नाबालिग के लिवर डोनेशन पर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 17 साल के बेटे को पिता को अंग देने की अनुमति दिल्ली 2 महीने पहले 74
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक असाधारण और मानवीय फैसला सुनाते हुए 17 वर्षीय किशोर को अपने पिता को लिवर दान करने की इजाजत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता की जान बचाने के लिए यह कदम उठाया गया है, हालांकि सामान्य नियमों के तहत नाबालिग अंग दान नहीं कर सकते।

दिल्ली हाईकोर्ट का मानवीय आधार पर ऐतिहासिक फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील मामले में अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़के को अपने पिता के जीवन की रक्षा के लिए अपना लिवर दान करने की अनुमति प्रदान कर दी है। कोर्ट ने वसंत कुंज स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज यानी ILBS अस्पताल को इस ट्रांसप्लांट प्रक्रिया को अंजाम देने का निर्देश दिया है। अदालत ने अस्पताल से कहा है कि वह सभी नैतिक, चिकित्सकीय और कानूनी मानकों का कड़ाई से पालन करे ताकि इस प्रक्रिया में नाबालिग डोनर की सुरक्षा से कोई समझौता न हो।

पिता की जान बचाने के लिए कानूनी प्रक्रिया

यह मामला उत्तम कुमार शॉ के स्वास्थ्य से जुड़ा है, जो गंभीर रूप से बीमार हैं। उनके बेटे की ओर से उसकी मां और प्राकृतिक अभिभावक ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका के जरिए मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 और वर्ष 2014 के संशोधनों के तहत लिवर ट्रांसप्लांट के लिए कोर्ट से हरी झंडी मांगी गई थी। सुनवाई के दौरान जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने विस्तार से मामले पर विचार किया।

कानून और अपवाद की स्थिति

अदालत ने स्वीकार किया कि सामान्य परिस्थितियों में कानून नाबालिगों को जीवित अंग दान करने की अनुमति नहीं देता है। हालांकि, वर्ष 2014 के नियमों के Rule 5(3)(g) में यह प्रावधान है कि अत्यंत असाधारण चिकित्सा स्थितियों में राज्य सरकार और उचित प्राधिकरण की सहमति के बाद ऐसा किया जा सकता है। दिल्ली सरकार ने इस दिशा में सकारात्मक रुख अपनाते हुए 29 जून 2026 को एक पत्र अदालत में प्रस्तुत किया, जिसमें सूचित किया गया कि दिल्ली के उपराज्यपाल और सक्षम प्राधिकरण ने इस विशेष मामले में लिवर दान की स्वीकृति दे दी है।

गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं पिता

मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, उत्तम कुमार शॉ क्रॉनिक लिवर डिजीज, लिवर सिरोसिस, पोर्टल हाइपरटेंशन, हल्के एसाइटिस और हेपेटोसेल्युलर कार्सिनोमा जैसी जानलेवा बीमारियों से पीड़ित हैं। अदालत ने इस बात को गंभीरता से नोट किया कि वर्तमान में लिवर प्रत्यारोपण ही एकमात्र ऐसा विकल्प है, जिससे उनकी जान बचाई जा सकती है। परिवार के अन्य करीबी रिश्तेदारों की भी मेडिकल जांच की गई थी, लेकिन दुर्भाग्य से कोई भी डोनर के रूप में उपयुक्त नहीं पाया गया। केवल 17 वर्षीय बेटा ही चिकित्सकीय रूप से लिवर दान करने के लिए पूरी तरह योग्य पाया गया।

बेटे के साहस और प्रेम की जीत

कोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि 17 साल और 6 महीने की उम्र का यह किशोर शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि उसने अपनी स्वेच्छा से, बिना किसी दबाव या आर्थिक प्रलोभन के, अपने पिता के प्रति प्रेम और कर्तव्य के चलते लिवर देने का निर्णय लिया है। अदालत ने माना कि यदि इस समय अनुमति नहीं दी गई, तो पिता की मृत्यु हो सकती है। अंत में, अनुच्छेद 226 के तहत मिले अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कोर्ट ने किशोर को लिवर दान करने की अनुमति दे दी, ताकि एक पिता को नया जीवन मिल सके।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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