राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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लाल किला ब्लास्ट: एनआईए की विस्तृत चार्जशीट
दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले के पास नवंबर 2025 में हुए विनाशकारी कार बम धमाके ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। अब इस मामले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अपनी विस्तृत चार्जशीट दाखिल कर आतंकी साजिश के काले पन्नों को खोल दिया है। एनआईए की जांच के अनुसार, इस पूरे आतंकी मॉड्यूल का मुख्य चेहरा डॉक्टर उमर उन नबी था, जिसने धमाके के लिए एक कार का इस्तेमाल किया था। इसे तकनीकी भाषा में VBIED यानी वाहन पर आधारित विस्फोटक उपकरण कहा गया है। इस वीभत्स घटना में उमर उन नबी की खुद भी मौत हो गई थी, जिसकी पुष्टि घटनास्थल से मिले मानव अवशेषों और डीएनए जांच के माध्यम से हुई है। एनआईए ने इस मामले में अब तक कुल 13 आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए हैं, जिनमें से पहले 10 आरोपियों के खिलाफ 7,500 पन्नों की मुख्य चार्जशीट और बाद में 3 और लोगों के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट पेश की गई थी।
कार को बनाया मौत का सामान
जांच एजेंसी के लिए इस पूरे केस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू धमाके में इस्तेमाल की गई ह्यूंडै आई20 कार रही। फॉरेंसिक जांच में इस कार के मलबे और आसपास बिखरे सामान में TATP, अमोनियम नाइट्रेट और पोटैशियम नाइट्रेट जैसे घातक विस्फोटक पदार्थों के अवशेष मिले हैं। एनआईए की रिपोर्ट में TATP को 'शैतान की मां' (Mother of Satan) के रूप में संबोधित किया गया है। यह विस्फोटक एसीटोन पेरॉक्साइड के नाम से भी जाना जाता है और अपनी अत्यधिक संवेदनशीलता के लिए कुख्यात है। यह गर्मी, दबाव या घर्षण जैसी मामूली स्थितियों में भी पलक झपकते ही फट सकता है। धमाके वाली जगह से एक लाल टेप से लिपटा हुआ कमांड मैकेनिज्म भी बरामद किया गया, जिस पर विस्फोटक के निशान मौजूद थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि कार में विस्फोटक फिट करके उसे रिमोट या कमांड के जरिए सक्रिय किया गया था।
डिजिटल साक्ष्यों का जखीरा और कोड भाषा
एनआईए ने डिजिटल फोरेंसिक के जरिए आरोपियों के नेटवर्क को बेनकाब किया है। आरोपी शाहीन सईद की पेन ड्राइव से बरामद 87 तस्वीरों ने जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिनमें आरोपी हथियारों के साथ नजर आ रहे हैं। ये आरोपी कथित तौर पर अंसार गजवात-उल-हिंद (AGuH) और अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) जैसी आतंकी विचारधाराओं से प्रभावित थे। आरोपियों के बीच संचार के लिए सिग्नल ऐप का इस्तेमाल किया गया था, जहाँ वे अपनी पहचान छुपाने के लिए कोड नेम का उपयोग करते थे। उदाहरण के तौर पर, एक आरोपी 'A-7' की पहचान सिग्नल पर 'राउलदत्ता' नाम से की गई थी। उनके डिजिटल उपकरणों से कट्टरपंथी साहित्य और जिहादी सामग्री की एक बड़ी खेप बरामद की गई है।
लोन मुजाहिद पॉकेट बुक और ओपन-सोर्स जिहाद
