ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले शी जिनपिंग का माइंड गेम, अंतिम 48 घंटों में चीन ने क्यों भरी हामी? विश्व 2 घंटे पहले 3
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अंतिम 48 घंटों में अपनी उपस्थिति की पुष्टि की। विशेषज्ञों का मानना है कि यह देरी चीन की एक सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा थी, ताकि वह सम्मलेन के एजेंडे पर अपना नियंत्रण बनाए रख सके।

चीन की कूटनीतिक रणनीति और सस्पेंस

नई दिल्ली के भारत मंडपम में 12 और 13 सितंबर को 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। इस सम्मेलन को लेकर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। जहां रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने काफी पहले ही अपनी भागीदारी की घोषणा कर दी थी, वहीं चीन ने अपने राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यात्रा को लेकर आखिरी समय तक सस्पेंस बनाए रखा। चीन के विदेश मंत्रालय ने सम्मेलन शुरू होने से केवल 48 घंटे पहले ही आधिकारिक रूप से पुष्टि की कि शी जिनपिंग भारत आ रहे हैं। साल 2019 के बाद यह उनका पहला भारत दौरा है, जो पूरे 7 साल के अंतराल के बाद हो रहा है। हालांकि, इस देरी को केवल लॉजिस्टिक या आकस्मिक कारणों से नहीं जोड़ा जा सकता। यह बीजिंग की एक सोची-समझी और गहरी कूटनीतिक चाल मानी जा रही है, जिसे विशेषज्ञों की भाषा में चाइनीज व्हिस्पर या सस्पेंस कूटनीति का नाम दिया गया है।

सस्पेंस के पीछे छिपी कूटनीति

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आमतौर पर बड़े देशों के प्रमुखों के दौरे की घोषणा हफ्तों या महीनों पहले कर दी जाती है, ताकि मेजबान देश तैयारियों को अंतिम रूप दे सकें। लेकिन चीन की कार्यशैली हमेशा से अलग रही है। अंतिम समय तक फैसला सुरक्षित रखना चीन का एक आजमाया हुआ हथियार है। इस रणनीति के जरिए चीन दोहरे लाभ उठाता है। पहला, वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्थिति को मजबूत करता है और दूसरा, द्विपक्षीय बातचीत की मेज पर अपना पलड़ा भारी रखता है। जब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं होती, मेजबान देश और अन्य सहयोगी देशों के बीच एक अनिश्चितता बनी रहती है, जिसका लाभ उठाकर चीन अपने पक्ष में शर्तें मनवाने का प्रयास करता है।

साइडलाइन मीटिंग और एजेंडा निर्धारण

शी जिनपिंग के दौरे की देर से पुष्टि करने के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति के बीच होने वाली उच्च स्तरीय साइडलाइन मीटिंग है। सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की मुलाकात का एजेंडा क्या होगा और बातचीत किन विषयों पर केंद्रित होगी, इसे लेकर दोनों पक्षों के राजनयिक लगातार मंथन कर रहे थे। चीन ने अपनी भागीदारी की पुष्टि तब तक रोके रखी जब तक कि उसे अपने अनुकूल शर्तों पर सहमति नहीं मिल गई। साथ ही, सम्मेलन के अंत में जारी होने वाले साझा घोषणापत्र, जिसे न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन कहा गया है, उसके ड्राफ्ट पर भी चीन ने कड़ा रुख अपनाया। चीन ने सुनिश्चित किया कि डिक्लेरेशन में उसकी पसंद के मुद्दे शामिल हों और इसके लिए उसने दबाव की नीति का बखूबी इस्तेमाल किया। इस पैंतरे से चीन ने यह भी सुनिश्चित किया कि समिट का मुख्य ध्यान व्यावसायिक और वैश्विक मुद्दों पर रहे, ताकि किसी भी ऐसे मुद्दे पर चर्चा न हो जिससे चीन को वैश्विक मंच पर असहज स्थिति का सामना करना पड़े।

सुरक्षा और प्रोटोकॉल का तकाजा

चीन की इस नीति का एक पहलू उनके सरकारी कार्यप्रणाली से भी जुड़ा है। पश्चिमी देशों की तरह चीन अपनी शीर्ष लीडरशिप के यात्रा विवरणों को बहुत पहले सार्वजनिक नहीं करता है। चीनी विदेश मंत्रालय का यह एक मानक प्रोटोकॉल है कि राष्ट्रपति के किसी भी विदेश दौरे की जानकारी रवानगी से महज 2 से 3 दिन पहले ही दी जाती है। इससे पहले भी जब शी जिनपिंग ने दक्षिण अमेरिका या मध्य एशिया के सम्मेलनों में भाग लिया था, तब भी यही पैटर्न देखने को मिला था। इसका सबसे बड़ा कारण शी जिनपिंग के लिए तैयार किया जाने वाला बेहद सख्त सुरक्षा कवच और जमीनी इंतजाम हैं। चीन की सुरक्षा एजेंसियां जब तक मेजबान देश में सुरक्षा व्यवस्था, हवाई मार्गों और तमाम लॉजिस्टिक्स की 100 फीसदी जांच नहीं कर लेतीं, तब तक बीजिंग से कोई भी आधिकारिक घोषणा नहीं की जाती है।

11 देशों के समूह में संतुलन

वर्तमान समय में ब्रिक्स का विस्तार हो चुका है और अब इसमें 11 प्रमुख देश शामिल हैं, जिसमें मध्य पूर्व और अफ्रीका की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी जुड़ी हैं। इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में चीन किसी एक देश या मंच के सामने अपने पत्ते बहुत पहले खोलकर स्वयं को सीमित नहीं करना चाहता था। अंतिम क्षणों में अपनी उपस्थिति पर सहमति जताकर चीन ने यह संदेश दिया है कि उसका हर निर्णय पूरे ब्रिक्स समूह की सहमति पर निर्भर है। रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे अन्य नेताओं के साथ दिल्ली पहुंचकर चीन ने दुनिया को यह दिखाने की कोशिश की है कि वह ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों का सबसे बड़ा समर्थक और सहयोगी है। इससे चीन अपनी छवि एक जिम्मेदार वैश्विक नेता के रूप में पेश करने में सफल रहा है।

7 साल बाद भारत दौरा और वैश्विक संदेश

शी जिनपिंग का यह भारत दौरा कई दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्ष 2019 में वे मामल्लापुरम आए थे, जिसके बाद से भारत और चीन के संबंधों में उतार-चढ़ाव देखे गए हैं। पूरे 7 साल बाद उनका भारत आगमन एक बड़ी कूटनीतिक घटना है। हालांकि यह मुख्य रूप से ब्रिक्स का मंच है, लेकिन पूरी दुनिया की नजरें नई दिल्ली की गतिविधियों पर टिकी हैं। चीन ने भले ही अंतिम 48 घंटों तक माइंड गेम खेलकर दुनिया को उलझाए रखा, लेकिन भारत मंडपम में उनकी उपस्थिति ने यह साफ कर दिया है कि आज के दौर में भारत को नजरअंदाज करना किसी भी महाशक्ति के लिए संभव नहीं है। अब देखना यह शेष है कि इस दो दिवसीय महाजुटान के बाद भारत-चीन के रिश्तों और वैश्विक अर्थव्यवस्था को किस नई दिशा और गति मिलती है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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