बिहार
2 महीने पहले
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विचारों
बिहार के छपरा जिले में परंपरागत खेती का स्वरूप अब धीरे-धीरे बदलने लगा है। यहां के किसान रासायनिक खादों और कीटनाशकों से तौबा कर पूरी तरह से प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर रुख कर रहे हैं। इस बदलाव की कमान संभाली है कृषि विज्ञान केंद्र, मांझी के वैज्ञानिकों ने, जो समय-समय पर गांवों में विशेष प्रशिक्षण शिविर और कैंप लगाकर किसानों को जैविक खेती के फायदों के प्रति जागरूक कर रहे हैं। वैज्ञानिकों के इस प्रयास का असर अब धरातल पर दिखने लगा है। यहां के किसानों ने रासायनिक खादों के जहरीले चक्रव्यूह से खुद को बाहर निकाल लिया है, जिससे न केवल उनकी फसल की गुणवत्ता सुधरी है, बल्कि उनकी आमदनी में भी रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इस जैविक क्रांति से बंजर होती जा रही खेतों की मिट्टी को नया जीवन मिला है, और सब्जियां उगाने वाले किसानों को बंपर मुनाफा मिल रहा है।
सारण जिले के मांझी प्रखंड के अंतर्गत आने वाले शीतलपुरा गांव में इस जैविक खेती का सबसे बड़ा और सफल उदाहरण देखने को मिल रहा है। यहां के दो प्रगतिशील किसानों, उमेश कुमार प्रसाद और बगेंद्र प्रसाद, समेत दर्जनों किसानों ने अपनी पारंपरिक सोच को बदलते हुए पूरी तरह से जैविक विधि को अपना लिया है। इन किसानों ने हरी सब्जियों की खेती को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप इनके खेतों में सब्जियों की ऐसी जबरदस्त पैदावार हो रही है कि देखने वाले भी हैरान रह जा रहे हैं।
एक दिन के अंतराल पर हो रही है 70 किलो भिंडी की पैदावार
शीतलपुर गांव के रहने वाले किसान उमेश कुमार प्रसाद ने अपनी सूझबूझ और कड़ी मेहनत से खेती का एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जो आज पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है। उमेश कुमार प्रसाद ने अपने मात्र 5 कट्ठे के छोटे से खेत में उन्नत किस्म की भिंडी की बुवाई की थी। जैविक और प्राकृतिक विधि से की गई इस खेती का नतीजा यह हुआ कि उनके खेत में भिंडी की बंपर पैदावार हो रही है।
उमेश प्रसाद बताते हैं कि भिंडी की फसल इतनी घनी और फलदार हुई है कि वे एक दिन बीच करके यानी हर एक दिन के अंतराल पर अपने 5 कट्ठे के खेत से लगभग 70 किलो तक ताजा भिंडी तोड़कर बाजार में बेच रहे हैं। इस लिहाज से अगर देखा जाए, तो वे हर हफ्ते अपने इस छोटे से खेत से करीब 2 क्विंटल भिंडी की शानदार पैदावार ले रहे हैं। इस पैदावार को स्थानीय मंडियों में बेचकर वे बेहद कम समय में बेहतरीन मुनाफा कमा रहे हैं।
घर पर ही तैयार करते हैं बेहद असरदार जैविक खाद
किसान उमेश कुमार प्रसाद अपनी इस बंपर सफलता के पीछे की असली ताकत जैविक खाद को मानते हैं। उन्होंने बताया कि वे खाद खरीदने के लिए बाजार या रासायनिक उर्वरकों पर बिल्कुल भी निर्भर नहीं हैं। बाजार की महंगी और हानिकारक रासायनिक खादों की जगह वे पूरी तरह से अपने घर पर तैयार की गई प्राकृतिक खाद का उपयोग करते हैं।
इस जैविक खाद को बनाने की प्रक्रिया भी बेहद सरल और पूरी तरह से प्राकृतिक है:
- वे अपने घर पर ही गाय-भैंस के गोबर का उपयोग करते हैं।
- इसमें खेत-खलिहान से निकलने वाली सूखी घास और खेतों के अन्य कचरे (पतवार) को मिलाया जाता है।
