राज कुमार पर फिल्माए गए 7 मिनट लंबे इस गाने को रफी की आवाज ने बनाया अमर, टूटे दिलों को आज भी देता है सुकून मनोरंजन एक घंटा पहले 1
1970 की फिल्म 'हीर रांझा' का यह करीब 7 मिनट लंबा गाना रिकॉर्ड करना मदन मोहन और मोहम्मद रफी दोनों के लिए चुनौती बन गया था। हर अंतरे पर बदलते संगीत के कारण रफी साहब को सबसे ज्यादा रीटेक इसी गाने में देने पड़े थे।

हिंदी सिनेमा में मोहम्मद रफी और संगीतकार मदन मोहन की जोड़ी ने एक से बढ़कर एक यादगार गाने दिए, लेकिन एक गाने की रिकॉर्डिंग ऐसी रही जिसने दोनों दिग्गजों को पसीना ला दिया था। यह वही गाना है जिसे रफी साहब ने सबसे ज्यादा रीटेक देकर पूरा किया था।

आम गानों से अलग था इसका मिजाज

आमतौर पर फिल्मी गाने 4 से 5 मिनट के बीच होते हैं, मगर जिस गाने की यहां बात हो रही है, वह करीब 7 मिनट लंबा है। यही इसकी सबसे बड़ी मुश्किल भी थी। हर अंतरे के बाद इसका संगीत बदल जाता था, इसलिए मोहम्मद रफी जैसे मंझे हुए गायक को भी इसे रिकॉर्ड करते समय कई बार दोहराना पड़ा। मदन मोहन के संगीत से सजे इस गीत को परदे पर राज कुमार पर फिल्माया गया था।

रिकॉर्डिंग से पहले की दिलचस्प आदत

मदन मोहन जब भी रफी साहब के साथ कोई गाना रिकॉर्ड करते, तो उनसे अक्सर पूछ लेते कि कहीं उन्होंने हाल में 'याहू' जैसी ऊंची आवाज वाला कोई गाना तो रिकॉर्ड नहीं किया है। दरअसल वे रिकॉर्डिंग से पहले गायक और उनकी आवाज को बिल्कुल सही स्थिति में देखना चाहते थे। मगर इस गाने को रिकॉर्ड करते वक्त शायद दोनों ने सोचा भी नहीं था कि यह इतनी कठिन साबित होगी।

'हीर रांझा' और सात मिनट की चुनौती

फिल्म 'हीर रांझा' साल 1970 में रिलीज हुई थी, जिसके लिए यह गाना रिकॉर्ड किया जाना था। जहां सामान्य गाने 4 या साढ़े चार मिनट के होते हैं, वहीं यह लगभग 7 मिनट लंबा था और इसमें पूरे चार अंतरे थे। जाहिर है, इसे रिकॉर्ड करना संगीतकार और गायक दोनों के लिए किसी सिरदर्द से कम नहीं था।

बार-बार रीटेक, फिर भी चेहरे पर मुस्कान

आखिरकार मोहम्मद रफी गाना रिकॉर्ड करने स्टूडियो पहुंचे। गाना कई बार रिकॉर्ड हुआ, मगर मदन मोहन संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे। हर अंतरे से पहले संगीत बदलने के कारण उन्हें वह परफेक्शन नहीं मिल रहा था, जिसकी उन्हें तलाश थी।

मदन मोहन रफी साहब से बार-बार रिकॉर्डिंग करवाते रहे और इस दौरान वे थक भी गए थे। मगर रफी साहब की खासियत यही थी कि जब भी उनसे रीटेक के लिए कहा जाता, वे मुस्कुराकर फिर से रिकॉर्डिंग के लिए तैयार हो जाते। उनके चेहरे पर थकान साफ दिखती थी, लेकिन वही मुस्कान मदन मोहन को भरोसा देती थी कि गाना परफेक्ट बनेगा। कई टेक के बाद जब रफी साहब ने इसे फाइनल रिकॉर्ड किया, तो नतीजा कमाल का निकला। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रफी साहब ने सबसे ज्यादा रीटेक इसी गाने के लिए दिए थे।

कौन सा है यह गाना

यहां बात 1970 की फिल्म 'हीर रांझा' के गाने 'यह दुनिया यह महफिल मेरे काम की नहीं' की हो रही है। इसके बोल महान शायर कैफी आजमी ने लिखे थे, जबकि इसमें छिपे गहरे दर्द को संगीत के जादूगर मदन मोहन ने अपनी धुन से अमर बना दिया। यह गाना समाज की बेरुखी के खिलाफ एक तरह की बगावत भी है।

राज कुमार के अभिनय ने जोड़ा दर्द

गाना सुनकर लगता है मानो मोहम्मद रफी ने इसमें अपना पूरा दिल उड़ेल दिया हो। ऊंचे सुरों में गाते हुए उनकी आवाज में जो तड़प उभरती है, वह किसी को भी भावुक कर देती है। इसे परदे पर सदाबहार अभिनेता राज कुमार पर फिल्माया गया है। रांझा के किरदार में उनके चेहरे के भाव और लड़खड़ाते कदम आज भी दर्शकों की आंखों में आंसू ले आते हैं।

कहानी का वह मोड़

फिल्म में यह गाना उस मोड़ पर आता है, जब हीर की शादी जबरदस्ती किसी और से करा दी जाती है। रांझा पूरी तरह टूट जाता है और वैरागी बनने पर मजबूर हो जाता है। यह गीत हमें यही सिखाता है कि जब इंसान का सबसे प्रिय उससे छिन जाता है, तो दुनिया की सारी सुख-सुविधाएं, चमक-दमक और महफिलें उसके लिए पूरी तरह बेमानी हो जाती हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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