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एक घंटा पहले
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प्रशांत महासागर में इस महीने की शुरुआत में सक्रिय हुआ अल नीनो आने वाले हफ्तों में और प्रबल रूप ले सकता है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार सितंबर के अंत तक यह काफी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है और मानसून की विदाई के बाद भी इसका असर बना रह सकता है। चूंकि इस परिघटना का सीधा संबंध भारतीय मानसून से है, इसलिए इसे लेकर कृषि क्षेत्र में चिंता बढ़ गई है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्र ने हालांकि स्पष्ट किया है कि फिलहाल अधिक चिंतित होने की जरूरत नहीं है। उनके मुताबिक केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों ने इसके संभावित प्रभावों से निपटने के लिए पहले से ही कमर कस ली है।
कब दिखेगा अल नीनो का असली असर
डॉ. महापात्र के अनुसार जुलाई, अगस्त और सितंबर की शुरुआत तक देश में मध्यम स्तर की अल नीनो परिस्थितियां बनी रहने का अनुमान है। इसके बाद इसकी तीव्रता बढ़ सकती है। उन्होंने बताया कि मौसम विभाग लगातार हालात पर नजर रखे हुए है और जरूरत पड़ने पर समय रहते चेतावनी तथा सलाह जारी की जाएगी।
अल नीनो दरअसल एक जलवायु परिघटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के सतही जल का तापमान सामान्य से ऊपर चला जाता है। इसका प्रभाव दुनिया भर के तापमान और वर्षा के स्वरूप पर पड़ता है। भारत जैसे कृषि आधारित देश के लिए यह खासतौर पर अहम है, क्योंकि दक्षिण-पश्चिम मानसून पर इसकी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष छाया पड़ सकती है, और मानसून ही देश की खेती, जल संसाधन तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।
निपटने के लिए कैसी है तैयारी
IMD प्रमुख के अनुसार सरकार संभावित जोखिम को भांपते हुए राज्यों और जिलों को विशेष निगरानी रखने के निर्देश पहले ही दे चुकी है। जिन इलाकों में सामान्य से कम बारिश का अंदेशा है, वहां त्वरित कदम उठाने की योजना बनाई जा रही है। कृषि क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए बीजों की उपलब्धता, जल प्रबंधन और वैकल्पिक फसल योजनाओं पर खास ध्यान दिया जा रहा है।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी किसानों से अपील की है कि वे घबराएं नहीं, बल्कि समय रहते तैयारी करें। उन्होंने कहा कि देश के प्रमुख जलाशयों में इस समय जल स्तर सामान्य से बेहतर स्थिति में है, जिससे खरीफ फसलों को सहारा मिलेगा और संभावित सूखे जैसे हालात का असर कुछ हद तक कम किया जा सकेगा।
मानसून कमजोर पड़ा तो क्या होगा
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि अल नीनो का असर तेज होता है और वर्षा घटती है, तो इसका प्रभाव कृषि उत्पादन तथा देश की आर्थिक विकास दर पर पड़ सकता है। खासकर तिलहन, दलहन, खाद्य तेल और कपास जैसी अपेक्षाकृत कम सिंचित फसलें ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं, जिससे खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका भी पैदा हो सकती है।
डॉ. महापात्र ने बताया कि उत्तर-पश्चिम भारत, मध्य भारत और प्रायद्वीपीय भारत के पश्चिमी हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। गुजरात और राजस्थान से लेकर ओडिशा, उत्तरी आंध्र प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ तक के कुछ क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएं अपेक्षाकृत सीमित हैं। ऐसे इलाकों में अगर बारिश कम रही तो उसका असर अधिक गंभीर हो सकता है।
पूर्वानुमान प्रणाली में बड़ा सुधार
मौसम पूर्वानुमान प्रणाली में हुई प्रगति का जिक्र करते हुए महापात्र ने बताया कि 2021 से 2025 के बीच दीर्घकालिक मानसून पूर्वानुमान में त्रुटि घटकर केवल 2.2 प्रतिशत रह गई है, जबकि 2016 से 2020 के दौरान यह 7.5 प्रतिशत थी। उन्होंने कहा कि नई तकनीक और आधुनिक पद्धतियों के चलते राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ अलग-अलग क्षेत्रों के लिए भी पूर्वानुमान की सटीकता में उल्लेखनीय सुधार आया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो की चुनौती को देखते हुए सतर्कता, वैज्ञानिक तैयारी और समय पर कार्रवाई ही इसके संभावित प्रभावों को कम करने की सबसे कारगर रणनीति साबित होगी।
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