मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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छतरपुर जिले के लवकुश नगर में मां बंबरबेनी की ऊंची पहाड़ी पर हर तीन साल में माता के नाम एक विशाल भंडारा आयोजित होता है। इसमें लगभग 30 क्विंटल अनाज की पूड़ियां बेली जाती हैं और इनके साथ क्विंटलों सब्जी तथा मिठाई का प्रसाद तैयार किया जाता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस आयोजन से प्रसन्न होकर माता गांव और शहर में अच्छी बारिश कराती हैं तथा क्षेत्र को प्राकृतिक आपदाओं से बचाती हैं। प्रसाद तैयार करने के लिए लगातार दो दिनों तक चूल्हा जलता रहता है।
इस भंडारे में बच्चों, युवाओं और महिलाओं से लेकर बुजुर्गों तक हर कोई 365 सीढ़ियां चढ़कर आटा और सब्जी लेकर पहाड़ी पर पहुंचता है। गरीब से लेकर अमीर तक सभी अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करते हैं। इस आयोजन में एक लाख से ज्यादा श्रद्धालु शामिल होते हैं और भंडारे की यह परंपरा वर्षों पुरानी है।
त्रेतायुग से जुड़ा है इस स्थान का नाता
मां बंबरबेनी सेवा समिति के उपाध्यक्ष जगदीश प्रसाद नामदेव बताते हैं कि छतरपुर के लवकुश नगर में मां बंबरबेनी की प्राचीन पहाड़ी है, जिसे मध्य प्रदेश सरकार पर्यटन स्थल भी घोषित कर चुकी है। यह केवल एक पहाड़ी भर नहीं, बल्कि ऋषि-मुनियों की तपोभूमि मानी जाती है। उनके अनुसार यहां महर्षि वाल्मीकि से लेकर बड़े-बड़े साधु-संत और महात्माओं ने तप किया है।
उन्होंने बताया कि इस शहर में 52 पहाड़ियां हैं और इनमें यही पहाड़ी सबसे ऊंची है, इसी कारण इसे बावन पहाड़ी भी कहा जाता है। पहले इसके आसपास सिर्फ जंगल और पहाड़ ही थे। मान्यता है कि इस स्थान का संबंध त्रेतायुग से है।
मां बंबरबेनी का इतिहास
जगदीश बताते हैं कि मां बंबरबेनी इसी पहाड़ी की ऊंचाई पर विराजमान हैं। मान्यता के अनुसार मां बंबरबेनी ही साक्षात माता सीता हैं और इसी स्थान पर उन्होंने लव-कुश का पालन-पोषण किया था। इन्हें वनदेवी भी कहा गया और बाद में ये मां बंबरबेनी के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
इस पहाड़ी के चारों ओर शहर बसा हुआ है और आसपास कई गांव भी आबाद हैं। माता की शरण में लाखों लोग रहते हैं। पुराने बुजुर्गों ने तय किया कि चूंकि माता की इस पहाड़ी पर सैकड़ों साधु-संतों ने तपस्या की है और स्वयं माता सीता यहां विराजमान हैं, इसलिए हर तीन साल में यहां एक विशाल भंडारा आयोजित किया जाए। इस भंडारे में लगभग एक लाख श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करने पहुंचते हैं।
15 दिन पहले से शुरू हो जाती हैं तैयारियां
जगदीश के मुताबिक भंडारे की तैयारियां आयोजन से 15 दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। इन तैयारियों में गरीब से लेकर अमीर तक सभी जुड़ते हैं और बच्चे, युवा, बुजुर्ग तथा महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
365 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचाया जाता है अन्न
वे बताते हैं कि आलू, टमाटर से लेकर अनाज तक हर चीज को 365 सीढ़ियां चढ़कर ऊपर ले जाया जाता है। यहां अब तक किसी तरह की लिफ्ट या सड़क नहीं बनी है, इसलिए जो भी पहाड़ी पर जाता है वह स्वयं श्रमदान करता है। इस भंडारे में लोग श्रमदान के साथ-साथ अन्नदान भी करते हैं।
30 क्विंटल अनाज की पूड़ियां
जगदीश बताते हैं कि हर तीन साल में पुरुषोत्तम मास के समाप्त होने के बाद विशाल भंडारा कराया जाता है, जिसमें लगभग 30 क्विंटल अनाज की पूड़ियां बेली जाती हैं। साथ ही क्विंटलों में सब्जी और बूंदी भी तैयार की जाती है। भंडारे से दो दिन पहले ही माता का प्रसाद बनाना शुरू कर दिया जाता है और लोग दिन-रात जागकर प्रसाद तैयार करते हैं।
श्रमदान से होता है आयोजन
उनके अनुसार यहां पूड़ी से लेकर सब्जी और मिठाई बनाने वाले हलवाई तक श्रमदान करते हैं। इस भंडारे में हजारों लोग अपना श्रमदान देते हैं और किसी भी तरह का कोई पैसा नहीं लिया जाता। लोग स्वयं सामान लाते हैं और सेवा करते हैं।
पशु-पक्षियों को भी कराया जाता है भोजन
जगदीश बताते हैं कि यह भंडारा मुख्य रूप से पशु-पक्षियों, कन्याओं और गरीब लोगों को भोजन कराने के लिए होता है। यह वर्षों पुरानी परंपरा है। हालांकि अब इस प्रसाद को ग्रहण करने के लिए दूर-दूर से संपन्न लोग भी पहुंचते हैं।
हर तीन साल में जून में होता है भंडारा
वे बताते हैं कि इस आयोजन से मां बंबरबेनी इतनी प्रसन्न होती हैं कि वह शहर के आसपास हर साल की तुलना में अधिक बारिश कराती हैं। दरअसल यह क्षेत्र सूखाग्रस्त क्षेत्रों में गिना जाता है। माता को प्रसन्न करने के लिए हर तीन साल में जून महीने के दौरान यह विशाल भंडारा कराया जाता है।
प्राकृतिक आपदाओं से करती हैं रक्षा
जगदीश का कहना है कि उन्हें कई बार ऐसे प्रमाण मिले हैं कि भंडारे के बाद माता इस शहर को प्राकृतिक आपदाओं से बचाती हैं और क्षेत्र में अच्छी बारिश भी कराती हैं, जिससे किसान समृद्ध होते हैं।
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