हरियाणा
एक घंटा पहले
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विचारों
यह कहानी एक ऐसे किसान की है, जिसने लीक से हटकर ऐसा रास्ता चुना कि उसकी आमदनी की पूरी तस्वीर ही बदल गई। फरीदाबाद के फतेहपुर बिल्लौच गांव में रहने वाले मुकेश कुमार के खेतों में पहले गेहूं, धान और दूसरी फसलें उगाई जाती थीं, मगर मेहनत के अनुपात में मुनाफा कम ही हाथ लगता था। ऐसे में उन्होंने कटहल की बागवानी शुरू करने का फैसला किया। शुरुआत में यह एक नया प्रयोग भर था, लेकिन आज यही बागवानी हर महीने लाखों रुपये की कमाई का जरिया बन चुकी है।
मंडी में कटहल की मांग लगातार बनी रहती है और अच्छे दाम मिलने की वजह से यह खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है।
गेहूं-धान के मुकाबले कटहल में ज्यादा मुनाफा
मुकेश कुमार बताते हैं कि उनके पास करीब 25 से 30 कटहल के पेड़ हैं और यह बेहद अच्छी वैरायटी का कटहल है। पेड़ लगाए हुए उन्हें चार साल से ज्यादा का समय हो चुका है। उनके मुताबिक गेहूं, धान या दूसरी फसलों की तुलना में कटहल में कहीं ज्यादा फायदा है। उन्होंने करीब एक एकड़ जमीन में यह बागवानी कर रखी है।
वे पूरी तरह ऑर्गेनिक तरीके से खेती करते हैं और किसी तरह की खाद नहीं डालते। सिंचाई के लिए उन्होंने मेड़ बना रखी है और उसी के जरिए पानी पहुंचाते हैं। गर्मियों में बीच-बीच में पानी देना पड़ता है, जबकि सर्दियों में पानी की जरूरत कम रहती है।
कटहल की खेती की खासियत
मुकेश कुमार के अनुसार कटहल की खेती की सबसे बड़ी खूबी इसकी कम लागत और लंबे समय तक मिलने वाला उत्पादन है। एक बार पौधे लगा देने के बाद कई साल तक पेड़ फल देते रहते हैं। इस इलाके में वे पहले ऐसे किसान हैं, जो कटहल की बागवानी कर रहे हैं। कटहल की मांग सब्जी के रूप में भी बनी रहती है और इसके पके फलों की भी अच्छी बिक्री होती है।
कितनी लागत, कितनी कमाई
मुकेश कुमार बताते हैं कि जब उन्होंने इसकी शुरुआत की थी, तब ज्यादा लागत नहीं आई थी। एक पेड़ पर मुश्किल से 400 से 500 रुपये का खर्च आया था। आज मंडी में कटहल 30 रुपये किलो तक बिक जाता है और इससे महीने में करीब एक लाख रुपये तक की आमदनी हो जाती है। दूसरी सब्जियां उगाने वाले किसानों के मुकाबले इसमें कहीं बेहतर फायदा है।
वे कहते हैं कि वे पूरी तरह ऑर्गेनिक खेती करते हैं और यूरिया, डीएपी या किसी भी दूसरी रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते। साथ ही किसी तरह की दवा का स्प्रे भी नहीं करते। कटहल बेचने के लिए वे पलवल मंडी जाते हैं। खेती में परिवार का पूरा सहयोग मिलता है, लेकिन खेत की जिम्मेदारी वे खुद ही संभालते हैं।
कम लागत, कम देखभाल और बाजार में मांग
मुकेश कुमार बताते हैं कि उनके बेटे प्राइवेट नौकरी करते हैं, इसलिए खेती का पूरा काम वे खुद देखते हैं। वे करीब 2002 से खेती कर रहे हैं और इतने वर्षों में उन्होंने कई तरह की फसलें उगाईं, लेकिन कटहल की बागवानी ने उन्हें सबसे ज्यादा फायदा दिया है।
फतेहपुर बिल्लौच गांव में हो रही यह कटहल की बागवानी आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है। कम लागत, कम देखभाल और बाजार में बनी रहने वाली अच्छी मांग के कारण यह खेती किसानों की आमदनी बढ़ाने का मजबूत जरिया साबित हो रही है।
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