राष्ट्रीय राजनीति
2 घंटे पहले
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प्रशांत महासागर से उठ रहा मौसम का नया संकट
प्रशांत महासागर की गहराइयों में एक ऐसा मौसमी बदलाव आकार ले रहा है जो आने वाले महीनों में पूरी दुनिया के मौसम का मिजाज बिगाड़ने की क्षमता रखता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी WMO ने दुनिया को सचेत करते हुए कहा है कि प्रशांत महासागर में सक्रिय एल नीनो की स्थिति और अधिक मजबूत होकर बेहद विकराल रूप धारण कर सकती है। इस चेतावनी का दायरा बहुत व्यापक है, क्योंकि इसके असर से दुनिया भर का मौसम प्रभावित होगा। चिंताजनक बात यह है कि विशेषज्ञों का मानना है कि एल नीनो का यह प्रभाव फरवरी 2027 तक बना रह सकता है। यह महज कुछ हफ्तों का संकट नहीं है, बल्कि आने वाले लंबे समय तक मौसम का चक्र अस्थिर रहने की आशंका है, जिससे तापमान, बारिश के पैटर्न और चरम मौसमी घटनाओं में अप्रत्याशित बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और मौसम पर गंभीर प्रभाव
WMO की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने इसे लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका मानना है कि एल नीनो का प्रभाव केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। मौजूदा स्थितियों में दुनिया के कई देश पहले ही सूखे और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहे हैं, और एल नीनो का और अधिक मजबूत होना इन संकटों को और गहरा कर सकता है। कहीं भीषण गर्मी के चलते तापमान पुराने रिकॉर्ड को तोड़ सकता है, तो कहीं अचानक आने वाली भारी बारिश और बाढ़ का खतरा जन-जीवन और बुनियादी ढांचे के लिए बड़ी चुनौती पेश करेगा।
भारत के लिए क्यों बढ़ गई है चिंता?
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए एल नीनो का सीधा संबंध मानसून की सेहत और तापमान से होता है। एल नीनो की सक्रियता का अक्सर भारत में कमजोर मानसून और औसत से कम बारिश के साथ गहरा संबंध देखा गया है। मौजूदा आंकड़े भी इसी दिशा में इशारा कर रहे हैं। भारतीय मौसम विभाग IMD की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त का महीना देश के लिए काफी कठिन रहा है। अगस्त में देशभर में सामान्य से 16 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। इतना ही नहीं, यह वर्ष 1901 के बाद से भारत का सबसे गर्म अगस्त रहा है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे कई कारकों के साथ-साथ एल नीनो की स्थिति एक बड़ी वजह है।
सितंबर और भविष्य की चुनौतियां
अब सबकी निगाहें सितंबर के महीने पर टिकी हैं। मौसम विभाग IMD ने पूर्वानुमान जताया है कि सितंबर में भी देशभर में बारिश सामान्य से कम रह सकती है। विभाग के अनुसार, सितंबर में बारिश लंबी अवधि के औसत यानी LPA के 91 प्रतिशत से भी कम रहने की संभावना जताई गई है। आंकड़ों के नजरिए से समझें तो सितंबर की सामान्य बारिश का LPA करीब 167.9 मिलीमीटर होता है, और इस बार इसके स्तर में गिरावट चिंता का विषय है। मानसून की विदाई के बाद भी एल नीनो का असर खत्म नहीं होगा, क्योंकि यह सर्दियों के तापमान को भी प्रभावित करने वाला है।
बदलती सर्दियां और खेती पर असर
भारत में सर्दियों के मौसम का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। दिल्ली स्थित क्लाइमेट थिंक टैंक क्लाइमेट ट्रेंड्स के एक विस्तृत अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि उत्तर भारत की सर्दियां अब छोटी हो रही हैं और उनमें गर्मी का अहसास जल्दी होने लगा है। आंकड़ों के मुताबिक, फरवरी का महीना सबसे तेजी से गर्म हो रहा है। फरवरी में तापमान 0.69 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की रफ्तार से बढ़ रहा है। इसी प्रकार, मार्च में तापमान वृद्धि की दर 0.58 डिग्री और अप्रैल में 0.66 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक दर्ज की गई है। सर्दियों का समय कम होना और गर्मी का जल्दी आना खेती के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील है।
गेहूं की फसल पर सबसे बड़ा खतरा
रबी के सीजन में किसानों की सबसे बड़ी चिंता गेहूं की फसल को लेकर होती है। गेहूं के लिए फरवरी और मार्च के महीने सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इसी समय दाना बनने और विकसित होने की प्रक्रिया चलती है। यदि इस अवधि में तापमान सामान्य से काफी ज्यादा बढ़ जाता है, तो फसल को ‘टर्मिनल हीट स्ट्रेस’ का सामना करना पड़ता है। इससे पैदावार पर सीधा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। क्लाइमेट ट्रेंड्स के अध्ययन के अनुसार, तापमान में हो रहा यह बदलाव देश के मुख्य गेहूं उत्पादक राज्यों में उत्पादन को पहले ही प्रभावित करने लगा है।
आखिर क्या है एल नीनो?
आम धारणा के विपरीत, एल नीनो कोई तूफान या चक्रवात नहीं है, बल्कि यह प्रशांत महासागर और वायुमंडल के बीच होने वाला एक व्यापक जलवायु परिवर्तन है। इसे ENSO यानी एल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन की तीन अवस्थाओं में से एक माना जाता है। जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, तो एल नीनो की स्थिति बनती है। इसका असर केवल समुद्र के तापमान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर बारिश और हवाओं के रुख को बदल देता है। इसके विपरीत, ला नीना की स्थिति वैश्विक तापमान में ठंडक लाने वाली मानी जाती है, जबकि दोनों के बीच की अवस्था को न्यूट्रल फेज कहा जाता है।
आम आदमी की जेब पर असर
WMO की यह चेतावनी केवल मौसम की विसंगतियों के बारे में नहीं है, बल्कि यह आने वाले दिनों के खाद्य संकट की ओर भी इशारा है। भारत के संदर्भ में मानसून, सर्दी और कृषि का चक्र आपस में गहराई से जुड़े हैं। यदि एल नीनो का प्रभाव ‘अत्यधिक मजबूत’ स्थिति तक पहुंचता है, तो इसके नतीजे खेतों से लेकर पानी की उपलब्धता और अंततः आम आदमी की रसोई के बजट तक महसूस किए जा सकते हैं। बढ़ती महंगाई और खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से आने वाले महीने बेहद महत्वपूर्ण हैं। प्रशासन और किसानों दोनों को अब इन बदलती मौसमी स्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपनी तैयारियों को पुख्ता करना होगा, क्योंकि प्रशांत महासागर की हलचल का असर हमारे देश की धरती पर स्पष्ट दिखाई देने वाला है।
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