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एक घंटा पहले
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भारत 2060 तक परचेजिंग पावर के आधार पर वैश्विक GDP में हिस्सेदारी के मामले में चीन को पीछे छोड़ सकता है। मौजूदा दौर का भारत न थमता है, न रुकता है, बल्कि सिर्फ आगे बढ़ना जानता है। सड़कों पर दौड़ती वंदे भारत ट्रेनें हों, दुनिया को हैरान करता डिजिटल UPI पेमेंट सिस्टम हो या फिर हर देश में पहचान बनाता भारतीय टैलेंट, ये सभी इस बात के गवाह हैं कि देश की रफ्तार अब किसी के रोके रुकने वाली नहीं है।
अक्सर सोशल मीडिया पर या चाय की दुकान पर यह बहस होती है कि क्या भारत कभी चीन से आगे निकल पाएगा। कई लोग मानते हैं कि चीन इतना आगे जा चुका है कि उसे पीछे छोड़ पाना मुश्किल है। लेकिन फ्रांस की राजधानी पेरिस से सामने आई एक रिपोर्ट इस सोच को बदलने वाली है।
पेरिस की रिपोर्ट में क्या कहा गया
पेरिस स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स से जुड़ी संस्था वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब (World Inequality Lab) ने अपने आकलन में साफ कहा है कि वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब वैश्विक बाजार में भारत चीन की बादशाहत को चुनौती देकर उससे आगे निकल जाएगा। रिपोर्ट में किसी अनुमान के बजाय ठोस आंकड़ों के आधार पर बात रखी गई है।
रिपोर्ट के अनुसार 2060 तक परचेजिंग पावर यानी आम आदमी की खरीदने की ताकत के मामले में भारत दुनिया की कुल GDP में चीन की हिस्सेदारी को पीछे छोड़ देगा। आज जिसे चीन का 'ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब' कहा जाता है, उसकी चमक आने वाले समय में फीकी पड़ने लगेगी और भारत दुनिया की अर्थव्यवस्था का नया इंजन बनकर उभरेगा।
आखिर क्यों कमजोर पड़ेगा चीन
पेरिस के विशेषज्ञों ने चीन की सबसे बड़ी कमजोरी को सटीक तरीके से पहचाना है। चीन की असली ताकत उसकी विशाल आबादी और फैक्ट्रियों में काम करने वाले सस्ते श्रमिक रहे हैं। लेकिन अब चीन अपनी ही नीतियों के जाल में उलझ चुका है। वहां की आबादी इतनी तेजी से बूढ़ी हो रही है और घट रही है कि उसकी आर्थिक रफ्तार पर ब्रेक लगना तय माना जा रहा है।
आबादी के बदलते आंकड़े
आजादी के समय यानी 1945 में दुनिया का हर चौथा व्यक्ति चीनी था और उसकी आबादी विश्व की कुल आबादी का 23% थी। आज यह आंकड़ा घटकर 17 फीसदी पर आ गया है। अनुमान है कि 21वीं सदी के अंत तक चीन की आबादी सिमटकर दुनिया की कुल आबादी का महज 8 प्रतिशत रह जाएगी।
रिपोर्ट के मुताबिक चीन की घटती आबादी के चलते 21वीं सदी के दूसरे हिस्से में उसकी आर्थिक हिस्सेदारी स्थिर होकर कम होने लगेगी। दूसरी ओर भारत की बड़ी और युवा आबादी उसे लंबी अवधि में बढ़त दिलाने का काम करेगी। यही वजह है कि जो आबादी कभी चीन की सबसे बड़ी ताकत थी, वही आने वाले वक्त में उसकी कमजोरी बन जाएगी।
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