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3 घंटे पहले
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रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच अमेरिकी राजनीति में एक बार फिर बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। अमेरिकी संसद के दोनों सदनों ने एक ऐसे महत्वपूर्ण विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिसका सीधा और बड़ा असर भारत पर पड़ सकता है। इस नए विधेयक के तहत रूस से कच्चे तेल और गैस का आयात करने वाले देशों पर 100 फीसदी तक का भारी-भरकम आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने का अधिकार दिया गया है। चूंकि भारत रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा संसाधनों की खरीद करता है, इसलिए इस कानून के दायरे में भारत का आना तय माना जा रहा है। हालांकि, अमेरिकी कांग्रेस से इस प्रस्ताव को हरी झंडी मिलने के बाद भी यह तुरंत प्रभाव से लागू नहीं हो सकेगा, क्योंकि इस पूरे मामले में कई कूटनीतिक और प्रशासनिक पेच फंसे हुए हैं।
अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से मिली हरी झंडी
इस बहुचर्चित विधेयक का नाम 'लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' है। रिपब्लिकन पार्टी के दिवंगत नेता ग्राहम लिंडसे के सम्मान में तैयार किए गए इस कानून को अमेरिकी संसद के दोनों सदनों का समर्थन मिल चुका है। इस विधेयक को सबसे पहले अगस्त 2026 में अमेरिकी सीनेट ने अपनी मंजूरी दी थी। इसके बाद, हाल ही में 16 सितंबर 2026 को अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने भी इसे भारी बहुमत से पास कर दिया। सदन में इस विधेयक के पक्ष में 262 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में केवल 159 सदस्यों ने मतदान किया। दोनों सदनों से पारित होने के बाद अब भारत और अन्य रूसी तेल खरीदार देशों पर टैरिफ का खतरा काफी बढ़ गया है।
भारत सहित इन पांच देशों पर पड़ सकता है सीधा असर
यह कानून सीधे तौर पर उन देशों को लक्षित करता है जो अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद रूस से ऊर्जा आयात जारी रखे हुए हैं। नए नियमों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति को यह विशेष अधिकार दिया गया है कि वे रूस से तेल और गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक का दंडात्मक आयात शुल्क लगा सकें, यदि वे कानून बनने के बाद भी रूसी ऊर्जा खरीदना जारी रखते हैं। इन लक्षित देशों की सूची में निम्नलिखित प्रमुख नाम शामिल हैं:
- भारत: जो अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से भारी मात्रा में कच्चे तेल का आयात कर रहा है।
- चीन: रूस का एक और सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और ऊर्जा खरीदार।
- स्लोवाकिया: यूरोपीय संघ का वह देश जो अब भी रूसी गैस और तेल पर निर्भर है।
- हंगरी: रूसी ऊर्जा आपूर्ति का पुराना समर्थक।
- अजरबैजान: जो रूसी ऊर्जा गलियारे से गहराई से जुड़ा हुआ है।
इस सूची में शामिल होने के कारण भारत पर अमेरिकी कार्रवाई का खतरा मंडरा रहा है। हालांकि, यहां यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अमेरिका ने इससे पहले फरवरी 2026 में भारत पर रूसी तेल खरीदने के कारण लगाया गया अतिरिक्त 25 फीसदी का टैरिफ हटा दिया था। ऐसे में अब अचानक 100 फीसदी आयात शुल्क लगाना दोनों देशों के बीच व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है।
आखिर क्यों तुरंत लागू नहीं हो सकता यह कानून?
अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से पास होने के बावजूद इस विधेयक के तुरंत लागू न होने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि बिल का पास होना और उसका कानून में तब्दील होना दो बेहद अलग प्रक्रियाएं हैं। किसी भी विधेयक को कानून का रूप लेने के लिए अंततः अमेरिकी राष्ट्रपति के हस्ताक्षरों की आवश्यकता होती है। इस समय यह फाइल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजी गई है।
इसके साथ ही, इस समय अमेरिका में कूटनीतिक व्यस्तताएं भी चरम पर हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सितंबर के आखिरी सप्ताह में अमेरिका के बेहद महत्वपूर्ण दौरे पर आने वाले हैं। वर्तमान में अमेरिकी प्रशासन का पूरा ध्यान इस हाई-प्रोफाइल यात्रा की तैयारियों और द्विपक्षीय वार्ताओं पर केंद्रित है। कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति ट्रंप शी जिनपिंग के दौरे से ठीक पहले कोई ऐसा बड़ा कदम नहीं उठाना चाहेंगे, जिससे द्विपक्षीय संबंधों में अनावश्यक कड़वाहट पैदा हो।
अगर राष्ट्रपति ट्रंप इस कानून पर तुरंत हस्ताक्षर कर देते हैं, तो इसका पहला शिकार चीन और भारत जैसे बड़े देश बनेंगे। शी जिनपिंग की यात्रा के ठीक पहले चीन पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने जैसा कड़ा फैसला अमेरिका के लिए एक बड़ी कूटनीतिक भूल साबित हो सकता है। ऐसे संवेदनशील समय में अमेरिकी प्रशासन बेहद संभलकर कदम उठाएगा, जिसके चलते इस कानून के वास्तविक रूप से लागू होने में अभी कुछ समय का विलंब होना लगभग तय माना जा रहा है।
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