बसपा में आकाश आनंद की वापसी और मायावती की सियासत: क्या पार्टी फिर खड़ी कर पाएगी अपना वजूद? भारत एक घंटा पहले 5
बहुजन समाज पार्टी में आकाश आनंद के निष्कासन और फिर वापसी के बाद पार्टी के भविष्य को लेकर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। इंडिया टीवी के कार्यक्रम 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' में बसपा की बदलती रणनीति और गिरते जनाधार पर विस्तार से चर्चा की गई है।

बसपा की कलह और चुनावी गणित पर सियासी नजरिया

बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा के भीतर चल रही उठापटक और आकाश आनंद को लेकर लिए गए फैसलों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। चर्चा के दौरान विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में मायावती और उनकी पार्टी का प्रभाव आज भी कायम है। यदि बसपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मजबूती के साथ चुनावी मैदान में उतरती है, तो इसका सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी को उठाना पड़ सकता है। वहीं, यदि पूर्वी उत्तर प्रदेश में बसपा का जनाधार बढ़ता है, तो यह भारतीय जनता पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। यही कारण है कि बसपा की सक्रियता राज्य के अलग-अलग हिस्सों में चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

गठबंधन का लंबा इतिहास और बदलते समीकरण

बसपा की स्थापना के पीछे कांशीराम का एक स्पष्ट मिशन था। उन्होंने डीएस4 और विभिन्न जमीनी संगठनों के माध्यम से अपना कैडर तैयार किया और गांव-गांव जाकर इस विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाया। साल 1993 में बसपा ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव पूर्व गठबंधन किया था। उस समय दलित और पिछड़ा वर्ग मिलकर एक शक्तिशाली राजनीतिक समीकरण बनाने में सफल रहे थे, हालांकि वे पूर्ण बहुमत प्राप्त करने से चूक गए। इसके बाद बसपा ने कांग्रेस के साथ भी हाथ मिलाया। कालांतर में हुए चर्चित गेस्ट हाउस कांड ने समाजवादी पार्टी और बसपा के रिश्तों में हमेशा के लिए एक गहरी खाई पैदा कर दी। हालांकि, साल 2019 में दोनों दलों ने फिर एक बार गठबंधन किया, लेकिन तब तक राजनीतिक परिवेश पूरी तरह से बदल चुका था और पुराने समीकरणों का असर फीका पड़ चुका था।

मायावती का नेतृत्व और गिरता वोट बैंक

मायावती की कार्यशैली को लेकर अक्सर यह सवाल उठते रहे हैं कि उनके साथ लंबे समय तक पार्टी में बड़े नेता क्यों नहीं टिक पाते हैं। कांशीराम के दौर से लेकर बाद के कई प्रमुख सहयोगी धीरे-धीरे पार्टी से दूर होते गए, जिसके चलते पार्टी में कोऑर्डिनेटर व्यवस्था प्रभावी हो गई और फैसलों का केंद्रीकरण बढ़ गया। यदि पिछले कुछ चुनावों के आंकड़ों पर गौर करें, तो बसपा का वोट प्रतिशत तेजी से गिरा है। साल 2019 में पार्टी को करीब 20 प्रतिशत वोट मिले थे, जो 2022 में घटकर लगभग 13 प्रतिशत पर आ गए और 2024 के चुनावों में यह आंकड़ा गिरकर करीब साढ़े पांच प्रतिशत रह गया। वर्तमान में पार्टी के पास मुख्य रूप से जाटव वोट बैंक का आधार ही बचा है, जबकि गैर-जाटव दलितों का बड़ा हिस्सा दूसरे राजनीतिक दलों की ओर रुख कर चुका है।

आकाश आनंद और पार्टी की भावी राह

आकाश आनंद की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में अटकलें हैं। क्या वह कांशीराम की शुरुआती दौर की आक्रामक राजनीति की ओर लौटना चाहते हैं? दूसरी ओर, मायावती का मानना है कि सत्ता हासिल करने के लिए 'सर्वसमाज' को साथ लेकर चलना ही सबसे प्रभावी रणनीति है, जैसा कि 2007 में पार्टी ने बहुमत की सरकार बनाते समय किया था। इन चुनौतियों के बावजूद, बसपा की संभावनाएं पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई हैं। उत्तर प्रदेश के अलावा राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तराखंड, हरियाणा और दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में पार्टी का वोट बैंक अभी भी मौजूद है। बसपा आगामी चुनावों में कुछ क्षेत्रों में त्रिकोणीय मुकाबला खड़ा करने की स्थिति में जरूर है, बशर्ते पार्टी अपने उम्मीदवारों के चयन और चुनावी रणनीति में ठोस सुधार करे।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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