क्या प्रधानमंत्री मोदी का अगला बड़ा कदम 'वन नेशन-वन इलेक्शन' होगा? कॉफी पर कुरुक्षेत्र में मंथन भारत 4 घंटे पहले 2
देश में वन नेशन-वन इलेक्शन की चर्चा तेज हो गई है। कॉफी पर कुरुक्षेत्र कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की संभावनाओं और सरकार की आगामी रणनीति पर विस्तार से चर्चा की है।

2029 में वन नेशन-वन इलेक्शन की संभावना

कॉफी पर कुरुक्षेत्र कार्यक्रम में देश की राजनीति के सबसे चर्चित विषय 'वन नेशन-वन इलेक्शन' पर गहरा मंथन किया गया। वर्तमान प्रस्ताव के तहत देश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ आयोजित करने के लिए वर्ष 2034 का लक्ष्य तय किया गया है। हालांकि, चर्चा के दौरान इस बात की प्रबल संभावना जताई गई कि कुछ राज्य अपने विधानसभा कार्यकाल को या तो छोटा करके या फिर थोड़ा बढ़ाकर 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ तालमेल बिठा सकते हैं। जानकारों का मानना है कि लगभग 10 से 14 राज्यों के विधानसभा चुनावों को 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ जोड़ने की गुंजाइश बन सकती है। हालांकि, इसके सफल क्रियान्वयन के लिए राज्यों के बीच राजनीतिक सहमति और मौजूदा परिस्थितियां सबसे अहम भूमिका निभाएंगी।

विशेषज्ञों के पैनल ने इस बात पर भी बहस की कि क्या भारतीय जनता पार्टी या एनडीए शासित राज्य अपने मौजूदा कार्यकाल को कम करने के लिए तैयार होंगे। इसके पीछे पूरी तरह से चुनावी गणित काम करेगा। यदि राजनीतिक परिस्थितियों को अनुकूल पाया जाता है, तो दोनों स्तरों पर एक साथ चुनाव कराकर लाभ लेने की रणनीति अपनाई जा सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदाताओं के मतदान करने के तरीके और प्राथमिकताओं में अंतर होता है, जिससे इस रणनीति की सफलता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

परिसीमन और महिला आरक्षण पर विशेष फोकस

कार्यक्रम में परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी चर्चा की गई। विशेषज्ञों का दावा है कि परिसीमन का मुद्दा सरकार की प्राथमिकता सूची में शीर्ष पर हो सकता है। यदि सरकार आवश्यक समर्थन जुटा लेती है, तो संसद का विशेष सत्र बुलाकर इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जा सकता है। चर्चा में यह भी कहा गया कि केंद्र सरकार के पास वर्तमान में लोकसभा में 366 सांसदों का मजबूत समर्थन उपलब्ध है।

साथ ही, कांग्रेस नेता जयराम रमेश द्वारा संसद के सत्रावसान में देरी को लेकर जाहिर की गई चिंता पर भी बात हुई। उनके दावों को परिसीमन और महिला आरक्षण से संबंधित विधेयकों की तैयारी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि केवल सत्रावसान न होना किसी नए विधेयक के आने का ठोस प्रमाण नहीं है। इसके अलावा, डीएमके के साथ रणनीतिक सहयोग और एनसीपी के दो धड़ों के बीच संभावित एकीकरण में नेतृत्व को लेकर आ रही चुनौतियों पर भी विस्तृत चर्चा की गई।

मंत्रिमंडल विस्तार का मिल सकता है बड़ा सरप्राइज

कार्यक्रम के अंत में केंद्रीय मंत्रिमंडल के आगामी विस्तार को एक बड़े सरप्राइज के रूप में देखा गया। विशेषज्ञों के अनुसार मंत्रिमंडल का विस्तार होना लगभग तय है, हालांकि इसमें किसे जगह मिलेगी और यह बदलाव कब तक होगा, इसे लेकर अभी भी गोपनीयता बरती जा रही है। संगठन स्तर पर पहले से ही विभिन्न राज्यों से संभावित उम्मीदवारों के नाम मांगे जाने और उन पर विचार होने की जानकारी भी चर्चा का हिस्सा रही।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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