पशुपालक सावधान: बचत के चक्कर में मवेशियों को भूलकर भी न दें ऐसा खाना, जा सकती है उनकी जान बिहार 2 महीने पहले 79
जहानाबाद की पशु चिकित्सक डॉक्टर रानी ने चेतावनी दी है कि शादी-ब्याह का बचा हुआ भोजन, शीरा और मैदे का आटा मवेशियों को खिलाने से उनमें जानलेवा 'अफरा' बीमारी हो सकती है।

भारत में कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। गाय, भैंस और बकरी जैसे पशुओं को पालकर हमारे किसान भाई अपनी कमाई का जरिया बढ़ाते हैं। समय के साथ पशुपालन का दायरा काफी बढ़ा है और यह एक मुनाफे का व्यवसाय बनकर उभरा है। लेकिन कई बार जानकारी के अभाव और कुछ छोटी-छोटी गलतियों के कारण पशुपालकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। कई बार तो पशु गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं और उनकी मौत तक हो जाती है, जिससे किसानों को आर्थिक और मानसिक रूप से बड़ा झटका लगता है। इसलिए पशुओं की देखभाल और उनके स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना बेहद आवश्यक है।

बचे हुए भोजन को खिलाने की आदत पड़ सकती है भारी

अक्सर घरों में या विशेषकर शादी-ब्याह और त्योहारों के सीजन में काफी मात्रा में भोजन बच जाता है। ऐसे में लोग अन्न की बर्बादी को रोकने या पैसे की बचत करने के चक्कर में बचा हुआ भोजन, जैसे रसगुल्ले की चाशनी या शीरा, पूरी बनाने के लिए गूंथा हुआ मैदा या आटा और अन्य बासी सामग्रियां अपने मवेशियों को खिला देते हैं। पशुपालकों को लगता है कि वे एक अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन असल में यह उनके पशुओं के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। यह छोटी सी लापरवाही पशुओं के स्वास्थ्य के लिए काल बन सकती है।

जहानाबाद की पशु चिकित्सक डॉक्टर रानी ने दी चेतावनी

बिहार के जहानाबाद में स्थित पशु चिकित्सालय में कार्यरत पशु चिकित्सक डॉक्टर रानी ने इस विषय पर विस्तार से जानकारी दी है। उन्होंने पशुपालकों को आगाह करते हुए कहा है कि इस तरह का खान-पान पशुओं के स्वास्थ्य के साथ एक बड़ा खिलवाड़ है। शादी-ब्याह के सीजन में यह समस्या काफी बढ़ जाती है। लोग बिना सोचे-समझे बचा हुआ मीठा शीरा और मैदे का आटा पशुओं के आगे डाल देते हैं। यह भोजन पशुओं के पेट में जाते ही एक तरह का जहर बन जाता है और उनकी नसों को ब्लॉक कर देता है।

क्या है अफरा या ब्लोटिंग की समस्या?

चिकित्सकों के अनुसार, इस तरह के गरिष्ठ और अनुचित खाद्य पदार्थों का सेवन करने से पशुओं में 'अफरा' या 'ब्लोटिंग' यानी पेट फूलने की गंभीर समस्या पैदा हो जाती है। यह एक ऐसी आपातकालीन स्थिति होती है, जिसमें पशु का पेट गैस के कारण अत्यधिक फूल जाता है।

यह बीमारी निम्नलिखित तरीकों से पशुओं को प्रभावित करती है:

  • श्वसन तंत्र पर असर: पेट अत्यधिक फूलने के कारण पशु की सांस नली पर भारी दबाव पड़ता है, जिससे उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगती है।
  • अंगों का ब्लॉक होना: यह भोजन पशु के पेट के भीतर जाकर नसों को पूरी तरह अवरुद्ध कर देता है।
  • हृदय और फेफड़ों पर दबाव: गैस का बढ़ता दबाव पशु के हृदय (हार्ट) और फेफड़ों (लंग्स) के कार्य को बुरी तरह प्रभावित करता है।

इलाज भी बन जाता है जानलेवा

डॉक्टर रानी बताती हैं कि जब पशु इस गंभीर स्थिति में पहुंच जाता है, तो उसे बचाना बहुत मुश्किल हो जाता है। यह एक अत्यंत गंभीर आपातकालीन स्थिति होती है। इस हालत में डॉक्टरों को जो चिकित्सा पद्धति अपनानी पड़ती है, वह बेहद दर्दनाक और जटिल होती है। कई बार तो कमजोर या बीमार पशु इस भारी-भरकम इलाज की प्रक्रिया को ही बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं और इस दौरान उनकी मौत हो जाती है। इसलिए इलाज की नौबत आने देने से बेहतर है कि पहले से ही सावधानी बरती जाए।

पशुपालकों के लिए महत्वपूर्ण सुझाव

पशुओं को इस जानलेवा बीमारी से सुरक्षित रखने के लिए पशुपालकों को कुछ जरूरी नियमों का पालन करना चाहिए:

  • बचे हुए मीठे और मैदे के भोजन से दूरी: शादी या पार्टियों का बचा हुआ भोजन, विशेषकर रसगुल्ले का शीरा, मैदे की पूरियां या गूंथा हुआ आटा भूलकर भी पशुओं को न दें।
  • नियमित और संतुलित आहार: पशुओं को केवल वही चारा और दाना दें जो उनके पाचन तंत्र के अनुकूल हो और आसानी से पच सके।
  • लक्षणों पर तुरंत ध्यान दें: यदि पशु के पेट में दर्द, बेचैनी या पेट फूलने के लक्षण दिखाई दें, तो घरेलू नुस्खों के भरोसे रहने के बजाय तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
  • अंधविश्वास और लापरवाही से बचें: थोड़ी सी बचत के लालच में पशुओं की जान जोखिम में न डालें, क्योंकि एक पशु की मौत से होने वाला नुकसान इस छोटी सी बचत से कहीं गुना ज्यादा होता है।

संक्षेप में कहें तो, पशुओं की उचित देखभाल और सही खान-पान ही आपकी समृद्धि का आधार है। थोड़ी सी समझदारी दिखाकर आप अपने मवेशियों को इस जानलेवा खतरे से बचा सकते हैं और खुद को बड़े आर्थिक नुकसान से भी सुरक्षित रख सकते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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