देहरादून की सड़कों से क्यों ओझल हुआ पहाड़ों का 'लाल सोना' काफल, लोगों ने कहा- यह तो हमारी आत्मा था उत्तराखंड 11 घंटे पहले 3
गर्मियों में देहरादून की सड़कों पर टोकरियों में सजने वाला चटख लाल काफल इस बार ढूंढने पर भी नहीं मिल रहा। स्थानीय लोग इसे उत्तराखंड की पहचान और बचपन की यादों से जोड़ते हैं।

चटख लाल रंग, रसीला स्वाद और खट्टे-मीठे जायके से भरा काफल महज एक जंगली फल नहीं है। यह उत्तराखंड की संस्कृति, यहां के लोगों की यादों और पहाड़ों में बीते बचपन का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। मगर इस बार देहरादून की तपती सड़कों पर इस फल को लेकर गहरा सन्नाटा पसरा हुआ है।

सड़कों से गायब हुई लाल काफल की रौनक

कभी देहरादून की सड़कों पर जगह-जगह बिकने वाला काफल इस बार दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा। हर साल गर्मियों के मौसम में जो सड़कें टोकरियों में सजे लाल-लाल काफल से गुलजार रहा करती थीं, इस मर्तबा वहां यह 'लाल सोना' ढूंढने पर भी नहीं मिल रहा है।

उत्तराखंड की पहचान से जुड़ा फल

देहरादून के नित्यानंद भट्ट का कहना है कि हर राज्य की अपनी एक अलग पहचान होती है। उन्होंने बताया कि पहाड़ के फल लंबे अरसे से उत्तराखंड की पहचान का हिस्सा रहे हैं। स्थानीय लोगों के लिए काफल केवल एक फल नहीं, बल्कि उनकी भावनाओं और जड़ों से जुड़ी विरासत है, जिसे वे अपनी आत्मा तक बताते हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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