अलताफ राजा का वो दर्दभरा तराना, जो टूटे दिलों के लिए बन गया 'राष्ट्रगान' मनोरंजन एक घंटा पहले 2
साल 2000 में आए एल्बम 'दिल के टुकड़े हजार हुए' ने अलताफ राजा को 'दर्द के सुल्तान' के रूप में स्थापित किया और जुदाई की आग में जल रहे आशिकों के लिए एक ऐसी जुबान बन गया जो आज भी उतनी ही ताजा है।

कई बार ऐसा होता है कि जब शब्द साथ छोड़ देते हैं, तब संगीत बोलने लगता है। हर दौर में टूटे हुए दिलों का अपना एक राजा होता है, जिसकी आवाज सुनते ही पुराने घाव फिर से हरे हो जाते हैं। साल 2000 के दशक की शुरुआत में हिंदी संगीत की दुनिया में अगर किसी ने तकलीफ और विरह को अपनी पहचान बनाया, तो वह नाम था अलताफ राजा का। उनके एल्बम 'दिल के टुकड़े हजार हुए' ने सिर्फ चार्ट ही नहीं तोड़े, बल्कि एक ऐसा दर्दभरा तराना दिया जो आज भी बिछड़न की आग में सुलगते लोगों के सबसे करीब महसूस होता है।

एल्बम जिसने करियर को नई ऊंचाई दी

90 के दशक के आखिर और 2000 के शुरुआती सालों में जब बॉलीवुड में रोमांटिक गीतों की धूम मची हुई थी, उसी दौर में एक ऐसी आवाज सामने आई जो सीधे दिल के टुकड़ों को छू जाती थी। अलताफ राजा की यह आवाज दर्द को इतनी सादगी और गहराई से बयां करती थी कि सुनने वाला खुद को ही गाने का किरदार समझने लगता था।

साल 2000 में रिलीज हुआ यह हिंदी एल्बम इश्तार म्यूजिक के बैनर तले आया था। इसमें कुल 8 गाने थे, जिन्हें अलताफ राजा ने खुद संगीतबद्ध किया था। इससे पहले 1994 में वे 'तुम तो ठहरे परदेसी' जैसा सुपरहिट गीत दे चुके थे, लेकिन 'दिल के टुकड़े हजार हुए' ने उनके करियर को नई बुलंदी दी। इस एल्बम का हर गाना जुदाई की आग में जलते इंसान की कहानी कहता है। भले ही 90 के दशक में उन्हें पहचान मिल चुकी थी, मगर इसी एल्बम ने उन्हें 'दर्द के सुल्तान' के रूप में स्थापित कर दिया।

अरुण भैरव के दर्दभरे बोल

इसी एल्बम का एक गाना है 'पहले तो कभी कभी था'। जब पहली बार 'प्यार मोहब्बत के किस्से बेकार हुए, जब देखा तोह दिल के टुकड़े हजार हुए…' यह पंक्ति कानों में पड़ती है, तो एहसास होता है कि यह महज एक गाना नहीं, बल्कि एक दर्द है। गीतकार अरुण भैरव ने शायद ही कभी इतने सीधे-सादे शब्दों में इतना गहरा दर्द उकेरा हो।

गाने में एक जगह शेर आता है—'खत भी लिखे तो उन्हें पहुंचाए किस तरह, अब तो उनका कोई ठिकाना भी नहीं है।' यह लाइन उस लाचारी को बयां करती है, जहां एक आशिक अपनी मोहब्बत के लिए तड़प रहा है, अपने जज्बात लिखना भी चाहता है, लेकिन वक्त ने दोनों के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर दी है कि बातचीत के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं। यही तड़प और बेबसी गाने को और भी भावुक बना देती है।

कैसेट बिक्री के टूटे रिकॉर्ड

अलताफ राजा के गाने का अंदाज बेहद अलग था। वे केवल गाते नहीं थे, बल्कि गाने के बीच-बीच में जो शायरी और संवाद बोलते थे, वही सुनने वाले से सीधा रिश्ता जोड़ लेते थे। उनकी आवाज में एक अजीब सी खनक और वियोग का वो सोंधापन था, जो उस दौर के चमक-दमक भरे पॉप संगीत के बीच भी अपनी अलग पहचान बना गया।

जब वे गाते हैं कि 'मजबूरियों के नाम पर सब छोड़ जाते हैं', तो लगता है मानो कोई सच्चा दोस्त आपके पास बैठकर आपके टूटे दिल का हाल सुना रहा हो। यही वजह रही कि इस गाने ने उस दौर में कैसेट और रिकॉर्ड्स की बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले।

देवदास-मजनुओं का 'नेशनल एंथम'

साल 2000 की शुरुआत में आया यह एल्बम भारतीय इंडी-पॉप और गजल-कव्वाली के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। इस एल्बम ने उन लोगों को एक जुबान दी, जो अपने प्यार को मुकम्मल नहीं कर पाए थे। इसकी कहानी किसी एक इंसान की नहीं, बल्कि हर उस शख्स की है, जो आधी रात तकिए में मुंह छुपाकर रोता है, जो भीड़ में रहकर भी खुद को अकेला पाता है और जो चाहकर भी अपनी पुरानी मोहब्बत की धुंधली यादों से बाहर नहीं निकल पाता।

यह गाना सिखाता है कि मोहब्बत में सिर्फ मिल जाना ही सब कुछ नहीं होता। कभी-कभी बिछड़ने का दर्द इंसान को अंदर से पूरी तरह बदल देता है। आज भले ही म्यूजिक स्ट्रीमिंग ऐप्स और रील्स का जमाना आ गया हो, लेकिन जब भी दिल के जख्म हरे होते हैं, तो आज की पीढ़ी भी हेडफोन लगाकर अलताफ राजा के इसी 'गम' में सुकून तलाशती नजर आती है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

आपकी प्रतिक्रिया?


आपको यह भी पसंद आ सकता हैं

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!