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एक घंटा पहले
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शिक्षा व्यवस्था बनाम रोजगार बाजार की हकीकत
कॉलेज से डिग्री प्राप्त करने के बाद यदि युवा को उसकी पढ़ाई के अनुरूप रोजगार न मिले, तो यह केवल उस व्यक्ति की असफलता नहीं होती, बल्कि पूरे देश की शिक्षा प्रणाली पर बड़े सवाल खड़े करती है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट ने इसी गंभीर समस्या को आईना दिखाया है। देश में सामान्य डिग्री कोर्स जैसे कि BA, BSc और BCom में करोड़ों छात्र अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन डिग्रियों का सीधा लाभ रोजगार के रूप में बहुत कम छात्रों को ही मिल पा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल 8.25 फीसदी ग्रेजुएट्स ही ऐसे हैं जो अपनी शैक्षणिक योग्यता के मुताबिक नौकरी कर रहे हैं। आयोग ने साफ तौर पर कहा है कि अब समय आ गया है कि डिग्रियों को सीधे तौर पर इंडस्ट्री की जरूरतों से जोड़ा जाए और स्किलिंग यानी कौशल विकास पर अत्यधिक जोर दिया जाए।
उच्च शिक्षा और रोजगार में बढ़ता अंतर
भारत में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद नौकरी पाने की चुनौती एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था और नौकरी बाजार के बीच एक बहुत बड़ा गैप बना हुआ है। जहां करोड़ों छात्र सामान्य डिग्रियों के माध्यम से स्नातक हो रहे हैं, वहीं इन डिग्रियों का इंडस्ट्री की मांग के साथ जुड़ाव बेहद कमजोर है। आयोग ने इस स्थिति को सुधारने के लिए पाठ्यक्रमों को बदलने और कौशल विकास पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करने की सिफारिश की है।
डिग्री से ज्यादा महत्वपूर्ण स्किल
नीति आयोग की शनिवार को जारी रिपोर्ट जिसका शीर्षक रिइमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत है, उसमें उच्च शिक्षा और रोजगार के बीच मौजूद इस बुनियादी अंतर को लेकर गहरी चिंता जताई गई है। रिपोर्ट कहती है कि देश की तकनीकी और उच्च शिक्षा प्रणाली में जो पढ़ाया जा रहा है, और बाजार में जिस प्रकार के कौशल की मांग है, उन दोनों के बीच भारी तालमेल की कमी है। ज्यादातर शैक्षणिक संस्थानों का पाठ्यक्रम पुरानी पद्धति पर आधारित है और समय के साथ इंडस्ट्री की बदलती जरूरतों के हिसाब से अपडेट नहीं हुआ है। इसका सीधा असर छात्रों पर पड़ रहा है, जिन्हें डिग्री और डिप्लोमा हासिल करने के बाद भी रोजगार के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के आंकड़ों को आधार बनाते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि 90 फीसदी से ज्यादा ग्रेजुएट्स ऐसी नौकरियों में कार्यरत हैं जो उनकी पढ़ाई से सीधे तौर पर मेल नहीं खातीं।
ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी दर और चिंताएं
नीति आयोग ने शिक्षित युवाओं के बीच बढ़ती बेरोजगारी को एक बड़ी चुनौती के रूप में चिह्नित किया है। रिपोर्ट के अनुसार, देश के सभी ग्रेजुएट्स के बीच बेरोजगारी की दर लगभग 13 फीसदी है, जबकि महिला ग्रेजुएट्स के मामले में यह आंकड़ा और भी भयावह यानी 20.4 फीसदी तक पहुंच जाता है। यदि हम इसे देश की कुल बेरोजगारी दर से तुलना करें, जो कि 3.2 फीसदी है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद युवाओं के लिए रोजगार का संकट राष्ट्रीय औसत से कई गुना ज्यादा है।
सामान्य डिग्रियों का विशाल दायरा
देश के अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम्स में करीब 3.4 करोड़ छात्र पंजीकृत हैं। इनमें से केवल BA की पढ़ाई करने वाले छात्रों की संख्या 1.13 करोड़ है। यदि हम BA, BSc और BCom को मिलाकर देखें, तो इन तीन सामान्य डिग्री कार्यक्रमों में ही 2 करोड़ से ज्यादा छात्र पढ़ रहे हैं। नीति आयोग का मानना है कि इन डिग्रियों के साथ रोजगार की गारंटी कम होने के कारण, छात्रों को अपनी डिग्री पूरी करने के बावजूद अतिरिक्त कौशल सीखने के लिए मजबूर होना पड़ता है। आयोग का सुझाव है कि इन पाठ्यक्रमों को पारंपरिक तरीके से चलाने के बजाय इन्हें स्पेशलाइजेशन के साथ तैयार किया जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, B.A. Hospitality, B.Sc. Applied Technology और B.Com. Analytics जैसे कोर्स विकसित करने की आवश्यकता है, ताकि छात्रों की पढ़ाई सीधे तौर पर रोजगार से जुड़ सके।
कौशल विकास को लेकर समाज की सोच