- इन सभी सामग्रियों को एक निश्चित प्रक्रिया के तहत सड़ाकर बेहद शक्तिशाली प्राकृतिक जैविक खाद तैयार की जाती है।
इसी तैयार खाद को वे समय-समय पर अपनी भिंडी की फसल की जड़ों में डालते हैं। इस जैविक खाद के चमत्कारी प्रभाव के कारण भिंडी के पौधे अत्यंत स्वस्थ, गहरे और हरे-भरे दिखाई देते हैं। उमेश कुमार बताते हैं कि पौधे के हर एक पत्ते के जोड़ के पास फूल और फल लदे हुए नजर आ रहे हैं। इस प्राकृतिक तरीके से खेती करने के कारण उनकी लागत न के बराबर आती है, जबकि बाजार में मिलने वाला मुनाफा सीधे तौर पर कई गुना बढ़ जाता है।
'राधिका' वैरायटी ने दिखाया बंपर फलन का दम
खेती में जैविक खाद के इस्तेमाल के साथ-साथ उमेश कुमार प्रसाद ने बीजों के चयन में भी विशेष सावधानी बरती है। उन्होंने अपने 5 कट्ठे के खेत में प्रसिद्ध 'राधिका' वैरायटी की हाइब्रिड भिंडी के बीज लगाए हैं। इस वैरायटी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका पौधा जब बहुत छोटा होता है, तभी से इसमें फूल और फल आने शुरू हो जाते हैं। इसके साथ ही, यह किस्म शुरुआती दौर से लेकर बिल्कुल अंतिम समय तक निरंतर और भारी मात्रा में पैदावार देने की क्षमता रखती है।
उमेश प्रसाद द्वारा अपनाए गए बीजों और जैविक खाद के इस बेजोड़ फॉर्मूले को देखने के लिए आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में किसान उनके खेत पर आ रहे हैं। लोग उनसे इस खास तकनीक को सीख रहे हैं और अपनी खेती में भी इसे लागू करने की योजना बना रहे हैं।
मंडी में जाते ही हाथों-हाथ बिकती है यह जैविक भिंडी
किसान उमेश कुमार प्रसाद ने इस खेती के व्यावसायिक पहलू पर बात करते हुए बताया कि सारण की उपजाऊ मिट्टी पर राधिका वैरायटी की भिंडी का परिणाम बेहद उत्साहजनक और चमत्कारी रहा है। इस किस्म के पौधे बहुत ही मजबूत होते हैं और इनसे मिलने वाले फल गहरे चमकीले हरे रंग के होते हैं।
बाजार में इस भिंडी की मांग और लोकप्रियता के निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:
- गहरा हरा रंग और बेहतरीन चमक: इस भिंडी की त्वचा पर एक प्राकृतिक चमक होती है, जो दिखने में बेहद ताजी और आकर्षक लगती है।
- हाथों-हाथ बिक्री: जैसे ही यह भिंडी मंडी में पहुंचती है, खरीदार और आढ़ती इसे तुरंत खरीद लेते हैं। इसे बेचने के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता।
- बेहतर स्वाद: रासायनिक खादों और जहरीले कीटनाशकों के बिना उगाई जाने के कारण इसका स्वाद रासायनिक भिंडी की तुलना में कहीं अधिक स्वादिष्ट और लाजवाब होता है।
- स्वास्थ्य के लिए बेहद सुरक्षित: पूरी तरह जैविक विधि से तैयार होने के कारण इन हरी सब्जियों के सेवन से मानव स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल या हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है।
उमेश कुमार का कहना है कि रासायनिक खेती की तुलना में इस प्राकृतिक जैविक खेती में खाद और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च लगभग शून्य हो जाता है। लागत कम होने से किसानों की शुद्ध बचत कई गुना बढ़ जाती है। यही कारण है कि अब इस क्षेत्र के अन्य किसान भी रासायनिक खेती के दुष्परिणामों को समझकर तेजी से जैविक कृषि की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
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