हरियाणा
2 घंटे पहले
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फरीदाबाद के सेक्टर-8 स्थित मिथिलांचल काली मंदिर परिसर में इन दिनों एक अनूठा दृश्य देखने को मिल रहा है। मंदिर के एक कोने में हरी घास, बांस और मूंज की रस्सियों से एक झोपड़ी तैयार की जा रही है। पहली नजर में यह किसी साधारण घास-फूस की कुटिया जैसी लगती है, लेकिन इसके पीछे मिथिला की सदियों पुरानी परंपरा और गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। यह झोपड़ी किसी के रहने के लिए नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद होने वाले विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के लिए बनाई जाती है। आज भी फरीदाबाद में रहने वाला मिथिला समाज इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहा है।
मृत्यु के बाद के संस्कार का केंद्र
इस झोपड़ी को तैयार करने वाले कारीगर पूरण मंडल बताते हैं कि वे फरीदाबाद के सेक्टर-8 स्थित काली मंदिर पर ही रहते हैं और घास की यह झोपड़ी बनाते हैं। उनके अनुसार, जब किसी की मृत्यु होती है तो उसकी क्रिया 13 दिन की होती है और मिथिला में रिवाज है कि इसी के लिए घास की झोपड़ी बनाई जाती है। जिस व्यक्ति का निधन हुआ है, उसकी क्रिया के सारे रीति-रिवाज इसी झोपड़ी के भीतर संपन्न किए जाते हैं।
पूरण मंडल बताते हैं कि शोक 13 दिन का होता है, जबकि क्रिया 3 दिन की होती है और इन तीन दिनों तक झोपड़ी के अंदर ही रीति-रिवाज निभाए जाते हैं। मृतक के लिए भोजन भी इसी झोपड़ी के भीतर तैयार किया जाता है। जो लोग घाट पर जाकर अंतिम संस्कार और पूरा पूजा-पाठ करते हैं, उन सभी का खाना भी यहीं बनता है। भोजन में चावल, दाल और सब्जी बनाई जाती है।
दान और पंडित की भूमिका
पूरण मंडल के अनुसार, रस्म के दौरान थाली, प्लेट, लोटा, अन्न, चावल, दाल, बर्तन और अन्य सामग्री इसी घास की झोपड़ी के भीतर दान की जाती है। पंडित भी इसी के अंदर बैठते हैं और बैठकर ही पूरी रस्म करवाते हैं। खाट से लेकर गाय-भैंस तक का दान इसी जगह होता है। मृतक की रस्में दसवीं, एकादशी और द्वादशी को इसी झोपड़ी के भीतर संपन्न की जाती हैं।
कैसे बनती है यह झोपड़ी
पूरण मंडल बताते हैं कि सबसे पहले 9 हाथ का बांस फाड़ा जाता है, फिर बत्ती बनाई जाती है। इसके बाद घास लगाकर उसे गोल आकार दिया जाता है और बिल्कुल घर की तरह तैयार कर दिया जाता है। घास को बांधने के लिए मूंज की रस्सी का इस्तेमाल किया जाता है। एक झोपड़ी बनाने में करीब 2 घंटे लगते हैं और इसके लिए सारा सामान पहले से ही जुटाकर रखा जाता है। यह पूरी तरह हरी घास से बनाई जाती है।
झोपड़ी की कीमत
70 वर्षीय पूरण मंडल कहते हैं कि वे लंबे समय से यह काम कर रहे हैं। ऑर्डर मिलने पर ही झोपड़ी तैयार की जाती है और इसकी कीमत आकार के हिसाब से तय होती है। इसकी शुरुआत 2000 रुपये से होती है। उन्होंने बताया कि मौजूदा झोपड़ी के उन्होंने 2500 रुपये लिए हैं और इसका आकार 9 हाथ का है। यह काम वे फरीदाबाद में करीब 20 साल से कर रहे हैं।
परिवार की आजीविका और विरासत
पूरण मंडल बताते हैं कि फरीदाबाद में रहते हुए उन्हें 40 साल हो चुके हैं और उनका पूरा परिवार इसी काम से चलता है। उनके तीन बच्चे हैं, जो यही काम करते हैं और सभी की शादी हो चुकी है। उन्होंने इसी झोपड़ी बनाने के काम से सबकी शादियां कीं। इस काम में उनकी पत्नी भी उनका सहयोग करती हैं।
आधुनिकता के इस दौर में जहां कई परंपराएं धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं, वहीं पूरण मंडल और उनका परिवार आज भी मिथिला की इस अनूठी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए हैं। घास और बांस से बनी यह साधारण-सी दिखने वाली झोपड़ी दरअसल एक ऐसी परंपरा का प्रतीक है, जो जीवन और मृत्यु के बीच जुड़े धार्मिक संस्कारों को पीढ़ियों से संजोए हुए है।
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