चार्जशीट में 'लोन मुजाहिद पॉकेट बुक' और 'हत्यारा कैसे बनें' जैसी खतरनाक मैनुअल का भी जिक्र है। यह सामग्री अल-कायदा इन द अरबियन पेनिनसुला (AQAP) से संबद्ध 'इंस्पायर मैगजीन' के पहले से दसवें अंक से ली गई है। इन दस्तावेजों में हथियार बनाने, विस्फोटक तैयार करने और छुपकर ऑपरेशन चलाने के निर्देश दिए गए थे। एनआईए का कहना है कि इन सामग्रियों के जरिए मौजूदा शासन को 'शैतानी' बताकर उसे हिंसक तरीके से खत्म करने के लिए उकसाया जा रहा था। इसे 'ओपन-सोर्स जिहाद' का नाम दिया गया था। जांच को पुख्ता करने के लिए एनआईए ने नेशनल फॉरेंसिक स्टेट यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों की मदद से आरोपियों का फॉरेंसिक साइकोलॉजिकल असेसमेंट और वॉयस लेयरिंग टेस्ट भी कराया, जिसमें उनके बयानों में कई विरोधाभास पाए गए।
यूट्यूब और ChatGPT से रॉकेट बनाने की कोशिश
आरोपी जसीर बिलाल वानी (A-3) की भूमिका इस मामले में बेहद गंभीर बताई गई है। वह मुख्य आरोपी उमर उन नबी का दाहिना हाथ माना जाता था। एनआईए का दावा है कि जसीर ने न केवल आईईडी (IED) बनाने में महारत हासिल की थी, बल्कि उसने यूट्यूब और ChatGPT जैसे अत्याधुनिक तकनीकी माध्यमों का इस्तेमाल करके रॉकेट बनाने का प्रयास भी किया था। चार्जशीट के अनुसार, जसीर ने रॉकेट तैयार भी कर लिया था, हालांकि उसकी टेस्टिंग को बाद में टाल दिया गया था। उमर उन नबी ने जसीर को दो ड्रोन भी उपलब्ध कराए थे, जिनका उद्देश्य उड़ान क्षमता और रेंज की जांच करना था। एक ड्रोन के सफल परीक्षण के बाद उसे वापस कर दिया गया, जबकि खराब हुए ड्रोन को नष्ट करने का दावा किया गया है।
अल फलाह कॉलेज में हुई बैठकें और साजिश
जांच में यह तथ्य सामने आया है कि 2024-25 के दौरान जसीर बिलाल वानी की मुलाकात अन्य आरोपियों से अल फलाह कॉलेज कैंपस में कई बार हुई थी। इन मुलाकातों में भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और तकनीकी सहायता जुटाने पर चर्चा की गई थी। यह भी बताया गया कि जसीर को मुख्य साजिशकर्ता से मिलवाने का काम आरोपी नंबर 5 ने किया था। इसके बाद से ही जसीर को विस्फोटक सामग्री की आपूर्ति शुरू कर दी गई थी। रॉकेट और आईईडी की टेस्टिंग के लिए उन्होंने काजीगुंड के जंगलों को चुना था, लेकिन आपसी असहमति के कारण वे अपने इरादों को पूरी तरह अंजाम नहीं दे पाए थे।
नौगाम थाने का विस्फोट और पुराना टेरर मॉड्यूल
एनआईए ने इस मामले को नौगाम थाने में हुए धमाके के साथ भी जोड़ा है। वहां जप्त किए गए विस्फोटक पदार्थों की जांच के दौरान हुए धमाके में कई पुलिसकर्मियों की शहादत हुई थी। उमर उन नबी का उद्देश्य एक पुराने टेरर नेटवर्क को पुनर्जीवित करना था और वह इस मॉड्यूल का ऑपरेशंस प्रभारी था। उसकी मौत के कारण उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही तो बंद हो गई है, लेकिन उसकी बनाई गई पूरी आतंकी संरचना को एनआईए ने अपनी जांच का मुख्य केंद्र बनाया है। 10 नवंबर 2025 को हुए इस हमले में 11 लोगों की जान गई थी और 29 लोग घायल हुए थे। अब कानून की अदालत में यह देखना बाकी है कि एनआईए के जुटाए गए ये फॉरेंसिक और डिजिटल सबूत आरोपियों को सजा दिलाने के लिए कितने कारगर साबित होते हैं।
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