फीफा वर्ल्ड कप के माहौल में देखें फुटबॉल पर बनीं ये 8 भारतीय फिल्में, हर फ्रेम में ड्रामा और जज्बात मनोरंजन एक घंटा पहले 2
फीफा वर्ल्ड कप का जोश दुनियाभर में चरम पर है। ऐसे में फुटबॉल के जुनून, संघर्ष और देशप्रेम को पर्दे पर उतारने वाली ये आठ भारतीय फिल्में खेलप्रेमियों को जरूर देखनी चाहिए।

फीफा वर्ल्ड कप का बुखार इस वक्त पूरी दुनिया पर तारी है। हर तरफ मैदान, गोल और अपनी पसंदीदा टीमों को चीयर करते फैंस का जोश दिखाई दे रहा है। अगर आप सिनेमा के पर्दे पर भी फुटबॉल का यही रोमांच और इस खेल का इतिहास महसूस करना चाहते हैं, तो भारतीय सिनेमा के पास ऐसी कई बेहतरीन फिल्में मौजूद हैं। इनमें खेल के प्रति जुनून, कड़ा संघर्ष और देशभक्ति का जज्बा बखूबी झलकता है। यहां पेश हैं ऐसी ही 8 फिल्में।

झुंड (2022)

अमिताभ बच्चन की यह फिल्म फुटबॉल की बदलाव लाने वाली ताकत को बयां करती है। विजय बारसे के वास्तविक जीवन से प्रेरित इस कहानी में एक रिटायर्ड स्पोर्ट्स टीचर झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब बच्चों की बेलगाम ऊर्जा को सही राह दिखाने के लिए फुटबॉल को माध्यम बनाता है और खेल के जरिए उनकी जिंदगी ही बदल देता है।

धन धना धन गोल (2007)

जॉन अब्राहम अभिनीत यह हिंदी फिल्म फुटबॉल प्रेमियों के बीच खासी पसंद की गई। इसकी कहानी ब्रिटेन के साउथॉल में बसे एशियाई मूल के खिलाड़ियों के एक फुटबॉल क्लब की है, जो नस्लवाद और भारी आर्थिक तंगी से जूझते हुए अपनी पहचान की लड़ाई लड़ता है।

मैदान

अजय देवगन की यह फिल्म मशहूर फुटबॉल कोच सैयद अब्दुल रहीम के जीवन पर आधारित है। इसमें 1952 से 1962 के बीच भारतीय फुटबॉल के स्वर्णिम दौर को दिखाया गया है, जब भारत ने एशियन गेम्स में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी।

बिगिल

थलापति विजय की इस ब्लॉकबस्टर में 'माइकल' नाम का एक पूर्व फुटबॉलर महिलाओं की फुटबॉल टीम का कोच बनता है। वह खिलाड़ियों को न सिर्फ खेल की बारीकियां सिखाता है, बल्कि समाज और निजी जिंदगी की चुनौतियों से लड़ना भी सिखाता है।

एगारो

फुटबॉल के दीवानों के लिए यह बंगाली फिल्म देखना बेहद जरूरी है। इसमें दिखाया गया है कि किस तरह मोहन बागान ने 1911 में ब्रिटिश ईस्ट यॉर्कशायर रेजिमेंट को मात देकर आईएफए शील्ड अपने नाम की थी।

कैप्टन (2018)

जिन्हें फुटबॉल के इतिहास में दिलचस्पी है, उनके लिए यह मलयालम फिल्म बेहतरीन विकल्प है। यह भारतीय फुटबॉल कप्तान वीपी सत्यन के जीवन पर बनी बायोपिक है।

खेलें हम जी जान से (2010) और गोलोंदाज (2021)

'खेलें हम जी जान से' और देव अधिकारी की बंगाली फिल्म 'गोलोंदाज' भी राष्ट्रवाद और खेल के इसी मेल को आगे बढ़ाती हैं। फुटबॉल प्रेमियों को ये दोनों फिल्में जरूर देखनी चाहिए।

'गोलोंदाज' में नागेंद्र प्रसाद सरबाधिकारी के जीवन के जरिए यह दर्शाया गया है कि अंग्रेजों के दौर में फुटबॉल महज एक खेल नहीं था, बल्कि देश के आत्मसम्मान और आजादी की लड़ाई का प्रतीक बन गया था।

चेतन शुक्ला
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चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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