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एक महीने पहले
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खेत बनी कक्षा, शिक्षक बने साथी
बिहार के समस्तीपुर जिले में स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा इन दिनों एक ऐसी तस्वीर को लेकर चर्चा में है जिसने कृषि शिक्षा के पारंपरिक ढर्रे को बदल दिया है। अक्सर हम विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और वैज्ञानिकों को वातानुकूलित सभागारों में भाषण देते या प्रयोगशालाओं में शोध करते देखते हैं, लेकिन पूसा में नजारा बिल्कुल अलग था। यहां कुलपति डॉ. पी. एस. पांडेय ने अपने पद की गरिमा के साथ-साथ अपनी पेंट के पोंछे मोड़े और सीधे कीचड़ भरे खेत में उतर गए। उनके साथ विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक, शिक्षक और स्नातकोत्तर छात्र-छात्राओं का एक बड़ा दल मौजूद था, जो धान की रोपाई के पारंपरिक और वैज्ञानिक तरीकों को व्यवहार में ला रहे थे।
धान रोपाई मिलन कार्यक्रम का उद्देश्य
विश्वविद्यालय के प्रायोगिक फार्म में आयोजित इस विशेष आयोजन को 'धान रोपाई मिलन कार्यक्रम' का नाम दिया गया था। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य केवल धान की खेती करना नहीं, बल्कि छात्रों को कृषि की वास्तविक और कठिन परिस्थितियों का अनुभव कराना था। खेत में उतरते ही कुलपति डॉ. पी. एस. पांडेय ने खुद धान की पौध उठाई और छात्रों को यह सिखाया कि किस तरह कतारबद्ध तरीके से पौधों को रोपा जाना चाहिए। इस दौरान उन्होंने पौधों के बीच की आदर्श दूरी और वैज्ञानिक रोपाई के उन बारीकियों को विस्तार से समझाया जो अक्सर किताबी ज्ञान में छूट जाती हैं। पीजीसीए के डीन डॉ. मयंक राय और धान वैज्ञानिकों की पूरी टीम इस दौरान छात्रों का मार्गदर्शन करती रही, जिससे खेत एक जीवंत पाठशाला में बदल गया।
शिक्षा में व्यवहारिकता का महत्व
छात्रों को संबोधित करते हुए कुलपति डॉ. पी. एस. पांडेय ने स्पष्ट कहा कि कृषि का ज्ञान केवल चारदीवारी के भीतर नहीं मिल सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक भविष्य के कृषि वैज्ञानिक मिट्टी की नमी, पानी की खपत और फसलों की चुनौतियों को खुद अनुभव नहीं करेंगे, तब तक वे किसानों की समस्याओं का सटीक समाधान नहीं ढूंढ पाएंगे। डॉ. पांडेय ने कहा कि विश्वविद्यालय का हर शोध इस तरह का होना चाहिए जो सीधे तौर पर किसान की आय बढ़ाने और उनकी जरूरतों को पूरा करने में मददगार हो। उन्होंने छात्रों को प्रेरित करते हुए कहा कि उन्हें केवल एक डिग्री लेने वाला स्नातक नहीं, बल्कि जमीन से जुड़ा हुआ कृषि वैज्ञानिक बनना चाहिए।
वैज्ञानिक पद्धति और तकनीकी प्रशिक्षण
इस पूरे कार्यक्रम में धान की रोपाई के साथ-साथ खेत की पैडलिंग, ले-आउट डिजाइनिंग और पौधों के बेहतर प्रबंधन का प्रशिक्षण भी दिया गया। धान वैज्ञानिक डॉ. नीलांजय ने जानकारी दी कि इस प्रकार के फील्ड प्रदर्शन से छात्रों का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में खेती की चुनौतियां बढ़ गई हैं, जिसके लिए छात्रों को व्यावहारिक रूप से तैयार होना आवश्यक है। प्रशिक्षण में शामिल छात्रों ने भी माना कि जो बातें उन्हें किताबों में जटिल लगती थीं, उन्हें खेत में अपने हाथों से करने के बाद समझना और याद रखना अब बहुत आसान हो गया है।
एक टीम के रूप में विश्वविद्यालय परिवार
इस आयोजन की सबसे प्रेरणादायक बात यह थी कि पूरा विश्वविद्यालय परिवार एक टीम की तरह मिलकर काम कर रहा था। वहां कोई पदानुक्रम नहीं था। किसी ने पौध तैयार करने की जिम्मेदारी संभाली, तो कोई रोपाई की सही विधि बताने में जुटा था। छात्रों ने अपने शिक्षकों और वैज्ञानिकों को पूरे मनोयोग से खेती करते हुए देखा, जिससे उनके मन में कृषि के प्रति सम्मान और गहरा हुआ। यह अनुभव छात्रों के लिए केवल सीखने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके अंदर कृषि विज्ञान के प्रति जुनून और समर्पण को भी जगा गया।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई नई मिसाल
सोशल मीडिया पर इस पहल की चारों ओर प्रशंसा हो रही है। लोग इस 'पूसा मॉडल' को देश की कृषि शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बेहतरीन उदाहरण बता रहे हैं। इंटरनेट पर वायरल हो रही इन तस्वीरों के माध्यम से एक बड़ा संदेश जा रहा है कि खेती-किसानी की असली शिक्षा मिट्टी और खेत की मेहनत के बीच ही छिपी है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय द्वारा शुरू की गई यह अनोखी मुहिम अब धीरे-धीरे अन्य संस्थानों के लिए भी एक मिसाल बनती जा रही है। यदि देश के सभी कृषि विश्वविद्यालय इसी तर्ज पर छात्रों को खेत से जोड़ने का कार्य करें, तो निश्चित रूप से आने वाले समय में ऐसे कृषि वैज्ञानिकों की फौज तैयार होगी जो किसान और खेत की भाषा को बखूबी समझते होंगे।
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