बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
जैविक खेती से बदली किस्मत
सारण जिले के छपरा में रहने वाले किसान नर्मदेश्वर गिरी ने पारंपरिक खेती के बजाय जैविक विधि अपनाकर कृषि के क्षेत्र में मिसाल पेश की है। खैरा प्रखंड के सैदूपुर मठिया गांव के निवासी नर्मदेश्वर ने अपनी सूझबूझ और वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल कर केले की ऐसी खेती की है, जिसे देखकर स्थानीय लोग और व्यापारी भी दंग रह जाते हैं।
'बतीसा' वैरायटी और खास तकनीक
नर्मदेश्वर गिरी ने लगभग एक एकड़ जमीन पर 'बतीसा' वैरायटी के केले लगाए हैं। उनकी खेती के तरीके में कुछ खास बदलाव हैं जो उन्हें अन्य किसानों से अलग बनाते हैं:
- सीमित पौधे: आमतौर पर किसान एक जगह पर 5 से 10 पौधे लगा देते हैं, लेकिन नर्मदेश्वर केवल 2 से 3 पौधे ही रखते हैं।
- तेज विकास: कम पौधे होने के कारण उन्हें खाद और पानी का पूरा पोषण मिलता है, जिससे वे तेजी से बढ़ते हैं।
- सीधी बिक्री: केले का घवद इतना बड़ा और तगड़ा होता है कि व्यापारी खुद खेत पर आकर ₹500 से अधिक की कीमत में इसे खरीद लेते हैं।
पूरी तरह से प्राकृतिक और शुद्ध
इस खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद या कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता है। पूरी तरह से जैविक होने के कारण यह केला सेहत के लिए सुरक्षित है। इसकी खास बात यह है कि कच्चे केले की सब्जी और कोफ्ता बहुत स्वादिष्ट होते हैं, जबकि पकने के बाद यह फल काफी मीठा हो जाता है, जिससे शादी-विवाह के सीजन में इसकी मांग काफी बढ़ जाती है।
दूसरों को बना रहे आत्मनिर्भर
मांझी कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से प्रशिक्षण लेने के बाद नर्मदेश्वर गिरी अब दूसरों के लिए प्रेरणा बन गए हैं। वे अब खुद लौकी और नेनुआ जैसी सब्जियों के बीज भी तैयार करते हैं। वे न केवल अपने जिले में बल्कि पूरे बिहार में घूमकर किसानों को जैविक खेती का निशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं ताकि अधिक से अधिक किसान कम बजट में बेहतर मुनाफा कमा सकें और आत्मनिर्भर बन सकें।
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