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एक घंटा पहले
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हिंदी सिनेमा में कुछ ऐसे कलाकार हुए जिन्होंने अपनी मेहनत और हुनर के दम पर अलग मुकाम बनाया. ऐसे ही एक दिग्गज अभिनेता थे जीवन. पर्दे पर उनके निभाए खलनायक और नारद मुनि के किरदार दर्शकों के जेहन में आज भी ताजा हैं. 10 जून 1987 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था, लेकिन उनकी यादें आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में बसी हुई हैं.
कश्मीर में जन्म और बचपन का दर्द
साल 1915 में कश्मीर में जन्मे जीवन का असली नाम ओंकार नाथ धार था. बचपन से ही उनके मन में अभिनेता बनने की चाह थी, मगर उनके परिवार में अभिनय को सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता था. जिंदगी ने भी उन्हें बेहद कम उम्र में गहरे जख्म दिए. जन्म के तुरंत बाद उनकी मां चल बसीं और महज तीन साल की उम्र में उनके सिर से पिता का साया भी उठ गया.
जेब में सिर्फ 26 रुपये लेकर पहुंचे मुंबई
अपने सपनों को साकार करने के लिए जीवन ने 18 साल की उम्र में घर छोड़ दिया और मुंबई पहुंच गए, क्योंकि उन्हें हर हाल में अभिनेता बनना था. उस वक्त उनकी जेब में केवल 26 रुपये थे. मायानगरी में शुरुआती दिन बेहद कठिनाइयों से भरे रहे. काम की तलाश में भटकने के बाद आखिरकार उन्हें एक स्टूडियो में नौकरी मिली, और यहीं से उनके फिल्मी सफर की नींव पड़ी.
'फैशनेबल इंडिया' से शुरुआत
यह स्टूडियो जाने-माने निर्देशक मोहन लाल सिन्हा का था. जब उन्हें यह पता चला कि जीवन अभिनय में किस्मत आजमाना चाहते हैं, तो उन्होंने अपनी फिल्म 'फैशनेबल इंडिया' में उन्हें मौका दे दिया. इसके बाद जीवन को लगातार फिल्मों में काम मिलता गया और उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
नारद मुनि के रूप में मिली खास पहचान
जीवन को सबसे बड़ी पहचान नारद मुनि के किरदार से मिली. उन्होंने अलग-अलग भाषाओं की करीब 60 फिल्मों में नारद का रोल निभाया. 1950 के दशक में बनी कई फिल्मों में वह इसी रूप में नजर आए और दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए.
यादगार फिल्मों की लंबी फेहरिस्त
फिल्म 'रोमांटिक इंडिया' ने जीवन को खास पहचान दिलाई. इसके बाद उन्होंने 'अफसाना', 'स्टेशन मास्टर', 'अमर अकबर एंथनी', 'धर्म-वीर', 'नागिन', 'शबनम', 'हीर-रांझा', 'जॉनी मेरा नाम', 'कानून', 'सुरक्षा' और 'लावारिस' जैसी कई यादगार फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवाया.
खलनायकी ने बनाया चर्चित चेहरा
करियर की शुरुआत में ही जीवन को यह एहसास हो गया था कि वह पारंपरिक हीरो की छवि में फिट नहीं बैठते. इसी वजह से उन्होंने खलनायक के किरदारों पर ध्यान केंद्रित किया और यही फैसला उन्हें इंडस्ट्री का चर्चित अभिनेता बना गया. उनकी दमदार स्क्रीन प्रेजेंस और निराले अंदाज ने उन्हें बाकी कलाकारों से अलग खड़ा कर दिया. पर्दे पर उनकी खलनायकी इतनी असरदार थी कि असल जिंदगी में भी लोग उनसे नफरत करने लगे थे.
'मेरे हमसफर' में चर्चित रहा किरदार
अपने करियर में जीवन ने लगभग हर बड़े सितारे के साथ काम किया. शर्मिला टैगोर के साथ साल 1970 में आई फिल्म 'मेरे हमसफर' में निभाया उनका किरदार खासा चर्चित रहा था. इस फिल्म में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी थी.
अनोखी आवाज और बेटे की विरासत
अभिनय के साथ-साथ जीवन अपनी खास आवाज और संवाद बोलने के निराले अंदाज के लिए भी पहचाने जाते थे. हिंदी फिल्मों के अलावा उन्होंने पंजाबी सिनेमा में भी काम किया. उनके बेटे किरण कुमार भी पिता की तरह जाने-माने अभिनेता हैं और उन्होंने इस विरासत को आगे बढ़ाया.
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