राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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लंबे समय से इस बात पर अटकलें लगाई जा रही थीं कि आखिर कितने सांसद ममता बनर्जी का दामन छोड़ने जा रहे हैं। कोई यह आंकड़ा 10 बता रहा था तो कोई 20 तक पहुंचा रहा था। अब इस अनिश्चितता पर विराम लगाते हुए 19 सांसदों की सूची सामने आ गई है। इसमें काकोली घोष दस्तीदार, यूसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा समेत कई ऐसे नाम हैं जो चौंकाने वाले हैं। गौर करने लायक बात यह है कि जिन नामों को लेकर अब तक कयास लग रहे थे, उनमें सायोनी घोष जैसे चेहरे भी इस फेहरिस्त का हिस्सा बन गए हैं।
एक नजर में बागी सांसदों की पूरी सूची
1. यूसुफ पठान (बहरामपुर)
क्रिकेट के मैदान से सियासत में आए यूसुफ पठान ने कांग्रेस के मजबूत किले बहरामपुर में अधीर रंजन चौधरी को शिकस्त देकर बड़ा उलटफेर किया था। लेकिन राजनीति के मैदान में दीदी के स्थानीय नेताओं से उन्हें वैसा सहयोग नहीं मिल पाया जिसकी उन्हें उम्मीद थी। बहरामपुर के स्थानीय संगठन से उनकी दूरी अब साफ दिखने लगी है।
2. जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया (कूचबिहार)
कूचबिहार की सीट हमेशा से उत्तर बंगाल की सियासत का केंद्रबिंदु रही है। यहां जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया टीएमसी के मजबूत राजबंशी चेहरे के रूप में देखे जाते हैं। हालांकि बीते दिनों के राजनीतिक घटनाक्रम और स्थानीय गुटबाजी के चलते उनके तेवर बदले हुए नजर आ रहे हैं। इलाके में पकड़ होने के बावजूद संगठन से उनकी अनबन की खबरें हैं।
3. खलीलुर रहमान (जंगीपुर)
मुर्शिदाबाद जिले की जंगीपुर सीट से आने वाले खलीलुर रहमान बीड़ी कारोबार से निकलकर राजनेता बने हैं। मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र में उनका खासा असर है। बावजूद इसके, केंद्रीय एजेंसियों की जांच के घेरे में आने और स्थानीय नेतृत्व के साथ तालमेल की कमी के कारण उनके पार्टी से दूर होने की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं।
4. अबू ताहेर खान (मुर्शिदाबाद)
मुर्शिदाबाद के दमदार नेता अबू ताहेर खान का इस सूची में होना हैरान करता है। कांग्रेस छोड़कर टीएमसी में आए अबू ताहेर का अपने क्षेत्र में मजबूत जनाधार है। पिछले कुछ समय से जिला स्तर पर हो रही अनदेखी और नए नेताओं को आगे बढ़ाए जाने से वह काफी खफा बताए जा रहे हैं।
5. पार्थ भौमिक (बैरकपुर)
बैरकपुर जैसी हाई-प्रोफाइल और हिंसा से प्रभावित सीट से चुनाव जीतने वाले पार्थ भौमिक कभी ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते थे। मगर अर्जुन सिंह के साथ चलने वाली खींचतान और पार्टी के अंदर बदलते गुटीय समीकरणों ने उनका मोहभंग कर दिया, जिससे बगावत के सुर मुखर हो गए हैं।
6. काकोली घोष दस्तीदार (बारासात)
डॉ. काकोली घोष दस्तीदार टीएमसी की बेहद वरिष्ठ और तेजतर्रार नेता मानी जाती हैं। संसद में अपनी बात मजबूती से रखने वाली काकोली के बारे में कहा जा रहा है कि वह पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी के बढ़ते कद और युवा ब्रिगेड के फैसलों से असहज हैं, जिससे दूरी बढ़ती चली गई।
7. बापी हलदार (मथुरापुर)
मथुरापुर (एससी) सीट से जीतकर आए बापी हलदार जमीनी पकड़ वाले नेता हैं। दक्षिण 24 परगना के सुंदरबन इलाके में उनका अच्छा प्रभाव है। स्थानीय पंचायत चुनावों और विकास कार्यों के फंड को लेकर जिला नेतृत्व के साथ उनकी ठनी, जो अब बगावत के मोड़ पर पहुंच गई है।
8. सायोनी घोष (जादवपुर)
टीएमसी की युवा इकाई की अध्यक्ष रहीं सायोनी घोष हमेशा से ममता बनर्जी की पसंदीदा रही हैं। जादवपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट से जीतकर संसद पहुंचने वाली सायोनी की बगावत की खबरें हैरान करने वाली हैं। बताया जा रहा है कि संगठन में हुए फेरबदल और कुछ आंतरिक फैसलों से वह नाखुश हैं।
9. माला रॉय (कोलकाता दक्षिण)
