया। उनके पास हार मानने का कोई विकल्प नहीं था, और इसी जुझारू प्रवृत्ति के कारण अंततः उनके सब्र का फल उन्हें सफलता के रूप में मिला।

मां का अद्वितीय संघर्ष और वो एक जादुई वाक्य

प्रोफेसर दयालानंद राय अपने इस पूरे संघर्ष और सफलता का श्रेय अपनी स्वर्गीय मां को देते हैं, जो वर्ष 2018 तक उनके साथ रहीं। उनकी मां एक अत्यंत सात्विक, सरल और घरेलू महिला थीं, लेकिन उनका व्यक्तित्व बेहद मजबूत था। उनके पिता वर्ष 1984 में अपनी सेवा से सेवानिवृत्त हो गए थे, जिसके बाद उन्होंने अपना अधिकांश समय पंजाब में अपने गुरु की सेवा में व्यतीत किया। ऐसे समय में जब घर के बच्चे अभी पढ़ाई कर रहे थे और नौकरी की तलाश में थे, परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनकी मां के कंधों पर आ गई थी।

उनकी मां ने अकेले ही तमाम विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए सभी बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, उन्हें योग्य बनाया और उनकी शादियां भी संपन्न कराईं। प्रोफेसर राय बताते हैं कि जब वे इंटरमीडिएट में थे, तो उनके मन में एक डॉक्टर बनने का सपना था। जब उन्होंने अपनी मां से अपनी इस इच्छा को साझा किया, तो उनकी मां ने बेहद सहजता से कहा था, "बेटा, मैं चाहती हूं कि तुम प्रोफेसर बनो।" मां के मुंह से निकले इस एक वाक्य ने दयालानंद राय के जीवन का लक्ष्य ही बदल दिया। उन्होंने डॉक्टर बनने का विचार छोड़ दिया और अपनी मां के सपने को साकार करने में जुट गए।

युवाओं के लिए सफलता के अनमोल गुरुमंत्र

आज के समय में जब युवा बहुत जल्दी निराश हो जाते हैं और अपनी राह बदल लेते हैं, तब प्रोफेसर दयालानंद राय का जीवन और उनके विचार उनके लिए एक नई ऊर्जा का काम कर सकते हैं। युवाओं को प्रेरित करते हुए प्रोफेसर राय कुछ महत्वपूर्ण बातें साझा करते हैं:

  • लक्ष्य का निर्धारण: जीवन में सबसे पहले अपना एक स्पष्ट लक्ष्य तय करना बेहद जरूरी है। यही सफलता की पहली सीढ़ी होती है।
  • रुचि को पहचानें: हमेशा अपनी रुचि के क्षेत्र को पहचानें और फिर पूरी लगन व समर्पण के साथ उस दिशा में आगे बढ़ें।
  • समझौता न करें: परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अपने मूल लक्ष्य से कभी भी समझौता न करें।
  • सौ प्रतिशत प्रयास: जीवन में 99.9% प्रयास से काम नहीं चलता। अगर सफलता पानी है, तो अपने लक्ष्य के लिए 100% समर्पण और प्रयास करना ही होगा।
  • हौसला रखें: यदि मार्ग में कोई परेशानी या अड़चन आती है, तो रास्ता बदलने के बजाय अपने हौसले को और अधिक मजबूत करना ही सच्ची बुद्धिमानी है।

अंत में उनका यही संदेश है कि यदि आपकी मेहनत सच्ची है, इरादे नेक हैं और प्रयास में ईमानदारी है, तो मंजिल कितनी भी दूर हो, एक न एक दिन वह आपको अवश्य मिलेगी। उनकी यह जीवन यात्रा आज के दौर के युवाओं के लिए एक मार्गदर्शक की तरह है जो यह सिखाती है कि मन के हारे हार है और मन के जीते जीत।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

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