गोवा: बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए चुनाव आयोग को दिए निर्देश भारत 47 मिनट पहले 1
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने चुनाव आयोग को एक परिवार के 6 सदस्यों के नाम 10 दिन के भीतर मतदाता सूची में दर्ज करने का आदेश दिया है। अदालत ने इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए पते की पुष्टि अनिवार्य की है।

बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने मतदाता सूची से नाम गायब होने से संबंधित एक मामले में सुनवाई करते हुए एक परिवार को बड़ी राहत प्रदान की है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से चुनाव आयोग को निर्देश दिए हैं कि वे आने वाले 10 दिनों के भीतर संबंधित परिवार के 6 सदस्यों के नाम मतदाता सूची में शामिल करें। अदालत ने चुनाव आयोग को यह भी कहा है कि नाम दर्ज करने से पहले वे उनके पते की उचित तरीके से पुष्टि सुनिश्चित करें।

SIR मामले से अलग है याचिका

जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट में SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर जो मामला चल रहा है, यह याचिका उससे बिल्कुल भिन्न है। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि वे इस याचिका को स्वीकार कर रहे हैं, क्योंकि वर्तमान मामला सीधे तौर पर SIR की जटिलताओं से इतर, नागरिकों के मताधिकार से जुड़ा है।

आयोग की रोक की मांग खारिज

चुनाव आयोग की ओर से पक्ष रख रहे अधिवक्ता गौरीश अग्नि ने कोर्ट से गुहार लगाई कि वे इस आदेश पर रोक लगाएं, ताकि आयोग के पास इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का अवसर मिल सके। हालांकि, हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की इस अपील को सिरे से खारिज कर दिया और परिवार के हक में फैसला सुनाया।

सांताक्रूज विधानसभा का मामला

यह पूरा कानूनी विवाद गोवा के सांताक्रूज विधानसभा क्षेत्र में रहने वाले परेश वसंत सालगांवकर और उनके परिवार के अन्य पांच सदस्यों से जुड़ा हुआ है। परिवार ने अपने रहने का स्थान इसी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत बदला था। नियमानुसार, बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO के परामर्श के बाद, सभी 6 सदस्यों ने अपने पते में सुधार के लिए निर्धारित फॉर्म-8 जमा किए थे।

फॉर्म-8 को खारिज करने पर विवाद

जब SIR के तहत मतदाता सूची का ड्राफ्ट प्रकाशित हुआ, तो परिवार को यह जानकर गहरा धक्का लगा कि उनके नाम उसमें शामिल नहीं थे। बाद में पता चला कि चुनाव पंजीकरण अधिकारी यानी ERO ने उनके फॉर्म-8 आवेदनों को निरस्त कर दिया है। सबसे गंभीर बात यह रही कि यह सूचना परिवार को तब मिली, जब दावा और आपत्ति दर्ज कराने की तय समयसीमा समाप्त हो चुकी थी।

हाईकोर्ट क्यों गए पीड़ित?

चुनाव आयोग के अधिकारियों ने पीड़ित परिवार को सलाह दी थी कि वे नए सिरे से फॉर्म-6 भरें। परिवार ने इस सलाह का कड़ा विरोध किया और कानूनी रास्ता अपनाया। उनका तर्क था कि वे पहले से ही मतदाता के तौर पर पंजीकृत थे, इसलिए उन्हें फॉर्म-6 भरने के लिए कहना तकनीकी रूप से गलत है। कानून के मुताबिक फॉर्म-6 पहली बार मतदाता बनने वाले लोगों के लिए है, जबकि फॉर्म-8 का इस्तेमाल पहले से पंजीकृत मतदाताओं द्वारा पता बदलने या जानकारी अपडेट करने के लिए किया जाता है।

चुनाव आयोग की दलील और सफाई

सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने तर्क दिया कि SIR एक नई प्रक्रिया है जो सामान्य विशेष सारांश पुनरीक्षण यानी SSR से अलग है। आयोग ने कहा कि पुराने पते पर एन्यूमरेशन स्लिप जमा न होने के कारण उनके सिस्टम का सॉफ्टवेयर फॉर्म-8 आवेदनों को पुराने EPIC रिकॉर्ड के साथ लिंक नहीं कर सका, जिस वजह से आवेदन स्वचालित रूप से खारिज हो गए। आयोग का यह भी कहना था कि सूची में नाम न होने का अर्थ नाम हटाया जाना नहीं है। हाल ही में गोवा में SIR को लेकर उठे विवादों पर आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया था कि वे इस प्रक्रिया का उपयोग किस प्रकार कर रहे हैं और मतदाताओं की चिंताओं को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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