तृणमूल कांग्रेस पर वर्चस्व की जंग पहुंची चुनाव आयोग, ममता बनर्जी और ऋतब्रत गुट को मिला जवाब देने का मौका पश्चिम बंगाल 2 महीने पहले 68
तृणमूल कांग्रेस की आंतरिक कलह अब चुनाव आयोग के दरवाजे तक पहुंच गई है, जहां पार्टी पर कब्जे को लेकर ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के गुट आमने-सामने हैं। आयोग ने दोनों पक्षों को 6 जुलाई तक अपने दावों के समर्थन में जवाब देने का निर्देश दिया है।

चुनाव आयोग के पाले में तृणमूल की सत्ता का फैसला

तृणमूल कांग्रेस में चल रहा अंदरूनी घमासान अब एक नए मुकाम पर आ गया है। पार्टी के स्वामित्व और संगठनात्मक अधिकारों को लेकर छिड़ी खींचतान का मामला अब चुनाव आयोग तक पहुंच गया है। चुनाव आयोग ने पार्टी के आधिकारिक दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने और संगठनात्मक चुनाव के दावों को लेकर ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी, दोनों को अलग-अलग पत्र जारी किए हैं। आयोग ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि दोनों गुटों को 6 जुलाई 2026 को शाम साढ़े पांच बजे तक अपना विस्तृत पक्ष और जरूरी साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।

ऋतब्रत बनर्जी का दावा और पार्टी पर नियंत्रण की मांग

बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने चुनाव आयोग की फुल बेंच से औपचारिक मुलाकात की और अपने दावों को मजबूती से रखा। ऋतब्रत का तर्क है कि पार्टी का एक बड़ा हिस्सा, जिसमें विधायक, पार्षद और जमीनी कार्यकर्ता शामिल हैं, उनके साथ खड़ा है। उन्होंने आयोग को जानकारी दी कि 22 जून को कोलकाता में आयोजित प्रतिनिधि सत्र के दौरान पार्टी में संगठनात्मक फेरबदल किए गए थे, जिसमें नए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव हुआ और एक नई नेशनल वर्किंग कमेटी का गठन भी किया गया।

ऋतब्रत बनर्जी के अनुसार, पार्टी के महासचिव और कोषाध्यक्ष सहित प्रमुख पदों पर नए लोगों की नियुक्ति की जा चुकी है। उन्होंने आयोग को बताया कि कुल 80 में से 65 विधायक उनके गुट का समर्थन कर रहे हैं। यदि जिला स्तर के संगठन और पार्षदों की संख्या को भी इसमें जोड़ा जाए, तो पार्टी का दो-तिहाई से अधिक जनाधार उनके पक्ष में है। इसी आधार पर उन्होंने चुनाव आयोग से आग्रह किया है कि उनके खेमे को ही असली तृणमूल कांग्रेस के रूप में मान्यता प्रदान की जाए और पार्टी का नाम व चुनाव चिन्ह उन्हें सौंपा जाए।

वंशवाद के खिलाफ ऋतब्रत का रुख

ऋतब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी से अपने अलग होने के कारणों को भी सार्वजनिक किया है। उनका कहना है कि तृणमूल का वास्तविक अर्थ जमीनी स्तर से जुड़ा है, लेकिन वर्तमान में यह पार्टी अपनी जड़ों से कटकर वंशवाद की भेंट चढ़ चुकी है। ऋतब्रत ने दावा किया कि बंगाल की जनता और पार्टी के कार्यकर्ता इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि अब वे पार्टी को व्यक्ति पूजा के बजाय सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांत पर चलाना चाहते हैं।

ममता खेमे का पलटवार और कांग्रेस का साथ

दूसरी तरफ, ममता बनर्जी के खेमे ने ऋतब्रत गुट के सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने विरोधी गुट के नेताओं पर तीखा हमला बोला और उन्हें 'टुटपुंजिया' करार दिया। सागरिका ने चुनाव आयोग की फुल बेंच द्वारा इन नेताओं को मुलाकात की अनुमति दिए जाने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग केवल अधिकृत प्रतिनिधियों से बात करने के लिए बाध्य है, लेकिन जिस तरह से आयोग ने विरोधी गुट को सुना, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि आयोग केंद्र सरकार या बीजेपी के दबाव में काम कर रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि इस संकट की घड़ी में ममता बनर्जी को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी का भी समर्थन मिला है। अधीर रंजन चौधरी ने ऋतब्रत गुट की आलोचना करते हुए कहा कि ये लोग जिस थाली में खाया उसी में छेद कर रहे हैं। उन्होंने तंज कसा कि ये नेता ममता बनर्जी की मेहनत और संघर्ष की बदौलत ही आज विधायक बने हैं, लेकिन अब वे उन्हीं के खिलाफ गद्दारी कर रहे हैं। अब देखना होगा कि 6 जुलाई की समय सीमा खत्म होने के बाद चुनाव आयोग इस सियासी घमासान पर क्या फैसला सुनाता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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