राष्ट्रीय राजनीति
2 घंटे पहले
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विचारों
परिसीमन का विवाद और दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएं
देश में लोकसभा सीटों के नए सिरे से निर्धारण यानी परिसीमन (डीलिमिटेशन) को लेकर छिड़ी बहस अब एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले चुकी है। केंद्र सरकार संसद के माध्यम से परिसीमन विधेयक को पारित कराने की पुरजोर कोशिश कर रही है। हालांकि, इस विधेयक को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों और विशेषकर विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में गंभीर चिंताएं और विरोध के स्वर देखे जा रहे हैं। दक्षिण भारतीय राज्यों का मानना है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनके सफल प्रयासों का उन्हें राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी कड़ी में, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय द्वारा हाल ही में दिए गए एक बयान ने राज्य की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है, जिसके बाद विपक्षी दल उन पर हमलावर हो गए हैं और उन पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगा रहे हैं।
दरअसल, परिसीमन का यह मुद्दा सीधे तौर पर राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संसद में उनकी आवाज से जुड़ा हुआ है। उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में दक्षिण भारत के राज्यों ने पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या वृद्धि दर को नियंत्रित करने में शानदार सफलता हासिल की है। अब आशंका यह जताई जा रही है कि यदि आगामी परिसीमन केवल वर्तमान जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर किया गया, तो उत्तर भारतीय राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या काफी बढ़ जाएगी, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों की सीटों का अनुपात कम हो जाएगा। इसी संवेदनशीलता के बीच मुख्यमंत्री विजय का ताजा बयान सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
महाबलीपुरम की बैठक और मुख्यमंत्री विजय का बयान
यह विवाद तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने महाबलीपुरम में आयोजित दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की 31वीं बैठक के दौरान परिसीमन के मुद्दे पर अपनी बात रखी। इस महत्वपूर्ण बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री और दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि शामिल थे। बैठक में अपने संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री विजय ने केंद्र सरकार से एक स्पष्ट और कानूनी आश्वासन देने की मांग की। उन्होंने कहा कि केंद्र को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन दक्षिण भारतीय राज्यों ने राष्ट्रीय नीतियों के अनुरूप जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू किया है, संसद में उनके प्रतिनिधित्व में किसी भी प्रकार की कमी न आए।
मुख्यमंत्री विजय ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि केंद्र सरकार को इस संबंध में एक ठोस कानूनी गारंटी देनी चाहिए ताकि किसी भी राज्य की संसद में प्रतिनिधित्व की हिस्सेदारी केवल जनसंख्या के उतार-चढ़ाव के कारण कम न हो। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसा आश्वासन देश के संघीय संतुलन को बनाए रखने, राज्यों के बीच निष्पक्षता सुनिश्चित करने और हमारे देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं में सभी राज्यों का भरोसा और अधिक मजबूत करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। उनके अनुसार, देश के विकास और परिवार नियोजन में योगदान देने वाले राज्यों को इस योगदान की सजा नहीं मिलनी चाहिए।
विपक्ष का हमला: 'यू-टर्न' और 'फ्लिप-फ्लॉप' के गंभीर आरोप
इस पूरे मामले में विवाद की मुख्य वजह मुख्यमंत्री विजय का वह रुख रहा, जो उन्होंने इस बैठक में अपनाया। दरअसल, उन्होंने अपने संबोधन में 12 अगस्त को तमिलनाडु विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित उस ऐतिहासिक प्रस्ताव का कोई सीधा जिक्र नहीं किया, जिसमें लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को स्थायी रूप से फ्रीज रखने और राज्यों के बीच सीटों के वर्तमान वितरण को जस का तस बनाए रखने की मांग की गई थी।
विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री के इस बदले हुए रुख को आड़े हाथों लिया है और उन पर अपना स्टैंड बदलने का आरोप लगाया है। मुख्य विपक्षी दल डीएमके के प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने मुख्यमंत्री विजय पर परिसीमन के इस अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर 'फ्लिप-फ्लॉप' (दोहरा रवैया) करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री का यह रुख दर्शाता है कि वे केंद्र के सामने राज्य के हितों की मजबूती से पैरवी करने में हिचकिचा रहे हैं।
दूसरी ओर, एआईएडीएमके के IT विंग ने राज्य सरकार के इस कदम को पूरी तरह से 'यू-टर्न' करार दिया है। पार्टी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा करते हुए तीखा सवाल उठाया कि जब तमिलनाडु विधानसभा में सीटों के वितरण को स्थायी रखने का प्रस्ताव पारित किया गया था, तो अब मुख्यमंत्री के रुख में यह बदलाव क्यों दिखाई दे रहा है? एआईएडीएमके ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री अब उसी भाषा का उपयोग कर रहे हैं जो केंद्र सरकार पहले से कहती आ रही है, जिससे राज्य के अधिकार कमजोर हो सकते हैं।
सत्तारूढ़ टीवीके और सरकार का स्पष्टीकरण
विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे इन सभी आरोपों को सत्तारूढ़ पार्टी टीवीके ने सिरे से खारिज कर दिया है। टीवीके के IT विंग ने मुख्यमंत्री का बचाव करते हुए कहा कि उनके भाषण में दक्षिण भारतीय राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखने के लिए एक व्यापक और दूरदर्शी दृष्टिकोण पेश किया गया है। पार्टी के अनुसार, 12 अगस्त को विधानसभा में पारित प्रस्ताव इसी दृष्टिकोण को एक ठोस और व्यावहारिक रूप प्रदान करता है, इसलिए दोनों में कोई विरोधाभास नहीं है और विपक्ष केवल राजनीति करने के लिए इस मुद्दे को तूल दे रहा है।
इसके साथ ही, तमिलनाडु सरकार के ऊर्जा संसाधन एवं कानून मंत्री सीटीआर निर्मल कुमार ने भी इस विवाद पर सरकार का रुख पूरी तरह स्पष्ट किया है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि सरकार और टीवीके के परिसीमन संबंधी स्टैंड में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि टीवीके अपने पुराने रुख पर पूरी तरह अडिग है और लोकसभा की कुल सीटों की संख्या को 543 पर ही बनाए रखने की मांग में कोई ढिलाई नहीं बरती गई है। इस ताजा राजनीतिक खींचतान ने तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों में परिसीमन और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल को एक बार फिर से मुख्य राजनीतिक मुद्दा बना दिया है।
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