झारखंड
4 दिन पहले
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खरीफ सीजन की दस्तक के साथ ही किसान अपने खेतों को बुवाई के लिए तैयार करने में जुट गए हैं। बेहतर पैदावार की उम्मीद में अधिकांश किसान उन्नत बीज, खाद और उर्वरकों का सहारा लेते हैं, लेकिन इतने प्रयासों के बाद भी कई बार फसल से अपेक्षित उत्पादन नहीं मिल पाता। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी एक अहम वजह मिट्टी की गुणवत्ता और उसका पीएच स्तर हो सकती है। इसी कारण बुवाई से पहले मिट्टी की जांच और उसका उचित उपचार किसानों के लिए फायदेमंद रहता है।
पलामू क्षेत्र में खरीफ की तैयारी जोरों पर है और बुवाई शुरू होने से पहले खेतों को दुरुस्त करने का काम तेज हो गया है। यहां की अम्लीय मिट्टी में भूमि सुधार के उपाय अपनाकर किसान अपनी उपज में सुधार ला सकते हैं।
पलामू की अधिकांश भूमि है अम्लीय
कृषि विज्ञान केंद्र, चियांकी (पलामू) के कृषि वैज्ञानिक डॉ. दिलीप पांडे के अनुसार पलामू की ज्यादातर जमीन अम्लीय प्रकृति की है। ऐसी मिट्टी में जरूरी पोषक तत्व मौजूद रहने के बावजूद वे पौधों तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाते, जिसका सीधा असर फसल की बढ़वार पर पड़ता है और उत्पादन घट जाता है। मक्का और अरहर समेत कई खरीफ फसलों में यह दिक्कत ज्यादा देखी जाती है। ऐसे में सिर्फ खाद और उर्वरक डाल देना काफी नहीं है, बल्कि मिट्टी का उपचार करना भी उतना ही आवश्यक है।
चूने से संतुलित होता है पीएच स्तर
डॉ. पांडे बताते हैं कि मिट्टी सुधार के लिए चूने का प्रयोग एक कारगर उपाय है। खेत में सही मात्रा में चूना डालने पर मिट्टी का पीएच स्तर बढ़कर 6 से 7 के बीच पहुंच जाता है, जिसे अधिकांश फसलों की वृद्धि के लिए आदर्श स्थिति माना जाता है। पीएच संतुलित होते ही मिट्टी में पहले से मौजूद पोषक तत्व पौधों को आसानी से मिलने लगते हैं, जिससे फसल की बढ़वार बेहतर होती है और उत्पादन क्षमता में भी इजाफा होता है।
छिड़काव का सही समय और मात्रा
कृषि वैज्ञानिक ने किसानों को सलाह दी है कि वे केवल बुझा हुआ चूना (स्लेक्ड लाइम) ही इस्तेमाल करें, क्योंकि यह गर्मी पैदा नहीं करता और खेत के लिए सुरक्षित रहता है। उनके अनुसार बुवाई से करीब 40 से 45 दिन पहले खेत में चूने का छिड़काव कर देना चाहिए।
बेहतर परिणाम के लिए प्रति कट्ठा 4 से 5 किलोग्राम चूना की दर से इसे पूरे खेत में समान रूप से फैलाना चाहिए। इसके बाद जुताई करके चूने को मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना जरूरी है।
तीन साल तक रहता है असर
डॉ. पांडे के मुताबिक चूना उपचार का प्रभाव केवल एक वर्ष तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लगभग तीन वर्षों तक बना रह सकता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों, खासकर नत्रजन आधारित खादों की जरूरत भी घट जाती है। इस तरह खरीफ सीजन से पहले खेत का उपचार किसानों के लिए कम लागत में अधिक उत्पादन हासिल करने का रास्ता खोल सकता है।
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