IIT में शिक्षकों का भारी संकट: क्या सैलरी की दौड़ में पिछड़ रहे देश के दिग्गज संस्थान, आधे से ज्यादा पद खाली करियर 2 महीने पहले 83
देश के 23 आईआईटी संस्थानों में फैकल्टी की भारी कमी देखने को मिल रही है, जहां स्वीकृत पदों में से 38 प्रतिशत से अधिक सीटें खाली पड़ी हैं। शोधकर्ता बेहतर अवसरों की तलाश में विदेशों का रुख कर रहे हैं, जिससे शिक्षण व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहा है।

आईआईटी में फैकल्टी की कमी का बड़ा संकट

देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों यानी आईआईटी (IIT) के बारे में अक्सर यह माना जाता है कि वहां पढ़ाई और संसाधनों का स्तर विश्व स्तरीय होता है। लाखों छात्र इन संस्थानों में दाखिला पाने के लिए वर्षों तक कड़ी मेहनत करते हैं। लेकिन हकीकत में इन संस्थानों की शिक्षण व्यवस्था एक गंभीर संकट से जूझ रही है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश के सभी 23 आईआईटी में शिक्षकों के स्वीकृत पदों की तुलना में एक बड़ा हिस्सा लंबे समय से खाली पड़ा है। हालांकि सरकार लगातार नए आईआईटी परिसरों का विस्तार कर रही है और छात्रों की संख्या के साथ-साथ अत्याधुनिक कोर्सेज की शुरुआत भी की जा रही है, लेकिन इन संस्थानों में पढ़ाने वाले योग्य शिक्षकों की पर्याप्त संख्या सुनिश्चित करने में भारी मुश्किल आ रही है। जमीनी स्थिति यह है कि हर पांच में से दो फैकल्टी पद खाली हैं, जो देश के उच्च शिक्षा तंत्र के लिए चिंता का विषय है।

आंकड़े बयां कर रहे हैं बदहाली

एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कुल 23 आईआईटी संस्थानों में शिक्षकों के 12,498 पद स्वीकृत किए गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इस साल 30 जनवरी तक इनमें से 4,804 पद रिक्त पड़े थे। यह संख्या कुल स्वीकृत पदों का 38.4 प्रतिशत है। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पुराने और प्रतिष्ठित माने जाने वाले संस्थानों का प्रदर्शन भी इस मामले में निराशाजनक है। आईआईटी पटना में तो स्थिति सबसे खराब है, जहां 54.6 प्रतिशत पद खाली हैं। वहीं, आईआईटी खड़गपुर में भी 51.3 प्रतिशत पदों पर शिक्षकों की कमी बनी हुई है। इन दो संस्थानों के अलावा 12 अन्य आईआईटी ऐसे हैं, जहां 33 प्रतिशत से ज्यादा फैकल्टी सीटें खाली पड़ी हैं।

क्यों खाली हैं देश के टॉप इंजीनियरिंग संस्थानों में पद?

शिक्षा विशेषज्ञों और आईआईटी निदेशकों का मानना है कि इस कमी के पीछे कई जटिल कारण जिम्मेदार हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण कारण वैश्विक स्तर पर रिसर्चर्स के लिए बना एक बड़ा बाजार है। आईआईटी का मुकाबला अब केवल देश के अन्य संस्थानों से नहीं है, बल्कि दुनिया की नामी यूनिवर्सिटीज, बड़ी मल्टीनेशनल रिसर्च लैब्स और बेहतरीन स्टार्टअप कंपनियों से है। आज का दौर प्रतिस्पर्धा का है, जहां पीएचडी हासिल करने वाले प्रतिभावान युवा विदेशों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। विदेशी संस्थानों और कंपनियों में मिलने वाला भारी-भरकम पैकेज और शोध के लिए मिलने वाली बेहतरीन सुविधाएं युवा प्रोफेशनल्स को आईआईटी की ओर आने से रोक रही हैं। इसके चलते देश के सर्वश्रेष्ठ दिमाग अब अपनी प्रतिभा का लोहा विदेशों में मनवा रहे हैं।

संस्थानों की कवायद और भविष्य की चुनौतियां

आईआईटी प्रशासन इस फैकल्टी संकट को दूर करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है। भर्ती प्रक्रिया को सालभर खुला रखा गया है और 'मिशन मोड' के तहत नियुक्तियां की जा रही हैं। शिक्षण संस्थानों का जोर रिसर्च ग्रांट्स बढ़ाने, प्रयोगशालाओं को अत्याधुनिक बनाने और कैंपस में स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देने पर है, ताकि दुनिया भर के विद्वान शिक्षक यहां आने के लिए प्रोत्साहित हों। आईआईटी मद्रास जैसे संस्थान इस कमी को पाटने के लिए 'प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस', विजिटिंग फैकल्टी और एडजंक्ट फैकल्टी की मदद ले रहे हैं, जिससे छात्रों की पढ़ाई में बाधा न आए। हालांकि, प्रशासकों का यह भी मानना है कि अचानक बहुत ज्यादा भर्तियां करने से भविष्य में रिटायरमेंट के समय असंतुलन पैदा हो सकता है। फिलहाल आईआईटी के सामने अपनी शोध की गुणवत्ता को बनाए रखने के साथ-साथ शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने की एक दोहरी और चुनौतीपूर्ण स्थिति बनी हुई है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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