मुहर्रम में अनोखी मिसाल: दतिया में ताजिए देते हैं श्रीकृष्ण मंदिर को सलामी, 200 साल पुरानी है परंपरा
मध्य प्रदेश
एक महीने पहले
52
विचारों
सांप्रदायिक सौहार्द की अद्भुत कहानी
मध्य प्रदेश के दतिया जिले के भांडेर कस्बे में मुहर्रम का पर्व आपसी भाईचारे और गंगा-जमुनी तहजीब की एक ऐसी तस्वीर पेश करता है, जो पूरे देश के लिए मिसाल है। यहां मुहर्रम के जुलूस में शामिल होने वाले ताजिए कर्बला की ओर प्रस्थान करने से पहले एक विशेष पड़ाव पर रुकते हैं। यह स्थान है चतुर्भुज श्रीकृष्ण मंदिर, जहां ताजिए भगवान श्रीकृष्ण को प्रतीकात्मक सलामी देते हैं। यह परंपरा किसी एक दिन की नहीं, बल्कि करीब 200 साल से भी अधिक पुरानी है जो आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
मुस्लिम परिवार का मंदिर से गहरा नाता
इस अनूठी परंपरा के पीछे की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, जिस चतुर्भुज श्रीकृष्ण मंदिर के सामने ताजिए नमन करते हैं, उसका निर्माण एक मुस्लिम परिवार ने ही करवाया था। लोककथाओं के मुताबिक, काफी समय पहले कस्बे के सोंतलाई तालाब से भगवान चतुर्भुज की प्रतिमा प्राप्त हुई थी। उस समय उस मुस्लिम परिवार ने न केवल इस प्रतिमा को ससम्मान निकलवाया, बल्कि मंदिर का निर्माण भी कराया। इतना ही नहीं, परिवार ने मंदिर के रखरखाव और संचालन के लिए अपनी जमीन भी दान में दे दी थी, जो आज भी एकता की एक मिसाल बनी हुई है।
परंपरा और सम्मान का सिलसिला
मंदिर के पुजारी रमाशंकर पांडा का कहना है कि उनके परिवार की कई पीढ़ियां इस मंदिर की सेवा कर रही हैं। वे बताते हैं कि ताजियों का मंदिर के सामने रुकना और उन्हें सलामी देना पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही एक अखंड परंपरा है। मंदिर प्रशासन भी इस परंपरा का पूरा सम्मान करता है और हर साल जुलूस का स्वागत किया जाता है। भांडेर कर्बला समिति के अध्यक्ष जब्बार खान के अनुसार, इस वर्ष के मुहर्रम जुलूस में कुल 37 ताजिए शामिल हुए, जिनमें से 5 ताजिए काफी बड़े और भव्य थे। इन सभी ताजियों ने पहले मंदिर पहुंचकर अपनी हाजिरी लगाई और भगवान के प्रति सम्मान व्यक्त किया।
क्या है इसके पीछे की मान्यता
भांडेर के बुजुर्गों की मानें तो पहले एक विशेष मान्यता थी कि मंदिर से भगवान की प्रतिमा को बाहर तभी निकाला जाता था जब हजारी परिवार का कोई सदस्य वहां उपस्थित रहता था। हालांकि, आजादी के दौर में परिवार की एक बुजुर्ग महिला ने जुलूस को अपना आशीर्वाद दिया था। उस घटना के बाद से परंपरा में बदलाव आया और अब प्रतिमा को किसी पारिवारिक सदस्य की उपस्थिति के बिना भी शोभायात्रा में शामिल कर लिया जाता है। आज भांडेर की यह धरती इस बात का प्रमाण है कि मजहब से ऊपर उठकर इंसानियत और आपसी सम्मान ही समाज को जोड़े रखने का सबसे बड़ा आधार है।
Comments
0 comment