नक्सलवाद का अंधेरा छंटा, बस्तर के गांवों में 46 साल बाद फहराएगा तिरंगा छत्तीसगढ़ एक घंटा पहले 2
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के अति नक्सल प्रभावित गांवों में अब खौफ की जगह तिरंगे की शान ने ले ली है, जहां करीब पांच दशक तक काला झंडा लहराया करता था, वहां अब बच्चे देशभक्ति के नारों के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

दंतेवाड़ा में बदलाव की नई सुबह

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के अंतर्गत आने वाले लावा, बड़ेपल्ली और बैंनपाल जैसे सुदूर और दुर्गम गांवों में अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। कभी इन क्षेत्रों में नक्सली खौफ का इतना साया था कि राष्ट्रीय पर्व मनाना भी एक बड़ी चुनौती हुआ करता था। लेकिन अब ये गांव न केवल नक्सलवाद के प्रभाव से मुक्त हो रहे हैं, बल्कि आजादी के जश्न के लिए भी तैयार हैं। करीब 46 साल के लंबे इंतजार के बाद अब इन इलाकों में पहली बार तिरंगा फहराने की ऐतिहासिक तैयारी चल रही है, जिसे स्थानीय स्तर पर एक बड़े सकारात्मक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।

पांच दशक का काला इतिहास

इन गांवों का अतीत बेहद कठिन रहा है। बीते करीब 50 वर्षों तक इन इलाकों में नक्सलियों का वर्चस्व बना रहा, जिसकी वजह से यहां की फिजाओं में डर का माहौल था। 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय दिवसों पर यहां सामान्य तौर पर कार्यक्रम आयोजित करने की कल्पना करना भी मुश्किल था। कई बार तो ऐसी स्थितियां बनीं कि नक्सलियों ने स्वतंत्रता दिवस का विरोध करने के लिए गांवों में काला झंडा फहरा दिया। ग्रामीणों और मासूम बच्चों के लिए भी हाथों में तिरंगा लेना एक खतरे से खाली नहीं था। हालांकि, 31 मार्च 2026 के बाद से इन गांवों की स्थिति में तेजी से सुधार आया है और खौफ की जगह अब उम्मीदों ने ले ली है।

स्कूलों की वापसी और तिरंगा यात्रा

अब इन गांवों में शिक्षा की नई किरण दिखाई दे रही है। लंबे समय से बंद पड़े स्कूल फिर से शुरू हो गए हैं, जिससे बच्चों में उत्साह का संचार हुआ है। हाल ही में इन गांवों के बच्चों ने हाथों में तिरंगा लेकर तिरंगा यात्रा निकाली और 'भारत माता की जय' तथा 'वंदे मातरम' के नारे बुलंद किए। शुरुआती दौर में कुछ बच्चे तिरंगा थामने में झिझक रहे थे, लेकिन शिक्षकों के साहस और मार्गदर्शन के बाद अब उनमें डर नहीं है।

दुर्गम रास्तों से गुजरकर शिक्षा का उजाला

इन गांवों में शिक्षा पहुंचाना शिक्षकों के लिए भी एक साहसी काम है। कुआकोंडा ब्लॉक के बीईओ प्रमोद भदौरिया के अनुसार, ये इलाके भौगोलिक रूप से बेहद दुर्गम हैं। शिक्षकों को स्कूल तक पहुंचने के लिए कठिन नदी और नालों को पार करना पड़ता है। फिलहाल इन गांवों में स्कूल की पक्की इमारतें नहीं बनी हैं, जिसके निर्माण की प्रक्रिया चल रही है। तब तक शिक्षक ग्रामीणों के घरों में ठहरकर बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। तिरंगे के साथ इन शिक्षकों की मौजूदगी से ग्रामीणों को सामान्य जीवन की वापसी का भरोसा मिल रहा है।

स्वतंत्रता दिवस की पुख्ता तैयारी

स्वतंत्रता दिवस को धूमधाम से मनाने के लिए प्रशासन ने पूरी कमर कस ली है। शिक्षक 14 अगस्त को ही इन गांवों में पहुंच जाएंगे और वहीं रात बिताएंगे ताकि 15 अगस्त को समय पर ध्वजारोहण कार्यक्रम संपन्न हो सके। लावा, बड़ेपल्ली और बैंनपाल के निवासियों के लिए यह तिरंगा यात्रा केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि यह आजादी के वास्तविक अहसास और विकास की मुख्यधारा से जुड़ने का एक जीवंत प्रतीक है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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