क्राइम
एक घंटा पहले
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डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी का नया खुलासा
दिल्ली पुलिस की आईएफएसओ यूनिट ने साइबर अपराधियों के एक ऐसे तंत्र का भंडाफोड़ किया है जो बेहद शातिर तरीके से काम कर रहा था। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 1.64 करोड़ रुपये की ठगी की जांच के दौरान पुलिस को एक ऐसी कड़ी मिली जिसने स्वास्थ्य शिविरों और ई-सिम के अवैध कारोबार के बीच के कनेक्शन को उजागर कर दिया। इस मामले में पुलिस ने उत्तर प्रदेश के मथुरा से दो लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनका काम करने का तरीका किसी क्राइम थ्रिलर से कम नहीं है।
स्वास्थ्य शिविरों की आड़ में डेटा चोरी
जांच में पता चला कि ये ठग ग्रामीण इलाकों में बड़ी चालाकी से फर्जी हेल्थ कैंप यानी स्वास्थ्य शिविर आयोजित करते थे। इन शिविरों में ग्रामीणों को बहुत ही कम दामों पर दवाइयां उपलब्ध कराने का लालच दिया जाता था। जब लोग सस्ती दवाइयों के लालच में इन कैंपों में आते थे, तो उनसे उनकी पहचान के लिए आधार कार्ड और बायोमेट्रिक विवरण मांगे जाते थे। यही वह बिंदु था जहां से लोगों का डेटा ठगों के पास पहुंच जाता था। पुलिस का मानना है कि इन शिविरों का मुख्य उद्देश्य केवल लोगों को दवा बांटना नहीं, बल्कि उनके आधार कार्ड के जरिए व्यक्तिगत जानकारी हासिल करना था। इस जानकारी का उपयोग बाद में गलत तरीके से सिम कार्ड और ई-सिम सक्रिय करने के लिए किया जाता था।
डिजिटल अरेस्ट का डर और 1.64 करोड़ की ठगी
इस पूरे मामले की शुरुआत एक व्यक्ति की शिकायत से हुई, जिसे ठगों ने कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर अपना शिकार बनाया था। दिल्ली पुलिस के मुताबिक, पीड़ित श्रीनिवास को व्हाट्स एप पर संपर्क किया गया और उन्हें डिजिटल अरेस्ट करने की धमकी देकर मानसिक दबाव में रखा गया। लगभग दो सप्ताह तक उन्हें अलग-अलग तरीके से डराया-धमकाया गया। इस डर के कारण पीड़ित ने छह अलग-अलग बैंक खातों में कुल 1 करोड़ 64 लाख रुपये आरटीजीएस के माध्यम से ट्रांसफर कर दिए। 1 सितंबर 2026 को दिल्ली पुलिस की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस (IFSO) यूनिट ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4) और 340 के तहत ई-एफआईआर दर्ज की और जांच को आगे बढ़ाया।
मथुरा में आधी रात को पुलिस का छापा
जांच के लिए पुलिस ने एक विशेष टीम का गठन किया जिसमें सब-इंस्पेक्टर अमित वर्मा, हेड कांस्टेबल गिरिराज और कांस्टेबल आशीष शामिल थे। तकनीकी पड़ताल के दौरान पुलिस ने मोबाइल उपकरणों और उनसे जुड़े डेटा की कड़ियां जोड़ीं, जिससे जांच की सुई सीधे मथुरा और वृंदावन के इलाकों की ओर घूमी। 20 और 21 अक्टूबर 2026 की दरमियानी रात को पुलिस ने मथुरा के फरह इलाके के कोटा गांव में छापेमारी की। इस दौरान 29 वर्षीय जितेंद्र सिंह और 21 वर्षीय ब्रजेश कुमार को गिरफ्तार किया गया। दोनों आरोपी फतीहा गांव के रहने वाले हैं और पूछताछ के लिए इन्हें दिल्ली लाया गया है।
ई-सिम का काला कारोबार
पुलिस पूछताछ में पता चला है कि आरोपी फिजिकल सिम कार्ड लेने के बाद उसे ई-सिम में बदल देते थे। इसके बाद फेसबुक, टेलीग्राम और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के जरिए ये ई-सिम और उनसे जुड़े क्यूआर कोड दूसरों को बेच दिए जाते थे। इन ई-सिम का इस्तेमाल आगे चलकर डिजिटल अरेस्ट जैसी बड़ी साइबर वारदातों में किया जा रहा था। आर्थिक लेनदेन की बात करें तो ये अपराधी एक सिम को लगभग 800 रुपये से 1,200 रुपये में हासिल करते थे और आगे चलकर इसे 2,000 रुपये तक में बेच देते थे। ये दोनों आरोपी पिछले करीब एक साल से इस अवैध धंधे में शामिल थे।
पुलिस की आगामी कार्रवाई
वर्तमान में, दिल्ली पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन फर्जी हेल्थ कैंपों के माध्यम से अब तक कुल कितने लोगों का डेटा इकट्ठा किया गया और कितने सिम जारी हुए। पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या इस रैकेट में अन्य लोग या कोई बड़ी संगठित टीम भी शामिल है। डिजिटल अरेस्ट की बढ़ती वारदातों के बीच इस मामले ने यह साफ कर दिया है कि आम जनता को अपने आधार कार्ड और बायोमेट्रिक विवरण साझा करने में कितनी सावधानी बरतने की जरूरत है।
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