नीति आयोग ने शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ स्किलिंग को लेकर समाज में फैली गलत धारणाओं पर भी कड़े सवाल उठाए हैं। आज भी हमारे देश में वोकेशनल ट्रेनिंग, ITI और डिप्लोमा जैसे विकल्पों को 'दूसरे दर्जे' का समझा जाता है। माता-पिता और स्वयं छात्र भी तकनीकी प्रशिक्षण को पारंपरिक डिग्री के मुकाबले कम महत्व देते हैं। करियर का चुनाव करते समय युवा अपनी रुचि और क्षमता के बजाय परीक्षा में मिले अंकों या परिवार के दबाव में फैसला लेते हैं। नीति आयोग के अनुसार, सफल और समान पृष्ठभूमि वाले लोगों की कहानियां सामने न आने से भी वोकेशनल एजुकेशन को उतनी प्राथमिकता नहीं मिल पाती है, जितनी मिलनी चाहिए थी।
जानकारी का अभाव और स्किलिंग में कमी
रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि सही कोर्स और स्किलिंग कार्यक्रमों के बारे में युवाओं के पास जानकारी का भारी अभाव है। आंकड़े बताते हैं कि 47 फीसदी महिलाएं, 43 फीसदी युवा, 36 फीसदी उच्च शिक्षा प्राप्त छात्र, 52 फीसदी औपचारिक क्षेत्र के कर्मचारी और 55 फीसदी अनौपचारिक क्षेत्र के कर्मचारी किसी भी प्रकार की स्किलिंग नहीं कर रहे हैं। युवाओं को यह पता ही नहीं होता कि उनके करियर के लिए कौन सा प्रशिक्षण कार्यक्रम सबसे उपयुक्त होगा।
आर्थिक लाभ और सैलरी का गणित
बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) के आंकड़ों के अनुसार, बिना स्किलिंग के सामान्य डिग्री करने वाले युवाओं की शुरुआती सैलरी लगभग 22 हजार रुपये प्रति माह होती है। वहीं, डिग्री के साथ स्किलिंग करने वाले युवाओं की शुरुआती सैलरी 29 हजार रुपये प्रति माह तक होती है। दोनों ही मामलों में सालाना वेतन वृद्धि 3.2 फीसदी मानी गई है। यदि हम 10 साल की अवधि को देखें, तो दोनों के बीच कुल आय का अंतर 9.7 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। करियर का चयन करते समय छात्रों को इस आर्थिक लाभ की जानकारी नहीं होती, जो कि एक बड़ी समस्या है।
महिलाओं के लिए चुनौतियां
रिपोर्ट में महिलाओं के रोजगार और स्किलिंग से जुड़ी चुनौतियों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। परिवार की अनुमति, सुरक्षा, समय की उपलब्धता और ट्रेनिंग के बाद नौकरी की अनिश्चितता महिलाओं के लिए बड़े अवरोध हैं। कई महिलाएं नई स्किल सीखना तो चाहती हैं, लेकिन उन्हें सही और भरोसेमंद वातावरण नहीं मिल पाता है।
NEET कैटेगरी का मुद्दा
रिपोर्ट में 15 से 29 वर्ष की आयु के 8.7 करोड़ लोगों का जिक्र किया गया है जो NEET यानी नॉट इन एजुकेशन, एम्प्लायमेंट ऑर ट्रेनिंग श्रेणी में आते हैं। यह आंकड़ा कामकाजी आबादी का लगभग 11 फीसदी है। हालांकि, आयोग ने स्पष्ट किया है कि NEET में शामिल लोग वे हैं जो रोजगार की तलाश नहीं कर रहे हैं, इसलिए इसे सीधे तौर पर बेरोजगारी नहीं कहा जा सकता।
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट का संदर्भ
शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी के मुद्दे को अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया' रिपोर्ट ने भी गंभीरता से उठाया है। रिपोर्ट के अनुसार, 25 वर्ष से कम उम्र के ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी 1983 में 35 फीसदी थी जो 2023 में बढ़कर 39 फीसदी हो गई है। वहीं 25 से 29 वर्ष के ग्रेजुएट्स में यह आंकड़ा 12 फीसदी से बढ़कर 20 फीसदी तक पहुंच गया है।
मौजूदा स्किलिंग सिस्टम में सुधार
नीति आयोग ने कहा है कि सरकारी कौशल विकास योजनाओं का ध्यान सिर्फ नामांकन और कोर्स पूरा कराने पर नहीं, बल्कि रोजगार के परिणामों पर होना चाहिए। योजनाओं की सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि कितने छात्रों को नौकरी मिली और उनकी आय में कितनी वृद्धि हुई। आयोग ने सरकारी योजनाओं जैसे PMKVY, DDU-GKY और PM इंटर्नशिप स्कीम के बारे में जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया है।
PPP और स्वायत्तता की दिशा
नीति आयोग ने सलाह दी है कि स्किलिंग संस्थानों को इंडस्ट्री से सीधे तौर पर जोड़ा जाए। ओडिशा के वर्ल्ड स्किल सेंटर की तर्ज पर PPP (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) के जरिए नई स्किलिंग यूनिवर्सिटी बनाने का सुझाव दिया गया है। इसके अलावा, ITI को अपनी स्थानीय जरूरतों के हिसाब से कोर्स बदलने और प्रशिक्षकों की नियुक्ति करने की प्रशासनिक स्वायत्तता देने की बात भी कही गई है, ताकि युवाओं को बाजार की मांग के अनुरूप तैयार किया जा सके।
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