कॉफी पर कुरुक्षेत्र: नेहरू का रिकॉर्ड पीछे छूटा, चर्चा में मोदी की सियासी विरासत भारत एक घंटा पहले 1
एक परिचर्चा में जानकारों ने प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक सफर, बढ़ते जनाधार और एनडीए के विस्तार पर बात की। चर्चा में बंगाल से लेकर वैश्विक मंच तक मोदी की भूमिका को रेखांकित किया गया।

एक परिचर्चा कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर, उनके लगातार मजबूत होते जनाधार और भारतीय जनता पार्टी के विस्तार को लेकर विस्तार से बातचीत हुई। इस दौरान जानकारों ने आंकड़ों और उदाहरणों के सहारे यह समझाने की कोशिश की कि बीते वर्षों में देश की सियासत किस तरह बदली है।

बंगाल को बताया मोदी की विरासत का अहम पन्ना

परिचर्चा में पश्चिम बंगाल की राजनीति का खास तौर पर जिक्र आया। वक्ताओं का मानना था कि भाजपा ने राज्य में अपना आधार प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे के दम पर बढ़ाया, और आज तृणमूल कांग्रेस के भीतर जो हलचल नजर आ रही है, उसे भी इसी राजनीतिक बदलाव की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। कुछ विश्लेषकों ने तो यहां तक कहा कि इस समय मोदी की राजनीतिक विरासत में बंगाल को सबसे ऊपरी पायदान पर रखा जा सकता है।

2014 के बाद फैला एनडीए का दायरा

चर्चा में आंकड़ों के जरिए बताया गया कि 2014 के बाद से भाजपा और एनडीए का सियासी विस्तार लगातार जारी रहा है। कहा गया कि 2014 में एनडीए शासित राज्यों में देश की करीब 28 प्रतिशत आबादी रहती थी, जबकि अब यह आंकड़ा 70 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसी तरह भाजपा के विधायकों की संख्या में भी बड़ी बढ़ोतरी का दावा किया गया।

'सुपर सीएम फेस' की भूमिका में मोदी

राज्यों के चुनावों में मोदी की भूमिका पर बात करते हुए वक्ताओं ने कहा कि 2014 के बाद भाजपा कई ऐसे राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब रही, जहां पहले पार्टी तीसरे या चौथे स्थान पर रहती थी। हरियाणा, महाराष्ट्र, असम और ओडिशा जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा गया कि इन चुनावों में मोदी एक तरह से "सुपर सीएम फेस" के रूप में सामने आए।

चुनावों में कितना असरदार है 'मोदी फैक्टर'?

कार्यक्रम में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले वोटों का एक बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी के नाम से जुड़ा था। विश्लेषकों का दावा था कि पार्टी को मिले कुल वोटों में करीब 25 प्रतिशत वोट ऐसे रहे, जो व्यक्तिगत रूप से मोदी के प्रभाव की वजह से भाजपा को मिले। इसी आधार पर उन्हें चुनावों का सबसे बड़ा "डिफरेंशिएटिंग फैक्टर" करार दिया गया।

लोकप्रियता बनाए रखने की क्षमता

विशेषज्ञों का कहना था कि बीते 12 वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में उतार-चढ़ाव जरूर आए, लेकिन चुनावों के मौके पर उनका जनाधार हर बार मजबूत दिखाई दिया। इसे लोगों से सीधे जुड़ने की उनकी क्षमता, मजबूत फीडबैक तंत्र और समय-समय पर खुद को नए अंदाज में पेश करने की रणनीति का नतीजा बताया गया।

योजनाओं और विकास कार्यों का जिक्र

परिचर्चा के दौरान जनधन खाते, स्वास्थ्य बीमा, उज्ज्वला योजना, मुफ्त राशन, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, सड़क और हवाई अड्डा नेटवर्क के विस्तार, बिजली उत्पादन क्षमता तथा रक्षा निर्यात जैसे विषयों पर भी बात हुई। वक्ताओं ने इन्हें मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धियों के रूप में पेश किया।

वैश्विक मंच पर मजबूत हुई भारत की पहचान

कार्यक्रम में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन के बधाई संदेश का भी उल्लेख किया गया। वक्ताओं ने कहा कि मोदी के नेतृत्व में भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि और पहचान मजबूत हुई है तथा दुनिया के कई देशों के नेताओं ने इस उपलब्धि पर उन्हें शुभकामनाएं दी हैं।

सहयोगी दलों ने भी जताया भरोसा

एनडीए के सहयोगी दलों के नेताओं ने भी प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की सराहना की। वक्ताओं का कहना था कि गठबंधन सरकार होने के बावजूद नेतृत्व शैली और फैसले लेने की क्षमता में कोई फर्क नजर नहीं आया। सहयोगियों के साथ बेहतर तालमेल को भी मोदी की राजनीतिक कुशलता का हिस्सा बताया गया।

आगे भी बन सकते हैं नए कीर्तिमान

चर्चा के अंत में विशेषज्ञों ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नाम पहले ही कई राजनीतिक रिकॉर्ड दर्ज हो चुके हैं और आने वाले वर्षों में उनकी सरकार कुछ और बड़े फैसले लेकर नए कीर्तिमान स्थापित कर सकती है। साथ ही यह भी माना गया कि भारतीय राजनीति में आगे चलकर मोदी समर्थक और मोदी विरोधी सियासत के बीच मुकाबला और स्पष्ट रूप से उभर सकता है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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