उंगली थामकर चलना सिखाने वाली मां को बेटे ने घर से बाहर कर दिया, बेबस वृद्धा की यह दास्तां झकझोर देगी हरियाणा 2 घंटे पहले 2
फरीदाबाद की 56 वर्षीय आशारानी को बीमारी के बाद बेटे और बहू ने अपने साथ रखने से इनकार कर दिया। डेढ़ महीने से वृद्धाश्रम में रह रहीं आशारानी को यहां किसी चीज़ की कमी नहीं, पर अपनों से दूरी का दर्द रोज़ उनकी आंखें भिगो देता है।

जिस मां ने अपने बच्चे को उंगली थामकर चलना सिखाया, रात-रात भर जागकर उसकी देखभाल की और अपनी खुशियों से पहले हमेशा उसकी जरूरतों को रखा, आज उसी मां को जीवन के इस पड़ाव पर एक सहारे की तलाश है। उम्र के साथ शरीर ने जवाब देना शुरू किया, बीमारी ने घेर लिया और जिस बेटे को उन्होंने अपना संबल माना था, उसी ने उनके लिए घर के दरवाज़े बंद कर दिए। फरीदाबाद के एक वृद्धाश्रम में रह रहीं 56 वर्षीय आशारानी की कहानी भी ठीक ऐसी ही है। आंखों में आंसू और सीने में अपनों से बिछड़ने की पीड़ा लिए वह आज वृद्धाश्रम में रहने को विवश हैं।

आशारानी की ज़ुबानी उनका दर्द

बातचीत में आशारानी ने बताया कि वह फरीदाबाद की ही रहने वाली हैं। उनके परिवार में एक बेटा, बहू और एक बेटी है। बेटी की शादी हो चुकी है और वह अपने ससुराल में रहती है। बेटे का एक दो साल का बेटा भी है।

आशारानी कहती हैं कि पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ने लगी थी और उन्हें दौरे पड़ने लगे थे। कई बार वह गिर भी चुकी थीं। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ी, वैसे-वैसे घर का माहौल भी बदलता चला गया।

बीमारी बढ़ी तो घर में बढ़ने लगे झगड़े

आशारानी बताती हैं कि तबीयत ज़्यादा खराब रहने लगी तो इसी बात को लेकर घर में कलह होने लगी। धीरे-धीरे विवाद इतना बढ़ गया कि बेटे और बहू ने उन्हें अपने साथ रखने से साफ मना कर दिया। उनके मुताबिक बहू उन्हें ज़्यादा परेशान करती थी और बेटा भी उसी की बात मानता था। आखिरकार उन्हें घर छोड़ना पड़ा।

वह कहती हैं कि जिंदगी का बड़ा हिस्सा तो गुज़र गया, अब जो थोड़ा-बहुत समय बचा है, उसे किसी तरह काट रही हैं।

हर दिन भीग जाती हैं आंखें

आशारानी बताती हैं कि फरीदाबाद के वृद्धाश्रम में रहते हुए उन्हें करीब डेढ़ महीना हो चुका है। यहां उन्हें किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं है और सभी लोग उनका पूरा ध्यान रखते हैं। लेकिन परिवार से दूर रहने की टीस उन्हें हर रोज़ महसूस होती है। अपनों की याद में अक्सर उनकी आंखें नम हो जाती हैं।

बोझ समझ लिए जाते हैं बुज़ुर्ग

वृद्धाश्रम की सेवादार किरण बजाज बताती हैं कि इस तरह के मामले अक्सर उनके सामने आते रहते हैं। कई बार माता-पिता के बीमार पड़ने या बढ़ती उम्र के बाद बच्चे उन्हें बोझ मानने लगते हैं। छोटी-छोटी बातों पर विवाद होते हैं और बुज़ुर्गों को घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

वह कहती हैं कि जब बच्चे छोटे थे, तब इन्हीं मां-बाप ने उन्हें संभाला और बड़ा किया, लेकिन बुढ़ापे में वही मां-बाप कई बार बिल्कुल अकेले पड़ जाते हैं।

किरण बजाज के अनुसार आशारानी दिनभर अपने परिवार को याद कर रोती रहती हैं। उनका बेटा कपड़ों की दुकान पर काम करता है और परिवार किराए के मकान में रहता है। वृद्धाश्रम में उन्हें रहने और खाने की सुविधा तो मिल रही है, मगर अपने घर और परिवार की कमी आज भी उन्हें हर पल खलती है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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