कोलकाता दक्षिण सीट खुद ममता बनर्जी का पुराना गढ़ रही है, जहां से माला रॉय सांसद हैं। उनका नाम इस सूची में आना टीएमसी के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। कोलकाता नगर निगम और सांसद निधि के इस्तेमाल को लेकर पार्टी आलाकमान से उनके मतभेद गहरे हो चुके हैं।
10. मिताली बाग (आरामबाग)
आरामबाग की बेहद नजदीकी मुकाबले वाली सीट से जीत हासिल करने वाली मिताली बाग साधारण पृष्ठभूमि से आती हैं। लेकिन सांसद बनने के बाद स्थानीय स्तर पर पार्टी के पुराने दिग्गजों ने उन्हें काम नहीं करने दिया। इसी अंदरूनी कलह और उपेक्षा के चलते मिताली ने अलग राह चुनने का मन बना लिया है।
11. देव अधिकारी (घाटाल)
बांग्ला सिनेमा के सुपरस्टार दीपक अधिकारी उर्फ देव के बागी तेवर कोई नई बात नहीं हैं। वह पहले भी राजनीति से किनारा करने की इच्छा जता चुके हैं। ममता के समझाने पर वह मान तो गए थे, लेकिन घाटाल के स्थानीय टीएमसी नेताओं के भ्रष्टाचार और दखलअंदाजी से तंग आकर अब वह आर-पार के मूड में हैं।
12. कालीपद सोरेन (झाड़ग्राम)
आदिवासी बहुल झाड़ग्राम सीट से सांसद कालीपद सोरेन संथाली साहित्यकार और सम्मानित चेहरा हैं। टीएमसी ने उन्हें आदिवासी कार्ड के रूप में मैदान में उतारा था। लेकिन क्षेत्र में आदिवासियों की बुनियादी समस्याओं पर पार्टी के ढुलमुल रवैये और वादों से पीछे हटने के कारण उन्होंने बगावती रुख अपना लिया है।
13. जून मालिया (मेदिनीपुर)
मेदिनीपुर से सांसद और मशहूर अभिनेत्री जून मालिया को टीएमसी का ग्लैमरस लेकिन गंभीर चेहरा माना जाता है। विधानसभा से लोकसभा तक का सफर तय करने वाली जून मालिया के बारे में खबर है कि वह जिला टीएमसी कमेटी के लगातार बढ़ते दखल और दबाव से बेहद परेशान हैं।
14. अरूप चक्रवर्ती (बांकुड़ा)
बांकुड़ा से सांसद अरूप चक्रवर्ती अपने बेबाक और कई बार विवादित बयानों के लिए जाने जाते हैं। बीजेपी के मजबूत गढ़ बांकुड़ा में सेंध लगाने वाले अरूप इन दिनों पार्टी के बड़े नेताओं के रवैये से नाराज हैं। उनका मानना है कि जीत दर्ज करने के बाद भी उन्हें उतना मान-सम्मान नहीं मिला।
15. शर्मिला सरकार (बर्धमान पूर्व)
पेशे से चिकित्सक शर्मिला सरकार को टीएमसी ने बर्धमान पूर्व की सुरक्षित सीट से उतारा था। राजनीति में नई शर्मिला को उम्मीद थी कि उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिलेगा, लेकिन पार्टी के स्थानीय 'सिंडिकेट' और नेताओं के दबाव के कारण वह खुद को घुटन में महसूस कर रही थीं।
16. शत्रुघ्न सिन्हा (आसनसोल)
'बिहारी बाबू' शत्रुघ्न सिन्हा ने आसनसोल उपचुनाव और फिर आम चुनाव में टीएमसी को बड़ी जीत दिलाई थी। लेकिन हमेशा अपनी शर्तों पर सियासत करने वाले शॉटगन को पार्टी का सख्त अनुशासन और सिर्फ बंगाल तक सीमित राजनीति रास नहीं आ रही। राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका न देख पाने के कारण उनके तेवर तल्ख बने हुए हैं।
17. असित कुमार माल (बोलपुर)
बीरभूम जिले की बोलपुर सीट से सांसद असित कुमार माल अनुब्रत मंडल के दौर से ही पार्टी का वफादार चेहरा रहे हैं। लेकिन अनुब्रत मंडल के जेल जाने और लौटने के बाद बदले समीकरणों में असित कुमार खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं, जिससे उनकी नाराजगी बगावत में तब्दील हो गई।
18. शताब्दी रॉय (बीरभूम)
अभिनेत्री से नेता बनीं शताब्दी रॉय बीरभूम से लगातार जीतती आ रही हैं। बीरभूम टीएमसी के भीतर चल रही अंदरूनी रस्साकशी और गुटबाजी से वह हमेशा परेशान रही हैं। इस बार उनका सब्र जवाब दे गया है और वह पार्टी नेतृत्व को अपनी ताकत दिखाने के मूड में नजर आ रही हैं।
19. रचना बनर्जी (हुगली)
'दीदी नंबर 1' रियलिटी शो की मशहूर होस्ट रचना बनर्जी ने हुगली में बीजेपी की लॉकेट चटर्जी को हराकर सनसनी फैला दी थी। हालांकि सियासत की इस उठापटक और पार्टी के भीतर टिकट से लेकर मलाईदार पदों के लिए होने वाली खींचतान से रचना जल्द ही ऊब गईं और उनके बागी सुर गूंजने लगे हैं।
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